अहमदाबाद · Gujarat

अहमदाबाद में ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି

बुधवार, 14 अप्रैल 2027· Read in English →

त्रिकाल संदेश — सीधा उत्तर

साल 2027 में पणा संक्रांति 14 अप्रैल, बुधवार के दिन मनाई जाएगी। इस दिन सूर्य का मेष राशि में प्रवेश होने से उड़िया नववर्ष का आरंभ होता है। मुख्य रूप से इस दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और संकटमोचन हनुमान जी की पूजा की जाती है। परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करना ही इसका मुख्य विधान है।

🕐 अहमदाबाद के लिए ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି का समय

सूर्योदय की तिथिAshtami (Shukla Paksha) — 15:24 तक
पर्व की तिथिSankranti 15:24 से
नक्षत्रPunarvasu, पाद 4 — 10:52 तक
योग · करणSukarma · Bava
अभिजित मुहूर्त12:14-13:05
राहुकाल12:40-14:14
यमगंड · गुलिक07:58-09:32 · 11:06-12:40
सूर्योदय · सूर्यास्त06:24 · 18:56

अहमदाबाद (23.0225, 72.5714) के लिए स्विस एफ़ेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से गणना। पाँचों अंग स्थानीय सूर्योदय पर।

मुफ़्त कुंडली — कोई भुगतान नहीं, कोई साइनअप नहीं →

✅ ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି पर क्या करें

  1. प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर घर की स्वच्छता करें और स्वयं स्नान करें।
  2. स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूजा स्थल को गंगाजल या शुद्ध जल से साफ करें।
  3. तांबे के लोटे में शुद्ध जल और लाल फूल लेकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें।
  4. पूजा स्थान पर दीपक प्रज्वलित कर भगवान सूर्य और हनुमान जी का ध्यान करें।
  5. श्रद्धापूर्वक दोनों देवों को प्रणाम कर अपने कुल और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
  6. सामर्थ्य अनुसार किसी जरूरतमंद व्यक्ति को जल या अन्न का दान दें।
  7. पूजा के उपरांत घर के सभी सदस्यों में प्रसाद बांटें और बड़ों का आशीर्वाद लें।

समय कम है? → 5-मिनट पूजा विधि

📜 यह तारीख कैसे तय हुई

The Sun enters Mesha at 14 Apr 2027 15:28 IST. Odia reckoning opens the month on the sankranti day itself, sunrise to sunrise, whatever the hour. Baisakha therefore begins on 14 Apr 2027. (Report of the Calendar Reform Committee, Govt of India 1955, “Rules of Samkranti”, p.244)

त्रिकाल वाणी द्वारा स्विस एफ़ेमेरिस और शास्त्रीय निर्णय नियमों से गणना — निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, और कैलेंडर रिफ़ॉर्म कमेटी की रिपोर्ट। किसी अन्य पंचांग से नकल नहीं।

🕐 भारत भर में ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି का समय

शहरसूर्योदयअभिजित मुहूर्तराहुकाल
अहमदाबाद06:2412:14-13:0512:40-14:14
दिल्ली एनसीआर06:0111:56-12:4612:21-13:56
मुंबई06:2612:14-13:0312:39-14:12
नोएडा06:0011:55-12:4512:20-13:55
गुरुग्राम06:0211:56-12:4712:22-13:57
बेंगलुरु06:1111:54-12:4412:19-13:51
हैदराबाद06:0411:51-12:4012:16-13:49
पुणे06:2212:09-12:5912:34-14:07
कोलकाता05:2111:11-12:0111:36-13:10
चेन्नई06:0011:44-12:3312:09-13:41

ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି क्यों मनाया जाता है

पणा संक्रांति का पर्व उड़िया परंपरा में नए वर्ष के शुभारंभ का प्रतीक है। सौर गणना पर आधारित इस पर्व का संबंध सीधे तौर पर सूर्य देव के राशि परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। जब सूर्य अपनी पहली राशि मेष में प्रवेश करते हैं, तो इसे मेष संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में मेष राशि को सूर्य की उच्च राशि माना गया है, जहाँ वे अपनी पूर्ण सामर्थ्य और तेज के साथ प्रतिष्ठित होते हैं[1]। इस खगोलीय घटना के साथ ही सौर वर्ष का पहला महीना, जिसे वैशाख कहा जाता है, आरंभ होता है। पारंपरिक दृष्टि से यह समय ऋतु परिवर्तन और नए जीवन के संचार का माना जाता है। ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति में ताप बढ़ने लगता है, इसलिए इस दिन जल और शीतलता का विशेष महत्व माना गया है। लोक संस्कृति में यह विश्वास रचा-बसा है कि संक्रांति के इस पवित्र क्षण में जल का अर्पण और दान करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार होता है। प्राचीन ग्रंथों में भी संक्रांति काल के आसपास की नाड़ियों को अत्यंत पुण्य फलदायी बताया गया है, जिस दौरान किए गए जप, ध्यान और परोपकार के कार्य अक्षय फल देने वाले माने जाते हैं[2]। इस दिन विशेष रूप से भगवान सूर्य और महावीर हनुमान जी की पूजा का विधान लोक परंपरा में प्रचलित है। सूर्य देव समस्त जगत की आत्मा और ऊर्जा के प्रत्यक्ष स्रोत हैं, जबकि हनुमान जी अपार बल, निष्ठा और संकट निवारण के प्रतीक माने जाते हैं। नई शुरुआत के समय इन दोनों देवों की उपासना से व्यक्ति के भीतर आत्मबल और कर्तव्यनिष्ठा की भावना मजबूत होती है। उड़िया परिवारों में इस अवसर पर कुलदेवताओं का स्मरण किया जाता है और आने वाले वर्ष के लिए सुख, शांति और समृद्धि की मंगलकामना की जाती है। यह पर्व केवल एक तिथि का उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का एक सुंदर सामाजिक माध्यम भी है। समाज में सभी के लिए जल की व्यवस्था करना, राहगीरों को छाया देना और जीवों के प्रति करुणा भाव रखना इस दिन के प्रमुख संस्कारों में शामिल है। इस प्रकार पणा संक्रांति व्यक्ति को अपने भीतर अनुशासन, ऊर्जा और समाज कल्याण की चेतना जगाने की प्रेरणा देती है।

🪔 ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି पूजा विधि

  1. शुद्धि एवं स्नान — प्रातःकाल उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हों और शुद्ध जल से स्नान करके साफ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थल की तैयारी — घर के ईशान कोण या मंदिर को साफ करके एक स्वच्छ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
  3. सूर्य देव को अर्घ्य — तांबे के पात्र में जल, रोली और पुष्प लेकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें।
  4. दीप प्रज्वलन — पूजा स्थल पर घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं और साथ में धूप बत्ती जलाकर वातावरण को सुगंधित करें।
  5. सूर्य देव का ध्यान — मन को शांत रखकर प्रत्यक्ष सूर्य नारायण के तेजोमय रूप का स्मरण करें और उनसे आरोग्य की प्रार्थना करें।
  6. हनुमान जी की प्रार्थना — श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष हाथ जोड़कर उनके बल, बुद्धि और भक्ति का ध्यान करें।
  7. पुष्प एवं तिलक समर्पण — भगवान सूर्य और हनुमान जी को रोली, चंदन का तिलक लगाएं और श्रद्धापूर्वक ताजे पुष्प अर्पित करें।
  8. नैवेद्य अर्पण — पूजा में शुद्ध सात्विक नैवेद्य या ऋतु फल अर्पित कर दोनों देवों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें।
  9. कपूर आरती — शुद्ध कपूर जलाकर सूर्य देव और हनुमान जी की आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों को आरती दें।
  10. क्षमा प्रार्थना एवं आशीर्वाद — अंत में अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें और नए वर्ष में परिवार के कल्याण की कामना करें।

⚡ 5-मिनट विधि

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और मन में नए वर्ष के कल्याण का संकल्प लें।
  2. तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उगते हुए सूर्य देव को श्रद्धा से अर्घ्य दें।
  3. घर के मंदिर में दीपक जलाकर भगवान सूर्य और संकटमोचन हनुमान जी का ध्यान करें।
  4. दोनों देवों के समक्ष रोली, पुष्प और ऋतु फल अथवा गुड़ का साधारण भोग अर्पित करें।
  5. हाथ जोड़कर वर्ष भर परिवार की रक्षा, शांति और आरोग्य के लिए मंगल प्रार्थना करें।

🛒 ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି पूजा सामग्री

आवश्यक

  • तांबे का लोटा अर्घ्य के लिए
  • शुद्ध जल या गंगाजल
  • दीपक (मिट्टी या पीतल का)
  • घी या तिल का तेल और रुई की बत्ती
  • रोली या कुमकुम
  • चंदन
  • अक्षत (बिना टूटे साबुत चावल)
  • ताजे लाल या पीले पुष्प
  • धूप या अगरबत्ती
  • भोग के लिए गुड़ या बताशे

वैकल्पिक

  • कपूर आरती के लिए
  • ताजे ऋतु फल
  • मौली या कलावा
  • पूजा की चौकी
  • चौकी पर बिछाने के लिए लाल कपड़ा
  • तुलसी दल

अगर कुछ उपलब्ध न हो

  • यदि तांबे का पात्र उपलब्ध न हो, तो पीतल या किसी अन्य शुद्ध धातु के लोटे का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि ताजे लाल पुष्प उपलब्ध न हों, तो अक्षत या साधारण पीले पुष्प का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि शुद्ध घी उपलब्ध न हो, तो तिल के तेल का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि विशेष नैवेद्य उपलब्ध न हो, तो साधारण गुड़ या मिश्री का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।

❓ ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି: क्या करें और क्या न करें

क्या इस दिन सिर धोकर स्नान करना चाहिए?

हाँ, संक्रांति के पावन दिन प्रातः शुद्ध जल से सिर धोकर स्नान करना अत्यंत शुभ और परंपरागत माना गया है।

क्या इस दिन नाखून या बाल कटवा सकते हैं?

नए सौर वर्ष और संक्रांति के पुण्य पर्व पर बाल या नाखून काटना पारंपरिक दृष्टि से वर्जित माना जाता है। इसलिए यह कार्य इस दिन टाल देना ही बेहतर है।

क्या संक्रांति के दिन नमक का सेवन किया जा सकता है?

सामान्य भोजन में सेंधा या सादा नमक ले सकते हैं, लेकिन यदि आप सूर्य देव के निमित्त सात्विक नियम रख रहे हैं तो नमक से परहेज करना पारंपरिक अभ्यास है; स्वास्थ्य संबंधी स्थिति या दवा चलने पर अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

क्या इस दिन दूर की यात्रा की जा सकती है?

आवश्यक कार्य होने पर यात्रा कर सकते हैं, किंतु पारंपरिक मान्यता के अनुसार नए वर्ष का पहला दिन अपने घर-परिवार के साथ पूजा-पाठ में बिताना श्रेष्ठ माना जाता है।

क्या इस पर्व पर नया व्यापार या नया काम शुरू कर सकते हैं?

उड़िया परंपरा में यह नववर्ष का आरंभिक दिन है, इसलिए नए बहीखाते शुरू करने और शुभ कार्यों की नींव रखने के लिए इसे अत्यंत मांगलिक माना जाता है।

क्या इस दिन नए वस्त्र, वाहन या घरेलू सामान की खरीदारी कर सकते हैं?

हाँ, नववर्ष के स्वागत के लिए नए वस्त्र, बर्तन या अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी करना समाज में शुभ और मंगलकारी माना जाता है।

क्या पूजा संपन्न होने से पहले भोजन करना ठीक है?

परंपरा यही कहती है कि प्रातःकाल सूर्य देव को अर्घ्य देने और अपनी नित्य पूजा समाप्त करने के बाद ही पहला आहार ग्रहण करना चाहिए।

क्या संक्रांति की पूजा रात के समय की जा सकती है?

यह पर्व सूर्य देव और दिन के उजाले से जुड़ा हुआ है, इसलिए मुख्य पूजा और अर्घ्य का विधान प्रातःकाल या दोपहर से पहले ही संपन्न करना शास्त्रीय रूप से उचित है।

क्या इस दिन तुलसी के पौधे में जल अर्पित करना चाहिए?

हाँ, संक्रांति के दिन तुलसी जी की सेवा और उनमें जल अर्पित करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है, क्योंकि वे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं।

क्या इस दिन घर में तामसिक भोजन बन सकता है?

पवित्र संक्रांति और नववर्ष के दिन घर में प्याज, लहसुन, मांस अथवा मदिरा जैसे तामसिक पदार्थों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित माना जाता है।

क्या इस दिन किसी को जल या अन्न का दान करना आवश्यक है?

ग्रीष्म ऋतु के आगमन और संक्रांति पर्व पर प्यासे को जल पिलाना या जरूरतमंद को अन्न-वस्त्र का दान देना परंपरा में सबसे बड़ा धर्म माना गया है।

क्या इस दिन दोपहर में सोना उचित माना जाता है?

नववर्ष के प्रथम दिन आलस्य से बचने की सलाह दी जाती है, इसलिए दिन के समय सोने के बजाय धार्मिक चिंतन या सत्कर्मों में समय बिताना शुभ माना गया है।

यदि कोई व्यक्ति अस्वस्थ हो, तो क्या उसके लिए पूजा के कड़े नियम लागू होते हैं?

अस्वस्थ व्यक्तियों के लिए मानसिक स्मरण और सरल प्रार्थना ही पर्याप्त मानी गई है, किसी भी प्रकार के कठोर नियम या उपवास से पहले अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

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⚠️ आम गलतियाँ

  • सूर्य देव को अर्घ्य देते समय तांबे के लोटे के स्थान पर स्टील या प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग करने से अर्घ्य का विधान अधूरा रह जाता है।
  • पूजा के समय मन में क्रोध, तनाव या दूसरों के प्रति कटुता रखने से आराधना का पूर्ण सात्विक फल प्राप्त नहीं होता।
  • संक्रांति के दिन सूर्योदय के बहुत देर बाद तक सोते रहने से नित्य कर्म और नववर्ष के संकल्प का आरंभ बाधित माना जाता है।
  • भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते समय पैरों पर जल के छींटे पड़ने देने से यह नियम अधूरा माना जाता है।
  • बिना स्नान किए या अशुद्ध अवस्था में मंदिर की मूर्तियों को स्पर्श करने से पूजा का पारंपरिक क्रम खंडित हो जाता है।
  • नए वर्ष के इस पावन पर्व पर सामर्थ्य होने के बावजूद किसी जरूरतमंद की उपेक्षा करने से अनुष्ठान का सामाजिक भाव अधूरा रहता है।
  • पूजा समाप्त करने के बाद क्षमा प्रार्थना और बड़ों का आशीर्वाद लिए बिना उठ जाने से पूजा की प्रक्रिया अपूर्ण मानी जाती है।

📖 ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି कथा

पणा संक्रांति से जुड़ी पारंपरिक कथा सूर्य के उत्तरायण प्रवाह और उनके मेष राशि में प्रवेश के गहन खगोलीय व आध्यात्मिक रहस्य को उजागर करती है। सनातन परंपरा में काल की गणना सूर्य की गति पर आधारित मानी गई है। जब सूर्य देव अपनी बारह राशियों के चक्र को पूरा करते हुए पुनः अपनी प्रथम राशि मेष में प्रविष्ट होते हैं, तो यह संपूर्ण प्रकृति के लिए एक नवजीवन का संदेश होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मेष संक्रांति के दिन से ही वसंत की विदाई और ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड ऊर्जा का प्रभाव आरंभ होता है। लोक कथाओं में यह प्रसंग आता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पूरे तेज और ओज के साथ जगत को नवचेतना प्रदान करते हैं। इसी दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने भी अपने वनवास काल के दौरान भगवान सूर्य की विशेष उपासना की थी, जिससे उन्हें अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी और वे संपूर्ण समाज के पोषण में समर्थ हुए थे। उड़िया संस्कृति में इस दिन के साथ संकटमोचन हनुमान जी की विशेष भक्ति की परंपरा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान सूर्य हनुमान जी के गुरु हैं और उन्होंने ही बजरंगबली को समस्त वेदों और विद्याओं का ज्ञान दिया था। जब सूर्य अपनी उच्च राशि में प्रवेश करते हैं, तो शिष्य हनुमान जी की वंदना से साधक को अतुलित बल, बुद्धि और विपत्तियों से लड़ने का अदम्य साहस प्राप्त होता है। प्राचीन काल में इस दिन राजा और प्रजा दोनों मिलकर प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते थे। भीषण गर्मी के दिनों में किसी भी जीव को जल का कष्ट न हो, इसके लिए कुएं, बावड़ी और जलस्रोतों की सफाई की जाती थी। यह कथा हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में नई शुरुआत तभी सफल होती है जब हम अनुशासन, ज्ञान और परोपकार को अपने आचरण में स्थान देते हैं।

🪔 आरती

आरती पूजा के समापन का अत्यंत पवित्र चरण है। भगवान सूर्य और हनुमान जी की मुख्य पूजा और नैवेद्य समर्पण के तुरंत बाद आरती की जाती है। पीतल के दीपक में शुद्ध घी की बत्ती या कर्पूर जलाकर दाहिने हाथ से घड़ी की दिशा में घुमाते हुए आरती करें। इस समय मन को शांत रखें और घंटी या शंख की ध्वनि के साथ देवों की कृपा का अनुभव करें। आरती पूर्ण होने पर दोनों हाथों से आरती की लौ को स्पर्श कर अपने माथे पर लगाएं।

🔮 आपकी समस्या के अनुसार ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି के उपाय

आर्थिक अस्थिरता

तांबे के पात्र में शुद्ध जल और थोड़ा सा गुड़ मिलाकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें। कब: संक्रांति की सुबह सूर्योदय के समय स्नान के बाद। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 21 दिन। आपके लिए क्यों: सूर्य के मेष राशि में आने से तेज और आत्मविश्वास बढ़ता है जो आर्थिक निर्णयों को स्थिरता देता है।

करियर में रुकावट

प्रातःकाल हनुमान जी के समक्ष चमेली के तेल या घी का दीपक जलाकर कार्य में सफलता की प्रार्थना करें। कब: संक्रांति की सुबह पूजा संपन्न होने के बाद। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 40 दिन। आपके लिए क्यों: हनुमान जी की निष्ठा और सूर्य का ओज कर्मक्षेत्र में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आत्मबल प्रदान करता है।

विवाह में विलंब

सूर्य देव को जल अर्पित करते समय लोटे में एक चुटकी हल्दी और पीले पुष्प डालकर अर्घ्य दें। कब: संक्रांति की सुबह स्नान करने के तुरंत बाद। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 11 दिन। आपके लिए क्यों: सूर्य की ऊर्जा और सौम्य भावना से वैवाहिक जीवन से जुड़े व्यक्तिगत संकोच दूर होते हैं।

संतान संबंधी चिंता

पक्षियों के लिए किसी खुले स्थान या छत पर मिट्टी के सकोरे में पीने का ताजा जल रखें। कब: संक्रांति की दोपहर से पहले। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 30 दिन। आपके लिए क्यों: ग्रीष्म ऋतु में मूक प्राणियों को जल उपलब्ध कराने से मन को शांति और कुल को सात्विक पुण्य मिलता है।

पारिवारिक कलह

घर के मुख्य द्वार पर दोनों ओर ताजे जल का छिड़काव करें और संध्या समय दीपक रखें। कब: संक्रांति की शाम सूर्यास्त के समय। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 7 दिन। आपके लिए क्यों: संक्रांति पर जल का सात्विक प्रभाव घर के वातावरण से नकारात्मक तनाव को शांत करता है।

अकारण भय या नकारात्मकता

स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें और मन में ईश्वर का स्मरण करें। कब: संक्रांति की सुबह नित्यकर्म के समय। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: संक्रांति स्नान से चित्त शुद्ध होता है और मन में व्याप्त निराशा का निवारण होता है।

क्या ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି आपके लिए विशेष है?

यह संक्रांति पृष्ठ सामान्य पंचांग और पारंपरिक नियमों की जानकारी देता है। सूर्य का मेष राशि में गोचर एक व्यापक खगोलीय घटना है, जो पूरी दुनिया के लिए एक समान समय पर घटित होती है। किंतु आपकी व्यक्तिगत जन्मकुंडली में सूर्य किस भाव में बैठे हैं, उन पर किन ग्रहों की दृष्टि है और वर्तमान में आपकी कौन सी दशा चल रही है, यह केवल आपकी निजी कुंडली से ही जाना जा सकता है। त्रिकाल वाणी में रोहीत गुप्ता पराशर परंपरा के अनुसार व्यक्तिगत परामर्श प्रदान करते हैं। यदि आप करियर, धन, दशा और समय के चक्र को समझना चाहते हैं तो कुण्डली (Kundli) विश्लेषण उपयोगी होता है। वैवाहिक अनुकूलता और रिश्ते की गहराई के लिए कुण्डली मिलान (Kundali Milan) मार्ग दिखाता है। हस्तरेखा (Hastrekha) आपकी व्यक्तिगत जीवन रेखाओं का दर्पण है, जबकि स्वप्न शास्त्र (Swapna Shastra) आपके अवचेतन मन के संकेतों को समझने में मदद करता है।

शब्दावली · Glossary

संक्रांति
सूर्य का एक सौर राशि से दूसरी सौर राशि में प्रवेश करने का खगोलीय संक्रमण काल संक्रांति कहलाता है।
मेष संक्रांति
जब सूर्य अपनी प्रथम राशि मेष में प्रवेश करते हैं, इसे मेष संक्रांति और सौर वर्ष का आरंभ माना जाता है।
पुण्य काल
संक्रांति के समय के पूर्व और पश्चात का वह पवित्र समय जिसमें दान, स्नान और जप करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
अर्घ्य
तांबे अथवा शुद्ध पात्र में जल और पुष्प लेकर किसी देवता को श्रद्धापूर्वक अर्पित करने की विधि को अर्घ्य कहते हैं।
सात्विक आहार
सादा, सुपाच्य और बिना प्याज-लहसुन का भोजन जो पूजा और धार्मिक पर्वों पर मानसिक शांति बनाए रखने के लिए ग्रहण किया जाता है।
राहुकाल
दिन का वह विशिष्ट समय खंड जिसमें कोई भी नया और मांगलिक कार्य आरंभ करना पारंपरिक रूप से वर्जित माना गया है।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

  1. [1]↑बृहत् पाराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    मेषो वृषो मृगः कन्या कर्को मीनस्तथा तुला । सूर्यादीनां क्रमादेते कथिता उच्चराशयः
    — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 3 · श्लोक 49

    सूर्य आदि ग्रहों के लिए क्रमशः मेष आदि राशियों को उच्च राशि कहा गया है।

    Aries is declared to be the exaltation sign of the Sun and similarly the respective signs for the other planets.

  2. [2]↑मुहूर्त चिंतामणिमुहूर्तचिन्तामणि · Rama Daivajna
    संक्रान्तिकालादुभयत्र नाडिकाः पुण्या मताः षोडश षोडशोष्णगोः । निशीथतोऽर्वागपरत्र संक्रमे पूर्वाpराह्रांतिमपूर्वभागकौ ॥ ५ ॥
    — मुहूर्त चिंतामणि, अध्याय 3 — संक्रान्तिप्रकरणम् · श्लोक 5

    सूर्य संक्रांति के समय से पूर्व और पश्चात की सोलह-सोलह नाड़ियां धार्मिक कर्मों के लिए अत्यंत पुण्य फलदायी मानी गई हैं।

    The sixteen nadikas both before and after the precise moment of the solar transit are considered sacred for religious actions.

अहमदाबाद में ପଣା ସଂକ୍ରାନ୍ତି — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

साल 2027 में पणा संक्रांति किस दिन मनाई जाएगी?

साल 2027 में पणा संक्रांति 14 अप्रैल, बुधवार के दिन मनाई जाएगी। उड़िया पंचांग परंपरा के अनुसार जिस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, उसी दिन से वैशाख मास और नए सौर वर्ष की शुरुआत होती है। इस दिन सूर्योदय के समय से ही संक्रांति से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान आरंभ हो जाते हैं। भक्तजन प्रातःकाल से ही स्नान और सूर्य देव की उपासना की तैयारी करते हैं।

पणा संक्रांति की पूजा का सबसे शुभ समय क्या है?

संक्रांति के पर्व पर प्रातःकाल सूर्योदय के समय की गई पूजा को सबसे उत्तम माना जाता है। शास्त्रीय दृष्टि से संक्रांति के समय के दोनों ओर का पुण्य काल ध्यान और पूजा के लिए विशेष फलदायी होता है। आप अपने शहर के अनुसार ऊपर दी गई तालिका में शुभ चौघड़िया और मुहूर्त का विवरण देख सकते हैं। राहुकाल के समय को छोड़कर दिन के किसी भी पवित्र भाग में पूजा संपन्न की जा सकती है।

अलग-अलग शहरों में पूजा के मुहूर्त में अंतर क्यों होता है?

प्रत्येक नगर का अक्षांश और देशांतर भिन्न होने के कारण वहां सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग होता है। इसी भौगोलिक अंतर की वजह से स्थानीय स्तर पर संक्रांति के पुण्य काल और चौघड़िया के समय में कुछ मिनटों का बदलाव दिखता है। त्रिकाल वाणी का गणना इंजन आपके शहर के स्थानीय समय के आधार पर सटीक मुहूर्त स्वतः प्रस्तुत करता है। इसलिए पूजा का समय तय करते समय हमेशा अपनी वर्तमान भौगोलिक स्थिति की तालिका देखें।

पणा संक्रांति के दिन मुख्य रूप से क्या करना चाहिए?

इस पावन दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करना सबसे पहला कर्तव्य है। इसके बाद तांबे के पात्र से भगवान सूर्य को जल अर्पित करें और संकटमोचन हनुमान जी की उपासना करें। घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर नए वर्ष के लिए सुख, शांति और स्वास्थ्य की मंगलकामना करनी चाहिए। इसके साथ ही किसी जरूरतमंद को जल अथवा अन्न का दान देना भी परंपरा का मुख्य अंग है।

इस दिन किन कार्यों को करने से बचना चाहिए?

संक्रांति के इस पवित्र दिन घर में किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, प्याज या लहसुन नहीं बनाना चाहिए। परिवार में किसी भी व्यक्ति के साथ कटु वचन बोलने, वाद-विवाद करने या कलह से बचना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त नए वर्ष के प्रथम दिन देर तक सोने और आलस्य करने से भी बचना चाहिए। परंपरा के अनुसार संक्रांति के पावन अवसर पर बाल या नाखून काटने से भी परहेज किया जाता है।

क्या पणा संक्रांति पर उपवास रखना अनिवार्य होता है?

पणा संक्रांति मूल रूप से नववर्ष का एक सामाजिक और आध्यात्मिक उत्सव है, इसलिए इसमें निर्जला या कठोर व्रत की कोई बाध्यता नहीं है। अधिकांश श्रद्धालु प्रातःकाल पूजा संपन्न होने तक सात्विक संयम रखते हैं और उसके बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। कुछ लोग सूर्य देव के सम्मान में केवल दिन के समय फलाहार का पालन करना पसंद करते हैं। यदि आप गर्भवती हैं, अस्वस्थ हैं या दवाइयों पर हैं, तो किसी भी प्रकार के उपवास से पहले अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

इस दिन पारंपरिक रूप से क्या खाया जाता है?

इस दिन पारंपरिक रूप से जल, बेल का गूदा, दही, छेना और मौसमी फलों से बना विशेष पेय तैयार किया जाता है जिसे 'पणा' कहते हैं। इसके अलावा भुने हुए अनाजों का सत्तू (छतुआ) भी श्रद्धापूर्वक देवताओं को अर्पित कर ग्रहण किया जाता है। भोजन में पूरी तरह सात्विक पदार्थों, ऋतु फलों और सादे आहार को ही प्राथमिकता दी जाती है। यह आहार गर्मियों के मौसम में शरीर को शीतलता और ताजगी प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया जाता है।

पूजा के लिए कौन-कौन सी बुनियादी सामग्री आवश्यक है?

भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एक तांबे का लोटा और शुद्ध जल सबसे आवश्यक सामग्री है। इसके साथ ही पूजा में दीपक, घी या तिल का तेल, रोली, अक्षत और ताजे पुष्प चाहिए होते हैं। भगवान को भोग लगाने के लिए साधारण गुड़, बताशे या मौसमी फल रखे जा सकते हैं। वातावरण की शुद्धि के लिए धूप और अंत में आरती करने के लिए शुद्ध कपूर की आवश्यकता होती है।

पणा संक्रांति की पौराणिक कथा का क्या महत्व है?

यह कथा सूर्य देव के मेष राशि में प्रवेश और प्रकृति में नई ऊर्जा के संचार से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि इसी दिन से सूर्य अपनी उच्च राशि में आकर जगत को प्रखर जीवन शक्ति प्रदान करते हैं। इसके साथ ही इस दिन सूर्य देव के परम शिष्य हनुमान जी की आराधना की भी गहरी परंपरा है। यह कथा हमें सिखाती है कि नए वर्ष में हमें अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और परोपकार को प्राथमिकता देनी चाहिए।

ज्योतिष और संस्कृति में इस पर्व का क्या महत्व है?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मेष संक्रांति कालपुरुष के प्रथम भाव का आरंभ है, जो जीवन में नई चेतना का प्रतीक माना जाता है। सूर्य जब अपनी उच्च राशि में आते हैं तो वह आत्मा, मान-सम्मान और आरोग्य के संवर्धन का समय होता है। सांस्कृतिक रूप से यह उड़िया नववर्ष का दिन है, जो परिवारों को एक साथ जोड़ता है। इस दिन प्रकृति के उपहारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना समाज का मुख्य संस्कार है।

क्या इस दिन कोई नया व्यवसाय या काम शुरू किया जा सकता है?

हाँ, यह दिन नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, इसलिए इसे नए उद्यम और बहीखाते आरंभ करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। व्यापारी और पेशेवर लोग इस दिन अपनी नई योजनाओं की नींव रखते हैं और ईश्वर से सफलता की प्रार्थना करते हैं। कार्य शुरू करने से पहले भगवान सूर्य और हनुमान जी का आशीर्वाद लेना बहुत मंगलकारी समझा जाता है। आप अपने स्थानीय शुभ मुहूर्त को देखकर अपना नया कार्य प्रारंभ कर सकते हैं।

क्या इस दिन नए वस्त्र या घरेलू सामान की खरीदारी कर सकते हैं?

नववर्ष के स्वागत के लिए नए वस्त्र, आभूषण, वाहन या गृह-उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी करना अत्यंत शुभ माना गया है। लोग अपने घरों को सजाते हैं और परिवार के सदस्यों के लिए नए वस्त्र उपहार में लाते हैं। संक्रांति का यह दिन जीवन में नए उत्साह और संपन्नता का आह्वान करने के लिए अनुकूल होता है। केवल राहुकाल के समय को छोड़कर आप दिन के किसी भी शुभ समय में खरीदारी कर सकते हैं।

पणा संक्रांति पर किस मंत्र का जाप करना चाहिए?

हमारे प्रामाणिक तथ्यों के संग्रह में इस दिन के लिए किसी विशेष शास्त्रीय मंत्र का अलग से उल्लेख नहीं किया गया है। इसलिए आपको मनगढ़ंत या जटिल मंत्रों के पीछे भागने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है। आप केवल शांत मन से भगवान सूर्य और हनुमान जी का स्मरण करते हुए हाथ जोड़कर प्रार्थना कर सकते हैं। ईश्वर की भक्ति में शब्दों के आडंबर से अधिक आपके मन की श्रद्धा और निष्ठा महत्वपूर्ण होती है।

इस दिन किस प्रकार का दान करना सबसे उत्तम माना गया है?

चूंकि यह पर्व ग्रीष्म ऋतु के आगमन का दिन है, इसलिए राहगीरों और जरूरतमंदों को शीतल जल पिलाना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है। इसके अलावा घड़े, पंखे, छाते या सत्तू का दान करना भी पारंपरिक रूप से बहुत कल्याणकारी माना गया है। यदि संभव हो तो भूखे लोगों को सात्विक भोजन कराएं और पशु-पक्षियों के लिए पानी का प्रबंध करें। निस्वार्थ भाव से किया गया छोटा सा दान भी संक्रांति पर अक्षय पुण्य प्रदान करता है।

जीवन में शांति और स्थिरता के लिए इस दिन क्या सरल उपाय किया जा सकता है?

संक्रांति की सुबह स्नान के पश्चात तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करना सबसे सरल और प्रभावशाली उपाय है। यदि मन में कोई तनाव या भय हो, तो हनुमान जी के समक्ष एक दीपक जलाकर संकट निवारण की प्रार्थना करें। इसके अतिरिक्त पक्षियों के लिए अपनी छत या बालकनी पर पीने का पानी रखना अत्यंत शुभ फल देता है। ये सभी कार्य पूरी तरह निःशुल्क या अत्यंत कम लागत में बिना किसी आडंबर के किए जा सकते हैं।

क्या संक्रांति की मुख्य पूजा रात के समय की जा सकती है?

संक्रांति का पर्व प्रत्यक्ष देव सूर्य नारायण से संबंधित है, इसलिए इसकी मुख्य पूजा दिन के उजाले में ही की जाती है। सूर्य को अर्घ्य देने और संकल्प लेने का सबसे उचित समय प्रातःकाल अथवा दोपहर से पूर्व का होता है। रात के समय सामान्य संध्या आरती या मानसिक ध्यान तो कर सकते हैं, किंतु संक्रांति का मुख्य विधान दिन में ही पूर्ण होता है। इसलिए समय का नियोजन इस प्रकार करें कि मुख्य अनुष्ठान दिन के समय ही संपन्न हो जाए।

पणा संक्रांति और वैशाखी या पोइला बैशाख में क्या अंतर है?

ये सभी त्योहार सौर कैलेंडर के अनुसार सूर्य के मेष राशि में प्रवेश यानी मेष संक्रांति के अवसर पर ही मनाए जाते हैं। पणा संक्रांति विशेष रूप से ओडिशा राज्य का पारंपरिक नववर्ष है, जिसमें 'पणा' पेय और हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है। वहीं वैशाखी पंजाब में कृषि और खालसा स्थापना का उत्सव है, जबकि पोइला बैशाख बंगाल का पारंपरिक नववर्ष है। मूल खगोलीय घटना एक ही है, किंतु विभिन्न क्षेत्रों की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं इसे अपने-अपने ढंग से मनाती हैं।

पणा संक्रांति को उड़िया नववर्ष क्यों कहा जाता है?

ओडिशा की पंचांग प्रणाली में सौर महीनों की गणना सूर्य की संक्रांति के दिन से ही की जाती है। जब सूर्य मेष राशि में आते हैं, तो उस संक्रांति वाले दिन से ही पहले महीने यानी वैशाख का पहला दिन माना जाता है। कैलेंडर सुधार समिति (1955) के नियमों के अनुसार भी उड़िया मास की गणना संक्रांति के सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक होती है। इसी शास्त्रीय गणना के आधार पर पणा संक्रांति को पारंपरिक उड़िया नववर्ष का दर्जा प्राप्त है।

पणा संक्रांति के दिन 'पणा' नामक पेय क्यों बनाया जाता है?

वैशाख महीने के साथ ही भीषण गर्मी की शुरुआत होती है, जिससे शरीर में जल और ऊर्जा की कमी होने लगती है। हमारे पूर्वजों ने ऋतुचर्या के अनुकूल ऐसे पेय का विधान किया जो शरीर को तुरंत ऊर्जा और ठंडक प्रदान करे। यह पेय भगवान को अर्पित करने के बाद सभी परिजनों और पड़ोसियों में प्रेमपूर्वक वितरित किया जाता है। यह परंपरा सामाजिक सौहार्द और स्वास्थ्य सुरक्षा दोनों को एक साथ साधने का अनुपम उदाहरण है।

साल 2027 में पणा संक्रांति के दिन पंचांग की क्या स्थिति रहेगी?

साल 2027 में 14 अप्रैल को पणा संक्रांति के दिन बुधवार का संयोग बन रहा है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सूर्योदय के समय शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि विद्यमान रहेगी। इस दिन नक्षत्र पुनर्वसु रहेगा और सुकर्मा योग का सुंदर प्रभाव बना रहेगा। इन सभी शुभ खगोलीय योगों के बीच सूर्य का मेष राशि में प्रवेश नववर्ष के लिए अत्यंत मंगलकारी माना जा रहा है।

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