पुष्य नक्षत्र और संतान जन्म मुहूर्त गाइड
Trikaal Sandesh — Direct Answer
पुष्य नक्षत्र में संतान जन्म शुभ माना जाता है। इसका स्वामी शनि और देवता गुरु बृहस्पति हैं, और यह पूरी तरह कर्क राशि में है। चार पाद हु, हे, हो और डा नामाक्षर देते हैं। फिर भी पुष्य नौ मुहूर्त फैक्टर में से एक है, इसलिए अपना सटीक जन्म-क्षण त्रिकाल वाणी पर फ्री जांचें, पूरी रिपोर्ट ₹101 से।
Deep Dive Analysis
पुष्य नक्षत्र को सबसे शुभ क्यों माना जाता है
पुष्य 27 नक्षत्रों में से 8वां है, कर्क राशि के 3°20' से 16°40' तक फैला हुआ, और सेज वशिष्ठ सहित शास्त्रीय ज्योतिष प्राधिकरण इसे सर्व कर्म शुभ बताते हैं — लगभग हर तरह की शुरुआत के लिए शुभ। इसका नाम संस्कृत मूल 'पुष' से आया है, जिसका अर्थ है पोषण करना, और इसका प्रतीक — गाय का थन — ठीक यही दर्शाता है: प्रचुरता, पोषण, और स्थिर आपूर्ति। संतान जन्म मुहूर्त के लिए विशेष रूप से, यह प्रतिष्ठा इसलिए मायने रखती है क्योंकि लग्न का नक्षत्र त्रिकाल वाणी की 9-फैक्टर विधि का फैक्टर 1 है, और पुष्य जैसे पारंपरिक रूप से पसंदीदा नक्षत्र के तहत जन्म उस पहले फैक्टर में सकारात्मक योगदान देता है। यह स्पष्ट होना ज़रूरी है कि इसका मतलब क्या है: पुष्य का शुभ होना नौ इनपुट्स में से एक है, अकेला फैसला नहीं — मुख्य चाइल्ड बर्थ मुहूर्त गाइड बताती है कि सभी नौ फैक्टर कैसे मिलते हैं। बृहत्संहिता भी पुष्य को लघु नक्षत्र गिनती है, जो व्यापार, विद्या, कला, शिल्प और औषधि जैसे कामों में सिद्धि देने वाला कहा गया है।[1] फिर भी यह नौ में से एक ही फैक्टर है, इसलिए पुष्य पाने के लिए डॉक्टर की तय विंडो न बदलें।
पुष्य का स्वामी ग्रह और देवता — शनि और गुरु साथ
पुष्य का स्वामी ग्रह शनि है, जो विंशोत्तरी दशा गणना में इस नक्षत्र का ग्रह माना जाता है और अनुशासन, संरचना और धैर्य का कारक है। इसके अधिष्ठाता देवता बृहस्पति (गुरु) हैं, देवताओं के आचार्य, जो ज्ञान, वृद्धि और मार्गदर्शन से जुड़े हैं। बृहत्संहिता की नक्षत्र-देवता सूची में आठवें स्थान पर जीव यानी बृहस्पति आते हैं।[3] इस जोड़ी के कारण पुष्य के जातकों को पारंपरिक रूप से शनि की स्थिरता और गुरु की उदारता का मेल बताया जाता है, आवेगी के बजाय अनुशासित देखभाल करने वाले। पंचांग परंपरा में दो लोकप्रिय संयोग भी इसी नक्षत्र से जुड़े हैं: गुरु पुष्य योग, जब पुष्य नक्षत्र गुरुवार को पड़ता है, और रवि पुष्य योग, जब पुष्य नक्षत्र रविवार को पड़ता है। दोनों को खरीदारी और नई शुरुआत के लिए अच्छा दिन माना जाता है, पर संतान जन्म मुहूर्त में इन्हें अलग फैक्टर नहीं गिना जाता।
पुष्य के चार पद और उनके नामाक्षर अक्षर
पुष्य के चार पद क्रमशः हु, हे, हो और डा अक्षरों से शुरू होते हैं, यह वही स्वर-आधारित नामकरण परंपरा है जो नामाक्षर गाइड में विस्तार से बताई गई है। हर पद 3 अंश 20 कला का होता है और चंद्रमा इसे लगभग छह घंटे में पार करता है। पूरा पुष्य नक्षत्र 13 अंश 20 कला का है, जिसे चंद्रमा अपनी गति के अनुसार लगभग एक दिन, यानी करीब 21 से 27 घंटे, में पार करता है। इसलिए जन्म किस पद में आएगा, यह उस एक दिन के भीतर जन्म के सटीक घंटे पर निर्भर करता है। चाइल्ड बर्थ मुहूर्त की गणना यह पद सटीक रूप से जांचती है, और इसी वजह से फ्री चाइल्ड बर्थ मुहूर्त टूल को सिर्फ तारीख नहीं, सटीक समय भी चाहिए।
पुष्य जन्म से जुड़े बच्चे के स्वभाव लक्षण
शास्त्रीय और लोकप्रिय ज्योतिष स्रोत पुष्य में जन्मे बच्चों को एक पोषण करने वाला, सुरक्षात्मक स्वभाव, परिवार के प्रति मजबूत कर्तव्य भावना, और सीखने, उदारता व आध्यात्मिक रुचि की ओर झुकाव से जोड़ते हैं — ये गुण नक्षत्र को नियंत्रित करने वाले शनि-गुरु संयोजन से पढ़े जाते हैं। कुछ स्रोत आराम-तलाश और कठोरता के बीच संतुलन की आवश्यकता की प्रवृत्ति भी नोट करते हैं। यह स्पष्ट होना ज़रूरी है कि इसका क्या मतलब है और क्या नहीं: ये पूरी कुंडली में कई कारकों में से एक के रूप में नक्षत्र से जुड़ी व्यापक शास्त्रीय प्रवृत्तियां हैं, किसी विशेष बच्चे के बारे में विशिष्ट भविष्यवाणी नहीं। बृहत्संहिता का नक्षत्र-जातक अध्याय पुष्य में जन्मे को शान्त-चित्त, सुभग, विद्वान, धनी और धर्म-परायण बताता है।[2] यह भी सामान्य प्रवृत्ति की सूची है, आपके बच्चे की कुंडली का फ़ैसला नहीं, इसलिए इसे बच्चे पर थोपने के बजाय उसके स्वभाव को समझने का एक सहारा मानें।
9-फैक्टर मुहूर्त विधि में पुष्य
जब त्रिकाल वाणी का कैलकुलेटर किसी संभावित डिलीवरी क्षण को पुष्य के तहत पाता है, यह 9-फैक्टर विधि के फैक्टर 1 — लग्न नक्षत्र गुणवत्ता — में सकारात्मक योगदान देता है। यह अपने-आप उत्कृष्ट समग्र स्कोर नहीं देता, क्योंकि बाकी आठ फैक्टर — लग्नेश का भाव व दिग्बल, अष्टम भाव की स्थिति, केंद्र/त्रिकोण में शुभ ग्रह, चंद्र बल, शुभ योग, तिथि, और राहु काल — स्वतंत्र रूप से गणना किए जाते हैं। एक पुष्य-लग्न क्षण जो राहु काल में भी आता है, फिर भी पूरी तरह बाहर रहता है।
विवाह अपवाद — और यह यहां लागू क्यों नहीं होता
पुष्य के बारे में कहीं और शोध कर रहे पाठकों को अक्सर एक विशेष शास्त्रीय चेतावनी मिलेगी: कि पुष्य, बाकी सब कुछ के लिए शुभ होते हुए भी, पारंपरिक रूप से विवाह मुहूर्त के लिए अशुभ माना जाता है, कुछ परंपराओं का मानना है कि इसकी पोषण करने वाली, माता-पिता-बच्चे जैसी ऊर्जा शुरुआतों और आपूर्ति के लिए साझेदारों के बीच मिलन से बेहतर उपयुक्त है। यह चेतावनी ईमानदारी से बताने लायक है क्योंकि यह वास्तव में शास्त्रीय मुहूर्त स्रोतों में अच्छी तरह दस्तावेज़ीकृत है — लेकिन इसका संतान जन्म मुहूर्त पर कोई असर नहीं, जो इस हब का विषय है। शादी की तारीखों पर शोध कर रहे परिवारों को अलग मांगलिक विवाह मुहूर्त गाइड देखनी चाहिए।
पुष्य नक्षत्र जन्म से जुड़ी आम भ्रांतियां
कुछ भ्रांतियां सीधे संबोधित करने लायक हैं। पहली, कि पुष्य जन्म एक आसान या परेशानी-मुक्त जीवन की गारंटी देता है — कोई एक नक्षत्र यह वज़न नहीं रखता। दूसरी, कि पुष्य इतना मजबूत है कि यह कमज़ोर लग्नेश या पीड़ित अष्टम भाव पर हावी हो जाता है — ऐसा नहीं है; पुष्य नौ में से एक फैक्टर में योगदान देता है। तीसरी, कि पुष्य-समय का स्लॉट छूटने का मतलब है सबसे अच्छा मुहूर्त पूरी तरह छूट जाना — कई अन्य नक्षत्र और फैक्टर संयोजन समान रूप से मजबूत स्कोर दे सकते हैं।
कैसे जांचें कि आपका संभावित मुहूर्त पुष्य में आता है
यह पुष्टि करने का एकमात्र भरोसेमंद तरीका कि कोई विशेष संभावित डिलीवरी तारीख और समय पुष्य के तहत आता है, और उसके किस पद में, फ्री नक्षत्र कैलकुलेटर या पूरे चाइल्ड बर्थ मुहूर्त कैलकुलेटर से सटीक क्षण जांचना है। चंद्रमा पुष्य को लगभग एक दिन में पार कर लेता है और करीब 27 दिन बाद फिर उसी नक्षत्र में लौटता है, इसलिए अस्पताल द्वारा दी गई संभावित विंडो इससे मेल खा भी सकती है और नहीं भी, और यह पूरी तरह ठीक है।
पुष्य में जन्मे बच्चे का नामकरण
एक बार पुष्य जन्म-क्षण और पद की पुष्टि हो जाए, फ्री बेबी नेम बाय नक्षत्र कैलकुलेटर सटीक नामाक्षर अक्षर बताता है — पद के अनुसार हु, हे, हो या डा — और त्रिकाल वाणी की पेड चाइल्ड बर्थ मुहूर्त रिपोर्ट उस अक्षर से मेल खाते नामों की एक चुनी हुई सूची शामिल करती है। संपूर्ण नामाक्षर गाइड में बताया गया है, यह एक सहायक शुरुआती परंपरा है, सख्त आवश्यकता नहीं।
पुष्य नक्षत्र और व्यापक कर्क राशि प्रभाव
चूंकि पुष्य पूरी तरह कर्क राशि के भीतर बैठता है, चंद्रमा द्वारा शासित एक जल राशि, इस नक्षत्र के तहत जन्म शास्त्रीय ज्योतिष द्वारा सामान्य रूप से कर्क से जुड़े व्यापक भावनात्मक और पोषण गुण भी रखते हैं — घर-उन्मुखता, सुरक्षात्मकता, और परिवार व माँ के साथ मजबूत बंधन। यह कर्क स्थान पुष्य के अपने पोषण प्रतीक को मजबूत करता है, इसके खिलाफ काम नहीं करता, यही कारण है कि दोनों को शास्त्रीय टिप्पणी में अक्सर साथ बताया जाता है। यह ध्यान देने लायक है कि चंद्रमा की अपनी मजबूती — चंद्र बल, 9-फैक्टर विधि का फैक्टर 6 — चंद्रमा किस नक्षत्र में है इससे स्वतंत्र रूप से गणना की जाती है, इसलिए पुष्य-लग्न क्षण का मतलब स्वतः मजबूत चंद्रमा नहीं है।
पुष्य की तुलना अन्य पारंपरिक रूप से पसंदीदा नक्षत्रों से
पुष्य शुरुआतों के लिए पारंपरिक रूप से उच्च माने जाने वाले कई नक्षत्रों में से एक है। बृहत्संहिता इसे हस्त और अश्विनी के साथ लघु यानी हल्के और शीघ्र फल देने वाले वर्ग में रखती है,[1] जबकि रोहिणी और तीनों उत्तरा नक्षत्र, यानी उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा और उत्तरा भाद्रपद, मुहूर्त शास्त्र में ध्रुव यानी स्थिर वर्ग में गिने जाते हैं। पुष्य की विशेष प्रतिष्ठा पोषण और आपूर्ति की ओर झुकती है, ध्रुव समूह की स्थिरता की ओर, और रोहिणी की वृद्धि और सुंदरता की ओर। इनमें से कोई भी नक्षत्र संतान जन्म मुहूर्त के लिए सार्वभौमिक रूप से बेहतर नहीं है, क्योंकि हर एक नौ-फैक्टर स्कोर के फैक्टर 1 में समान रूप से योगदान देता है। जिन परिवारों की डिलीवरी विंडो किसी अलग पारंपरिक रूप से पसंदीदा नक्षत्र में आती है, उन्हें अपने मुहूर्त को कम पूर्ण नहीं मानना चाहिए।
अगर डिलीवरी विंडो का सिर्फ हिस्सा पुष्य में आए तो
चंद्रमा पुष्य को लगभग एक दिन में पार करता है, इसलिए दो-तीन दिन की डॉक्टर-स्वीकृत विंडो का केवल एक हिस्सा पुष्य से मेल खाएगा और बाकी हिस्सा पड़ोसी नक्षत्रों में आएगा, पहले पुनर्वसु या बाद में आश्लेषा। इस स्थिति में हर संभावित स्लॉट को अलग-अलग कैलकुलेटर में चलाना ज़रूरी है, क्योंकि पुष्य के ठीक बाहर का स्लॉट अपने-आप कमज़ोर नहीं है। आश्लेषा और पुनर्वसु अपने अलग शास्त्रीय महत्व रखते हैं और बाकी आठ फैक्टर्स पर अच्छा स्कोर कर सकते हैं। अगर डॉक्टर के वास्तविक विकल्प पुष्य से सिर्फ आंशिक रूप से मेल खाते हों, तो सिर्फ नक्षत्र नाम से फ़िल्टर करने के बजाय वास्तविक स्कोर की तुलना करें।
इस हब में अन्य नक्षत्र गाइड
यह हब संतान जन्म के लिए अक्सर शुभ माने जाने वाले आठ अन्य नक्षत्रों को कवर करता है, हर एक को अलग-अलग शोध किया गया: रोहिणी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, रेवती, उत्तर फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, और उत्तरा भाद्रपद। हर पेज उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह, देवता, नामाक्षर अक्षर और 9-फैक्टर विधि के फैक्टर 1 में इसकी भूमिका को समझाता है।
पुष्य नक्षत्र में जन्म शुभ है या नहीं
हां, पुष्य नक्षत्र में जन्म शुभ माना जाता है, और यह उन नक्षत्रों में है जिनके आने पर परिवार को किसी शान्ति या विशेष उपाय की ज़रूरत नहीं पड़ती। जन्म नक्षत्र का अर्थ है जन्म के क्षण चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो, और पुष्य में चंद्रमा अपनी ही राशि कर्क में रहता है, जिसे ज्योतिष में सहज और पोषक स्थिति माना जाता है। फिर भी शुभ नक्षत्र पूरी कुंडली का फैसला नहीं करता। लग्न यानी जन्म के समय पूर्व दिशा में उदित राशि, लग्नेश का बल, अष्टम भाव और दशा-क्रम मिलकर तस्वीर पूरी करते हैं, जिनकी पूरी सूची संतान जन्म मुहूर्त की मुख्य गाइड में दी गई है। व्यावहारिक नियम सीधा है: डॉक्टर की सुरक्षित विंडो में पुष्य का स्लॉट मिल रहा हो तो उसे प्राथमिकता दें, और न मिले तो कोई डर न रखें, क्योंकि डॉक्टर की सुरक्षित विंडो हमेशा पहले आती है। त्रिकाल वाणी के मुख्य वैदिक वास्तुकार रोहित गुप्ता, जो 16 वर्ष से अधिक समय से पराशर पद्धति पर काम कर रहे हैं, हर संभावित क्षण को स्विस एफेमेरिस की सटीक गणना से जांचने की सलाह देते हैं।
पुष्य के देवता बृहस्पति: अथर्व परंपरा का प्रमाण
पुष्य के अधिष्ठाता देवता बृहस्पति हैं, और यह बात केवल बाद की ज्योतिष पुस्तकों में नहीं, अथर्ववेद परिशिष्ट के नक्षत्रकल्प में भी लिखी है। वहां क्रम से आर्द्रा के देवता रुद्र, पुनर्वसु की अदिति, पुष्य के बृहस्पति, आश्लेषा के सर्प और मघा के पितर बताए गए हैं।[4] बृहस्पति देवताओं के गुरु और पुरोहित माने जाते हैं, इसलिए पुष्य को शिक्षा, संस्कार और मार्गदर्शन वाला नक्षत्र पढ़ा जाता है। ज्योतिष में गुरु ग्रह संतान, ज्ञान और धर्म का कारक है, और गुरु को पुत्रकारक मानने वाली परंपरा इसी कारण पुष्य जन्म को विशेष स्नेह से देखती है। एक सावधानी रखें: देवता का गुरु होना बच्चे की कुंडली में गुरु ग्रह के बलवान होने की गारंटी नहीं है। गुरु किस भाव और राशि में बैठा है, यह अलग से देखा जाता है, और फ्री ग्रह बल कैलकुलेटर से कुंडली के हर ग्रह का बल एक साथ देखा जा सकता है।
विम्शोत्तरी शनि दशा शेष: पुष्य बच्चे की पहली महादशा
पुष्य में जन्मे हर बच्चे का जीवन शनि की महादशा से शुरू होता है, क्योंकि विंशोत्तरी दशा पद्धति में पुष्य का स्वामी शनि है और शनि महादशा की कुल अवधि 19 वर्ष है। जन्म के समय कितनी दशा बची है, यह चंद्रमा के सटीक अंश पर निर्भर करता है। सूत्र सरल है: पुष्य के 13 अंश 20 कला में से चंद्रमा का जितना हिस्सा अभी पार होना बाकी है, उसी अनुपात में 19 वर्ष शेष रहते हैं। उदाहरण के लिए, चंद्रमा पुष्य के ठीक बीच में यानी कर्क के 10 अंश पर हो तो लगभग साढ़े नौ वर्ष की शनि दशा बचती है। पहले पाद की शुरुआत में जन्म हो तो लगभग पूरे 19 वर्ष, और चौथे पाद के अंत में हो तो कुछ ही महीने। शनि के बाद बुध की 17 वर्ष की महादशा आती है। घबराने की कोई बात नहीं: बचपन की शनि दशा अक्सर अनुशासन, दिनचर्या और धीमी पर पक्की प्रगति के रूप में दिखती है, और उसका असली फल शनि की भाव-स्थिति से तय होता है। सटीक शेष फ्री दशा कैलकुलेटर से निकालें, और छोटे कालखंड समझने के लिए प्रत्यंतर दशा की गाइड पढ़ें।
कर्क राशि में पुष्य की स्थिति: बृहत्संहिता का राशि विभाग
पुष्य का पूरा विस्तार कर्क राशि के भीतर है, इसलिए पुष्य में जन्मे हर बच्चे की चंद्र राशि कर्क होती है। बृहत्संहिता का नक्षत्र-राशि विभाग कहता है कि कर्क राशि पुनर्वसु के अंतिम पाद, तिष्य यानी पुष्य, और आश्लेषा से मिलकर बनती है।[6] तिष्य पुष्य का ही प्राचीन नाम है, जो वैदिक और संहिता ग्रंथों में अक्सर मिलता है। कर्क के स्वामी स्वयं चंद्रमा हैं, इसलिए पुष्य जन्म में चंद्रमा अपने घर में बैठा होता है, जो मन की स्थिरता के लिए अनुकूल माना जाता है। फिर भी चंद्र बल अलग विषय है, क्योंकि अमावस्या के पास का क्षीण चंद्रमा अपने घर में होकर भी कमज़ोर गिना जाता है। बच्चे की राशि की पुष्टि फ्री राशि कैलकुलेटर से करें। कर्क राशि वालों पर आगे के वर्षों में शनि का गोचर कब असर डालेगा, यह कर्क राशि साढ़ेसाती की गाइड में शांत भाषा में समझाया गया है, ताकि कोई अनावश्यक चिंता न रहे।
पुष्य के चार पाद और नवांश
पुष्य के चारों पाद नवांश कुंडली में अलग-अलग राशियों में जाते हैं। नवांश यानी राशि का नौवां भाग, जिसकी कुंडली (D9) ग्रहों की भीतरी ताकत और जीवन के लंबे फलों को परखने में काम आती है। पहला पाद (कर्क 3 अंश 20 कला से 6 अंश 40 कला) सिंह नवांश में है, जिसका स्वामी सूर्य है। दूसरा पाद (10 अंश तक) कन्या नवांश में है, स्वामी बुध। तीसरा पाद (13 अंश 20 कला तक) तुला नवांश में है, स्वामी शुक्र। चौथा पाद (16 अंश 40 कला तक) वृश्चिक नवांश में है, स्वामी मंगल। सामान्य पठन में पहला पाद आत्मविश्वास और नेतृत्व, दूसरा विश्लेषण और सेवा, तीसरा कला और संतुलन, और चौथा साहस और गहराई की ओर झुकाव देता है। चौथे पाद का वृश्चिक नवांश चंद्रमा की नीच राशि है, पर यह अकेले कोई दोष नहीं बनाता, क्योंकि राशि कुंडली में चंद्रमा अपने घर कर्क में ही रहता है। बच्चे का पाद और नवांश फ्री जन्म कुंडली कैलकुलेटर से देखा जा सकता है।
पुष्य नामाक्षर हु, हे, हो, डा से नाम चुनना
पुष्य के नामाक्षर पाद के क्रम से चलते हैं: पहले पाद में हु, दूसरे में हे, तीसरे में हो और चौथे में डा। यानी पहले पाद का बच्चा हु से और चौथे पाद का बच्चा डा से शुरू होने वाला नाम पाता है। व्यवहार में हे अक्षर से हेमंत, हेमा या हेतल जैसे नाम आसानी से मिलते हैं, जबकि हु और डा अक्षर कम प्रचलित हैं, इसलिए कई परिवार इन अक्षरों से एक राशि नाम रखते हैं और रोज़ बुलाने का नाम अलग चुनते हैं। यह परंपरा में मान्य रास्ता है और इसमें कोई दोष नहीं। नाम तय करने से पहले पाद की पुष्टि ज़रूरी है, क्योंकि पाद की सीमा के पास कुछ मिनट का अंतर अक्षर बदल सकता है। फ्री बेबी नेम कैलकुलेटर सटीक अक्षर बताता है, और नामकरण संस्कार की तारीख चुनने के लिए नामकरण का शुभ मुहूर्त वाला पेज अलग से देखें।
पुष्य विवाह अपवाद और पुष्य में जन्मे बच्चे की शादी
पुष्य विवाह अपवाद का अर्थ केवल इतना है कि शादी की तारीख चुनते समय मुहूर्त परंपरा पुष्य नक्षत्र को आम तौर पर नहीं लेती, इसका पुष्य में जन्मे व्यक्ति की शादी से कोई संबंध नहीं है। यह नियम विवाह के दिन के नक्षत्र पर लागू होता है, दूल्हे या दुल्हन के जन्म नक्षत्र पर नहीं। पुष्य जन्म वाले बच्चे का विवाह योग उसकी कुंडली के सप्तम भाव, शुक्र और गुरु से देखा जाता है। इसलिए किसी रिश्तेदार की यह बात कि पुष्य वाले बच्चे की शादी में अड़चन आती है, शास्त्र पर आधारित नहीं है और इसे मन से निकाल देना चाहिए। उल्टा, पुष्य में चंद्रमा कर्क में होने से स्वभाव में परिवार के प्रति लगाव पढ़ा जाता है, जो वैवाहिक जीवन के लिए सहायक गुण है। बड़े होने पर मिलान के लिए कुंडली मिलान गाइड और विवाह के संकेतों के लिए कुंडली में विवाह योग उपयोगी हैं, और शादी की तारीखें विवाह मुहूर्त पेज पर मिलती हैं।
गुरु पुष्य और रवि पुष्य योग में संतान जन्म
गुरु पुष्य योग तब बनता है जब पुष्य नक्षत्र गुरुवार को पड़े, और रवि पुष्य योग तब जब यह रविवार को पड़े। चंद्रमा लगभग हर 27 दिन में पुष्य में लौटता है, इसलिए ऐसे संयोग साल में कुछ ही बार आते हैं, और हर बार इनकी तारीख आज का पंचांग देखकर पक्की करनी चाहिए। लोक परंपरा में ये दिन सोना खरीदने और नया व्यवसाय शुरू करने जैसे कामों के लिए लोकप्रिय हैं। अगर बच्चे का जन्म इन दिनों हुआ है तो परिवार खुशी मना सकता है, पर ज्योतिष गणना में वार यानी सप्ताह का दिन एक हल्का सहायक कारक है, पूरे मुहूर्त का निर्णायक नहीं। सी-सेक्शन की योजना बनाते समय सिर्फ गुरुवार या रविवार का पुष्य पकड़ने के लिए डॉक्टर की तय तारीख आगे-पीछे करना ठीक नहीं है। दोनों मेल खा जाएं तो अच्छा, नहीं तो पुष्य वाला कोई भी सुरक्षित दिन उतना ही स्वीकार्य है।
सी-सेक्शन और आईवीएफ परिवार पुष्य का समय कैसे चुनें
नियोजित सी-सेक्शन या आईवीएफ गर्भावस्था में डिलीवरी की तारीख पहले से तय होती है, इसलिए पुष्य को खोजना व्यावहारिक रूप से संभव होता है। सबसे पहले डॉक्टर से वह विंडो लिखित में लें जिसमें माँ और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं, जो आम तौर पर दो से पांच दिन की होती है। फिर उस विंडो के हर दिन के लिए पंचांग में पुष्य का प्रारंभ और समाप्ति समय देखें, क्योंकि लगभग एक दिन का यह नक्षत्र दिन या रात के किसी भी घंटे शुरू हो सकता है। जो घंटे पुष्य में आते हैं, उन्हें फ्री चाइल्ड बर्थ मुहूर्त कैलकुलेटर में डालकर लग्न और राहु काल भी जांचें। ऑपरेशन थिएटर का समय अक्सर एक-दो घंटे खिसकता है, इसलिए एक मुख्य और एक वैकल्पिक स्लॉट तैयार रखें। विस्तृत तरीका सी-सेक्शन के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त और आईवीएफ डिलीवरी मुहूर्त गाइड में है, और सामान्य प्रसव से तुलना नॉर्मल डिलीवरी बनाम सी-सेक्शन मुहूर्त में मिलेगी।
पड़ोसी नक्षत्र पुनर्वसु और आश्लेषा: गंडमूल का शांत सच
पुष्य से ठीक पहले पुनर्वसु और ठीक बाद आश्लेषा आता है, और विंडो खिसकने पर बच्चा इनमें से किसी में जन्म ले सकता है। पुष्य स्वयं गंडमूल नक्षत्र नहीं है, इसलिए पुष्य जन्म पर गंडमूल शान्ति का प्रश्न ही नहीं उठता, और पुनर्वसु भी गंडमूल नहीं है। आश्लेषा उन छह नक्षत्रों में है जिन्हें परंपरा गंडमूल कहती है, बाकी पांच अश्विनी, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती हैं। अगर जन्म आश्लेषा में हो जाए तो डरने की ज़रूरत नहीं। परंपरा का सबसे अधिक ज़ोर आश्लेषा के अंतिम पाद पर है, जो कर्क और सिंह की संधि पर पड़ता है, और इसका समाधान एक सरल शान्ति पूजा है, जो लगभग 27 दिन बाद चंद्रमा के उसी नक्षत्र में लौटने पर की जाती है। कई परिवार इसे घर पर सादगी से करते हैं और बच्चे के स्वागत की खुशी में कोई कमी नहीं आती। सटीक नक्षत्र और पाद फ्री नक्षत्र कैलकुलेटर से देखें, और ऐसे सवालों के छोटे उत्तर संतान जन्म मुहूर्त के सामान्य प्रश्न में हैं।
बृहत्संहिता में पुष्य के अधीन लोग और वस्तुएं
बृहत्संहिता का नक्षत्र-व्यूह अध्याय हर नक्षत्र के अधीन आने वाले लोगों, फसलों और कामों की सूची देता है। पुष्य के अधीन जौ, गेहूं, धान, गन्ने के खेत, मंत्री, राजा, जल से आजीविका चलाने वाले, साधु और यज्ञ-अनुष्ठान में लगे लोग गिनाए गए हैं।[7] इसी अध्याय के एक अन्य श्लोक में पुष्य को तीनों उत्तरा नक्षत्रों के साथ राजाओं का नक्षत्र कहा गया है।[8] त्रिकाल वाणी की व्याख्या में यह सूची पुष्य के पोषण-भाव से मेल खाती है, क्योंकि अन्न, जल और व्यवस्था, तीनों समाज को पालने वाली चीज़ें हैं। पर यह सूची मूल रूप से संहिता ज्योतिष की है, जो देश और समाज पर ग्रहों के प्रभाव के लिए बनी थी, किसी बच्चे का करियर तय करने के लिए नहीं। बच्चे की रुचि और योग्यता उसकी अपनी कुंडली के पंचम भाव और उसके स्वामी से पढ़ी जाती है, जिसका तरीका पंचम भाव से बच्चे की योग्यता में है। पुष्य के स्वभाव, करियर और विवाह पर विस्तृत लेख पुष्य नक्षत्र का अर्थ और स्वभाव में पढ़ें।
बृहत्संहिता में पुष्य: संस्कार, मुंडन और कर्णवेध
बृहत्संहिता पुष्य को बचपन के कई संस्कारों के लिए उपयुक्त नक्षत्र बताती है, और यह बात पुष्य शिशु के परिवार के लिए आगे काम आती है। नक्षत्र-कर्म अध्याय के अनुसार हस्त, रेवती, स्वाति, अनुराधा, तिष्य (पुष्य), चित्रा और मृगशिरा में संस्कार, दीक्षा, व्रत और मेखला यानी उपनयन जैसे कर्म करने चाहिए।[9] इसी अध्याय में क्षौर कर्म यानी बाल उतारने के लिए गुरु के नक्षत्र पुष्य को भी हितकारी गिना गया है।[10] कर्णवेध के लिए पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, श्रवण और रेवती नक्षत्र बताए गए हैं।[11] इसका मतलब यह नहीं कि हर संस्कार पुष्य में ही हो, केवल इतना कि पुष्य इन सूचियों में बार-बार आता है। तारीख चुनने के लिए मुंडन का शुभ मुहूर्त, कर्णवेध का शुभ मुहूर्त, अन्नप्राशन का शुभ मुहूर्त और जनेऊ का शुभ मुहूर्त वाले पेज देखें, जहां हर संस्कार की अपनी शर्तें दी गई हैं।
अथर्ववेद नक्षत्र सूक्त में चारु पुष्य
पुष्य का सबसे पुराना उल्लेख वैदिक है। अथर्ववेद के उन्नीसवें कांड का नक्षत्र सूक्त हर नक्षत्र से अलग कल्याण मांगता है, और उसमें पुष्य को चारु यानी सुंदर और मंगलकारी कहा गया है।[12] वही प्रार्थना पुनर्वसु से मधुर वाणी और आश्लेषा से प्रकाश मांगती है, यानी पुष्य के दोनों पड़ोसियों के लिए भी शुभ कामना ही है, भय नहीं। अथर्ववेद परिशिष्ट के नक्षत्रकल्प में तारों की गिनती भी दी गई है, जहां कृत्तिका और आश्लेषा के छह-छह तारे बताए गए हैं, पर पुष्य का एक ही तारा गिना गया है।[13] आधुनिक खगोल में पुष्य को कर्क तारामंडल के कुछ तारों से जोड़ा जाता है, इसलिए गिनती की परंपराएं अलग हो सकती हैं। जन्म ज्योतिष के लिए तारों की गिनती नहीं, चंद्रमा का अंश मायने रखता है, जिसे निकालने का तरीका जन्म नक्षत्र कैसे पता करें में समझाया गया है।
संतान जन्म हब के नक्षत्र और अथर्व परिशिष्ट की एक सूची
इस हब में जिन नक्षत्रों को संतान जन्म के लिए अच्छा माना गया है, उनका एक पुराना समूह अथर्ववेद परिशिष्ट में भी दिखता है। घृतकम्बल नामक अनुष्ठान के लिए वहां कहा गया है कि इसे पुष्य, प्राजापत्य (रोहिणी), मारुत (स्वाति), वैष्णव (श्रवण), पूषा-देवता वाले नक्षत्र (रेवती) या तीनों उत्तरा में करना चाहिए।[14] यह सूची जन्म के लिए नहीं, एक अनुष्ठान के लिए है, पर इससे दिखता है कि पुष्य, रोहिणी, स्वाति, रेवती और उत्तरा नक्षत्र प्राचीन काल से कल्याणकारी कामों के साथ जुड़े रहे हैं। इस हब के अलग पेजों में रोहिणी नक्षत्र में संतान जन्म, स्वाति नक्षत्र में संतान जन्म और रेवती नक्षत्र में संतान जन्म की तुलना पुष्य से की जा सकती है। तुलना का सही आधार फिर भी नौ फैक्टर का कुल स्कोर है, जिसके बारे में त्रिकाल वाणी की विधि अलग क्यों है वाला पेज बताता है।
पुष्य स्नान: बृहत्संहिता की शान्ति परंपरा
बृहत्संहिता में पुष्य के नाम पर एक पूरा अध्याय है, पुष्य स्नान, जो राजा के लिए की जाने वाली शान्ति-विधि है। वराहमिहिर कहते हैं कि पुष्य स्नान राजा के लिए ज्योतिषी और पुरोहित को मिलकर करना चाहिए, और इससे अधिक पवित्र और सब उत्पातों को शांत करने वाला कोई कर्म नहीं है।[15] अध्याय के अंत में यह भी कहा गया है कि हर पुष्य नक्षत्र पर यह विधि करने से सुख, यश और धन की वृद्धि होती है।[16] परिवार के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि परंपरा ने पुष्य को शान्ति और पोषण का नक्षत्र माना, डर का नहीं। आज किसी शिशु के लिए राजसी पुष्य स्नान की ज़रूरत नहीं है, और नवजात को कोई जड़ी-बूटी वाला स्नान डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं देना चाहिए। घर की सरल पूजा का दिन चुनने के लिए पूजा हवन का शुभ मुहूर्त देखा जा सकता है, और पुष्य के लौटने का दिन दिल्ली का पंचांग जैसे शहर-वार पंचांग में मिलता है।
भय-मुक्त स्वागत उपाय: पुष्य शिशु के लिए गुरुवार का दीप
पुष्य शिशु के लिए कोई दोष-निवारण ज़रूरी नहीं है, यह केवल स्वागत और कृतज्ञता का एक सरल उपाय है, जो पुष्य के देवता बृहस्पति से जुड़ा है। अथर्ववेद परिशिष्ट में देवगुरु बृहस्पति की अर्चना करते हुए प्रार्थना है कि वे पुष्य के साथ आकर रक्षा करें।[5]
- क्या करना है: घर के पूजा स्थान पर गाय के घी का एक दीपक जलाएं, पास में थोड़ी चने की दाल और हल्दी रखें, और 11 बार ॐ बृं बृहस्पतये नमः बोलें।
- कब: जन्म के बाद आने वाला पहला गुरुवार, सूर्योदय से सुबह 8 बजे के बीच।
- कितने का: 10 से 20 रुपये।
- कितने दिन: लगातार 3 गुरुवार।
- आपके लिए क्यों: पुष्य के देवता बृहस्पति हैं, इसलिए यह उपाय बच्चे के जन्म नक्षत्र से सीधे जुड़ता है और परिवार को शांत, सकारात्मक शुरुआत देता है।
कैसे करें: परिवार का कोई भी सदस्य, माँ के आराम में खलल डाले बिना, दो मिनट में यह कर सकता है, और तीसरे गुरुवार के बाद रखी हुई दाल किसी ज़रूरतमंद को दे दें।
सावधानी: दीपक शिशु के कमरे से दूर रखें, धुआं या कपूर नवजात के पास न जलाएं, और प्रसव के बाद माँ से कोई उपवास न कराएं।
पुष्य नक्षत्र में जन्मे बच्चे कैसे होते हैं: कुंडली में आगे क्या देखें
पुष्य नक्षत्र में जन्मे बच्चे आम तौर पर स्नेही, ज़िम्मेदार और सीखने वाले पढ़े जाते हैं, पर असली तस्वीर कुंडली के तीन हिस्सों से बनती है। पहला, लग्न और लग्न बल, जो शरीर और स्वभाव की नींव बताते हैं, और इन्हें लग्न बल कैसे पता करें में समझाया गया है। दूसरा, पंचम भाव और गुरु, जो पढ़ाई और बुद्धि का संकेत देते हैं, और यहां सरस्वती योग और बच्चे की शिक्षा वाला लेख मदद करता है। तीसरा, दशा क्रम, क्योंकि पुष्य बच्चे के शुरुआती वर्ष शनि और फिर बुध की दशा में बीतते हैं, जिसकी व्यावहारिक तस्वीर दशा और बच्चे का विकास में है। कुंडली में शनि केंद्र में अपनी या उच्च राशि में हो तो शश योग भी बन सकता है, जिसका संतुलित अर्थ शश योग की गाइड में है। सब बातें एक साथ देखने के लिए बच्चे का भविष्य और ज्योतिष वाला लेख शुरुआत की अच्छी जगह है।
जन्म हो चुका है तो कैसे जानें कि बच्चा पुष्य नक्षत्र का है
अगर बच्चे का जन्म हो चुका है, तो सटीक जन्म तारीख, समय और स्थान डालकर चंद्रमा का नक्षत्र देखना ही एकमात्र पक्का तरीका है। अस्पताल के रिकॉर्ड में लिखा मिनट तक का समय सबसे भरोसेमंद होता है। अगर परिणाम में चंद्रमा कर्क राशि के 3 अंश 20 कला से 16 अंश 40 कला के बीच है, तो बच्चा पुष्य का है, और अंश से उसका पाद भी तय हो जाता है। सीमा के पास जन्म हो तो कुछ मिनट का अंतर पुनर्वसु या आश्लेषा दिखा सकता है, इसलिए समय दोबारा मिलाएं। पूरी जन्म कुंडली बनाने की प्रक्रिया मेरी जन्म कुंडली में है, लग्न अलग से जानने के लिए मेरा लग्न क्या है पढ़ें, और फ्री लग्न कैलकुलेटर से तुरंत जांचें। ध्यान रखें कि जन्म नक्षत्र और लग्न नक्षत्र दो अलग चीज़ें हैं: नामाक्षर और दशा चंद्रमा के नक्षत्र से चलते हैं, जबकि लग्न का नक्षत्र मुहूर्त गणना का पहला फैक्टर है।
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शब्दावली · Glossary
- पुष्य
- 27 नक्षत्रों में आठवां नक्षत्र, पूरी तरह कर्क राशि के भीतर, जिसका स्वामी शनि और अधिष्ठाता देवता गुरु हैं और जिसे शास्त्रीय परंपरा सर्व कर्म शुभ कहती है।
- पद
- नक्षत्र का एक चौथाई भाग, लगभग 3°20' या करीब छह घंटे का चंद्र-गोचर, और हर पद एक नामाक्षर अक्षर देता है।
- नामाक्षर
- पद से जुड़ा वह आरंभिक अक्षर जिससे बच्चे का नाम रखना परंपरा में शुभ माना जाता है, पुष्य में हु, हे, हो और डा।
- गुरु पुष्य योग
- गुरुवार को पड़ने वाले पुष्य नक्षत्र का लोकप्रिय नाम, जिसे वित्तीय और महत्वपूर्ण शुरुआतों के लिए मज़बूत दिन माना जाता है।
- रवि पुष्य योग
- रविवार को पड़ने वाले पुष्य नक्षत्र का लोकप्रिय नाम, जिसे भी महत्वपूर्ण शुरुआतों के लिए मज़बूत दिन माना जाता है।
- लघु नक्षत्र
- बृहत्संहिता का वह वर्ग जिसमें हस्त, अश्विनी और पुष्य आते हैं, हल्के और शीघ्र फल देने वाले नक्षत्र।
- राहु काल
- दिन का वह खंड जिसमें आने वाला पुष्य-लग्न क्षण भी पूरी तरह बाहर रहता है, क्योंकि यह नक्षत्र से अलग दिन-समय की गणना है।
ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources
इस लेख के हर नियम का मूल स्रोत — ग्रंथ, अध्याय और श्लोक संख्या के साथ।
लघु हस्ताश्विनपुष्याः पण्यरतिज्ञानभूषणकलासु । शिल्पौषधयानादिषु सिद्धिकराणि प्रदिष्टानि ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 97 — नक्षत्रकर्मगुणाध्याय · श्लोक 9हस्त, अश्विनी और पुष्य लघु (हल्के, शीघ्र) नक्षत्र हैं, व्यापार, प्रेम, ज्ञान, आभूषण, कला, शिल्प, औषधि और वाहन में सिद्धि देते हैं।
Hasta, Ashwini and Pushya are laghu (light and quick) and bring success in trade, love, learning, ornaments, arts, crafts, medicine and vehicles.
शान्तात्मा सुभगः पण्डितो धनी धर्मसंश्रितः पुष्ये । शठसर्वभक्षक्ष्य पापः कृतघ्नधूर्तश्च भौजङ्गे ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 100 — नक्षत्रजातकाध्याय · श्लोक 5पुष्य में जन्मा मनुष्य शान्त-चित्त, सुभग, पण्डित, धनी और धर्म का आश्रय लेने वाला होता है।
A man born in Pushya is calm of mind, fortunate, learned, wealthy and resting on dharma.
(नक्षत्रदेवता) अश्वियमदहनकमलजशशिशूलभृददितिजीवफणिपितरः । योन्यर्यमदिनकृत्त्वष्टृपवनशक्राग्निमित्राश्च ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 97 — नक्षत्रकर्मगुणाध्याय · श्लोक 4नक्षत्रों के अधिपति देवताओं का क्रम देता है, जिसमें आठवें नक्षत्र पुष्य के लिए जीव (बृहस्पति) आते हैं।
Lists the presiding deities of the nakshatras in order, giving Jiva (Brihaspati) for the eighth star, Pushya.
रुद्रस्यार्द्रादितेः पुनर्वसू पुष्ये विद्याद् बृहस्पतिम् । अश्लेषा[[ः]] सर्पदैवत्या मघासु पितरः स्मृताः ॥
— अथर्ववेद परिशिष्ट, अध्याय 1 — नक्षत्रकल्प · श्लोक 4.2 · trikaal-pothi-2026आर्द्रा रुद्र की, पुनर्वसु अदिति का, पुष्य में बृहस्पति को देवता जानें, आश्लेषा के देवता सर्प और मघा के पितर कहे गए हैं।
Ardra belongs to Rudra, Punarvasu to Aditi, Pushya should be known as belonging to Brihaspati, Ashlesha has the serpents as deity and Magha the Pitaras.
यस्य देवा ब्रह्मचर्येण कर्मणा महासुरं तिग्मतयाभिचक्रिरे । तं सुबुधं देवगुरुं बृहस्पतिम् अर्चामि पुस्येण सहाभिपातु मा ॥
— अथर्ववेद परिशिष्ट, अध्याय 1 — नक्षत्रकल्प · श्लोक 38.1 · trikaal-pothi-2026जिनके ब्रह्मचर्य और कर्म से देवों ने महासुर को जीता, उन ज्ञानी देवगुरु बृहस्पति की मैं अर्चना करता हूं, वे पुष्य के साथ मेरी रक्षा करें।
I worship Brihaspati, the wise teacher of the gods, through whose disciplined work the gods overcame the great asura, may he together with Pushya protect me.
मृगशिरो अर्धं रौद्रं पुनर्वसोर् अंशकत्रयं मिथुनः । पादश् च पुनर्वसुतस् तिष्यः श्लेषा च कर्कटकः॥
— बृहत्संहिता, अध्याय 101 — नक्षत्र-राशि विभाग अध्याय · श्लोक 2 · trikaal-pothi-2026मिथुन मृगशिरा का शेष आधा, आर्द्रा और पुनर्वसु के तीन पाद है, और कर्क पुनर्वसु का अंतिम पाद, तिष्य (पुष्य) और आश्लेषा है।
Gemini is the other half of Mrigashira, Ardra and three quarters of Punarvasu, and Cancer is the last quarter of Punarvasu, Tishya (Pushya) and Ashlesha.
पुष्ये यवगोधूमाः शालीक्षुवनानि मन्त्रिणो भूपाः । सलिलोपजीविनः साधवश्च यज्ञेष्टिसक्ताश्च ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 15 — नक्षत्रव्यूहाध्याय · श्लोक 6पुष्य के अधीन जौ, गेहूं, धान, गन्ने के खेत, मंत्री, राजा, जल से जीविका चलाने वाले, साधु और यज्ञ में लगे लोग आते हैं।
Under Pushya fall barley, wheat, rice, sugarcane fields, ministers, kings, those who live by water, holy men and those devoted to sacrifices.
पूर्वात्रयं सानलमग्रजानां राज्ञां तु पुष्येण सहोत्तराणि । सपौष्णमैत्रं पितृदैवतं च प्रजापतेः भं च कृषीवलानाम् ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 15 — नक्षत्रव्यूहाध्याय · श्लोक 28तीनों पूर्वा और कृत्तिका ब्राह्मणों के, जबकि पुष्य तीनों उत्तरा के साथ राजाओं के नक्षत्र हैं।
The three Purvas with Krittika belong to the Brahmins, while Pushya together with the Uttaras belongs to kings.
सावित्रपौष्णानिलमैत्रतिष्यत्वाष्ट्रे तथा चौडुगणाधिपऋक्षे । संस्कारदीक्षाव्रतमेखलादि कुर्याद् गुरौ शुक्रबुधेन्दुयुक्ते ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 97 — नक्षत्रकर्मगुणाध्याय · श्लोक 15संस्कार, दीक्षा, व्रत और मेखला जैसे कर्म हस्त, रेवती, स्वाति, अनुराधा, तिष्य (पुष्य), चित्रा और मृगशिरा में करने चाहिए।
Samskara, initiation, vows and the girdle rite should be done in Hasta, Revati, Swati, Anuradha, Tishya (Pushya), Chitra and Mrigashira.
हस्तत्रयं मृगशिरः श्रवणत्रयं (श्रवनात्त्रयं) च पूषाश्विशक्रगुरुभानि पुनर्वसुश्च । क्षौरे तु कर्मणि हितानि उदये क्षणे वा युक्तानि चौडुपतिना शुभतारया च ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 97 — नक्षत्रकर्मगुणाध्याय · श्लोक 12क्षौर कर्म के लिए हस्त से तीन, मृगशिरा, श्रवण से तीन, रेवती, अश्विनी, ज्येष्ठा, गुरु का नक्षत्र (पुष्य) और पुनर्वसु हितकारी हैं।
For the shaving rite, the three stars from Hasta, Mrigashira, the three from Shravana, Revati, Ashwini, Jyeshtha, the star of Guru (Pushya) and Punarvasu are beneficial.
लाभे तॄतीये च शुभैः समेते पापैः विहीने शुभराशिलग्ने । वेध्यौ च कर्णावमरेज्यलग्ने पुष्येन्दुचित्राहरिपौष्णभेषु ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 99 — करणगुणाध्याय · श्लोक 6कर्णवेध पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, श्रवण और रेवती नक्षत्र में करना चाहिए, जब ग्यारहवें और तीसरे में शुभ ग्रह हों और गुरु का लग्न हो।
The ears should be pierced under Pushya, Mrigashira, Chitra, Shravana and Revati, with benefics in the 11th and 3rd and a Jupiter lagna.
सुहवम् अग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शम् आर्द्रा । पुनर्वसू सूनृता चारु पुष्यो भानुर् आश्लेषा अयनं मघा मे ॥२॥
— अथर्ववेद, अध्याय 19 — कांड 19, नक्षत्र सूक्त · श्लोक 7.2 · trikaal-pothi-2026नक्षत्र सूक्त प्रार्थना करता है कि पुनर्वसु मधुर वाणी दे, पुष्य चारु (सुंदर, मंगलकारी) हो और आश्लेषा प्रकाश दे।
The nakshatra hymn prays that Punarvasu bring pleasant speech, Pushya be lovely and Ashlesha bring light.
षट् कृत्तिका एका रोहिणी तिस्रो मृगशिर एकार्द्रा द्वे पुनर्वसू एकः पुष्यः षड् आश्लेषाः षण् मघाः चतस्रः फल्गुन्यः पञ्च हस्त एका चित्रा एका स्वातिर् द्वे विशाखे चतस्रो ऽनुराधा एका ज्येष्ठा सप्त मूलम् अष्टाव् अषाढा एको ऽभिजित् तिस्रः श्रवणः पञ्च श्रविष्ठा एका शतभिषा चतस्रः प्रोष्ठपदौ एका रेवती द्वे अश्वयुजौ तिस्रो भरण्यः ॥
— अथर्ववेद परिशिष्ट, अध्याय 1 — नक्षत्रकल्प · श्लोक 2.1 · trikaal-pothi-2026हर नक्षत्र के तारे गिनाता है: कृत्तिका के छह, पुष्य का एक, आश्लेषा के छह, इत्यादि।
Counts the stars of each nakshatra: six for Krittika, one for Pushya, six for Ashlesha and so on.
पुष्ये प्रयोगं कुर्वीत प्राजापत्ये ऽथ मारुते । वैष्णवे पूषदैवत्ये उत्तरेष्व् अथ वा त्रिषु ॥
— अथर्ववेद परिशिष्ट, अध्याय 33 — घृतकम्बल परिशिष्ट · श्लोक 4.1 · trikaal-pothi-2026घृतकम्बल अनुष्ठान पुष्य, प्राजापत्य (रोहिणी), मारुत (स्वाति), वैष्णव (श्रवण), पूषा-देवता (रेवती) या तीनों उत्तरा में करना चाहिए।
The Ghritakambala rite should be performed in Pushya, Prajapatya (Rohini), Maruta (Swati), Vaishnava (Shravana), the star of Pushan (Revati) or the three Uttaras.
पुष्यस्नानं नृपतेः कर्तव्यं दैववित्पुरोधाभ्याम् । नातः परं पवित्रं सर्वौत्पातान्तकरमस्ति ।
— बृहत्संहिता, अध्याय 47 — पुष्यस्नानाध्याय · श्लोक 3राजा के लिए पुष्य स्नान ज्योतिषी और पुरोहित को करना चाहिए, इससे अधिक पवित्र और सब उत्पातों का अंत करने वाला कुछ नहीं है।
The Pushya bath should be performed for the king by the astrologer and the priest, there is nothing purer and nothing that ends all portents more completely.
एतत् प्रयुज्यमानं प्रतिपुष्यं सुखयशोअर्थवृद्धिकरम्। पुष्याद् विनाअर्धफलदा पौषी शान्तिः परा प्रोक्ता॥
— बृहत्संहिता, अध्याय 47 — पुष्यस्नानाध्याय · श्लोक 82 · trikaal-pothi-2026हर पुष्य पर किया गया यह कर्म सुख, यश और धन की वृद्धि करता है, पुष्य के बिना की गई पौषी शान्ति आधा फल देती है।
Performed at every Pushya, this rite increases happiness, fame and wealth, done without Pushya the Paushi shanti gives only half its fruit.
हर सन्दर्भ त्रिकाल वाणी ग्रंथ-पुस्तकालय या प्रतिष्ठित मुक्त स्रोत से मिलाया गया · व्याख्या: Rohiit Gupta, Chief Vedic Architect
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