कोलकाता · West Bengal

कोलकाता में വിഷു

गुरुवार, 15 अप्रैल 2027· Read in English →

त्रिकाल संदेश — सीधा उत्तर

केरल का नववर्ष विशु इस वर्ष 15 अप्रैल 2027, गुरुवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्योदय के समय शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि, पुष्य नक्षत्र और धृति योग रहेगा। इस पावन अवसर पर प्रातःकाल भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करना, घर में सुख-समृद्धि के लिए मंगल दर्शन करना और बड़ों का आशीर्वाद लेना मुख्य परंपरा है।

🕐 कोलकाता के लिए വിഷു का समय

सूर्योदय की तिथिNavami (Shukla Paksha) — 13:21 तक
पर्व की तिथिSankranti 13:21 से
नक्षत्रPushya, पाद 4 — 09:33 तक
योग · करणDhriti · Kaulava
अभिजित मुहूर्त11:11-12:01
राहुकाल13:10-14:44
यमगंड · गुलिक05:20-06:54 · 08:28-10:02
सूर्योदय · सूर्यास्त05:20 · 17:53

कोलकाता (22.5726, 88.3639) के लिए स्विस एफ़ेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से गणना। पाँचों अंग स्थानीय सूर्योदय पर।

मुफ़्त कुंडली — कोई भुगतान नहीं, कोई साइनअप नहीं →

✅ വിഷു पर क्या करें

  1. प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर शुद्ध जल से स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा के स्थान को अच्छी तरह साफ करके उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा चित्र के सम्मुख घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
  4. आचमन करके हाथ में जल लेकर नए वर्ष के मंगलमय जीवन का मन ही मन संकल्प लें।
  5. भगवान विष्णु को चंदन, अक्षत और ताजे पुष्प श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
  6. शांत भाव से बैठकर भगवान विष्णु का ध्यान करें और अपने कल्याण की प्रार्थना करें।
  7. पूजा संपन्न होने पर बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें और प्रसाद बांटें।

समय कम है? → 5-मिनट पूजा विधि

📜 यह तारीख कैसे तय हुई

The Sun enters Mesha at 14 Apr 2027 15:28 IST. The transit falls past three fifths of the daylight from sunrise, so the Malabar rule opens the month the following day. Medam therefore begins on 15 Apr 2027. (Report of the Calendar Reform Committee, Govt of India 1955, “Rules of Samkranti”, p.244)

त्रिकाल वाणी द्वारा स्विस एफ़ेमेरिस और शास्त्रीय निर्णय नियमों से गणना — निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, और कैलेंडर रिफ़ॉर्म कमेटी की रिपोर्ट। किसी अन्य पंचांग से नकल नहीं।

🕐 भारत भर में വിഷു का समय

शहरसूर्योदयअभिजित मुहूर्तराहुकाल
कोलकाता05:2011:11-12:0113:10-14:44
दिल्ली एनसीआर06:0011:55-12:4613:56-15:31
मुंबई06:2512:13-13:0314:11-15:45
नोएडा05:5911:55-12:4513:55-15:31
गुरुग्राम06:0111:56-12:4713:57-15:32
बेंगलुरु06:1011:54-12:4313:51-15:23
हैदराबाद06:0411:51-12:4013:49-15:22
पुणे06:2112:09-12:5814:07-15:40
चेन्नई06:0011:44-12:3313:41-15:13
अहमदाबाद06:2312:14-13:0414:13-15:47

വിഷു क्यों मनाया जाता है

विशु केरल और आसपास के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला अत्यंत पावन सौर नववर्ष का पर्व है। यह दिन सौर पंचांग के अनुसार मेदम मास के प्रथम दिन पड़ता है, जब सूर्य देव राशि चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करते हैं। भारतीय खगोल और वैदिक परंपरा में इस संक्रमण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यहीं से सौर वर्ष का नया चक्र आरंभ होता है। विषु शब्द का मूल अर्थ समान दिन और रात से जुड़ा हुआ है, जो प्रकृति में संतुलन और नए जीवन के आरंभ का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टि से यह पर्व सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र में समय के निरंतर प्रवाह को भगवान का ही प्रत्यक्ष रूप माना गया है। महर्षि पराशर के सिद्धांत के अनुसार साक्षात अव्यक्त भगवान विष्णु ही काल-स्वरूप जनार्दन हैं और राशि चक्र में मेष आदि राशियां उनके ही पवित्र अंग हैं [2]। इसलिए जब सूर्य मेष राशि में पदार्पण करते हैं, तो उस संक्रांति काल को भगवान विष्णु के विराट स्वरूप के नूतन जागरण के रूप में देखा जाता है। वैदिक खगोल ग्रंथों में भी इस परिवर्तन को विशेष महत्व दिया गया है। सूर्य सिद्धांत के अनुसार अयन और विषुव के समय संक्रांति का काल विशेष रूप से अत्यंत पुण्यदायी माना गया है [3]। इस पावन काल में की गई पूजा, ध्यान और सात्विक कर्म पूरे वर्ष के जीवन को संतुलित और सकारात्मक बनाए रखने में सहायक होते हैं। प्रकृति जब ऋतु परिवर्तन के साथ नव पल्लवित होती है, तब मनुष्य भी अपने चित्त को नए संकल्पों से भरने का प्रयास करता है। पारंपरिक रूप से यह मान्यता है कि नववर्ष के पहले दिन मनुष्य जिस सात्विक ऊर्जा, सौंदर्य और पवित्रता का सबसे पहले दर्शन करता है, उसी का प्रभाव उसके आगामी पूरे वर्ष पर रहता है। इसलिए इस दिन प्रातःकाल उठते ही मन को शुद्ध विचारों और भगवान की छवि से जोड़ने की परंपरा है। जीवन में सुख, शांति, अन्न और समृद्धि की कामना के साथ यह दिन परिवार के सभी सदस्यों को एक सूत्र में पिरोता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि समय का सम्मान करना ही ईश्वर की सच्ची उपासना है। जब ऋतुएं बदलती हैं और सूर्य अपनी नई यात्रा प्रारंभ करते हैं, तो हमें भी अपने भीतर की नकारात्मकता को त्यागकर नए उत्साह के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सरल जीवन, सात्विक आचरण और बड़ों के प्रति आदर का भाव ही इस पर्व की मूल आत्मा है।

🪔 വിഷു पूजा विधि

  1. आत्म शुद्धि — प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  2. दीप प्रज्वलन — भगवान विष्णु की प्रतिमा के सम्मुख शुद्ध घी अथवा तेल का दीपक जलाकर प्रकाश स्थापित करें।
  3. आचमन एवं शुद्धि — दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें और अपने ऊपर व पूजा सामग्री पर जल छिड़कें।
  4. नववर्ष संकल्प — हाथ में थोड़ा जल और अक्षत लेकर नए वर्ष में परिवार के कल्याण और शांति का मन में संकल्प लें।
  5. भगवान विष्णु का ध्यान — आंखें बंद करके शांत चित्त से जगत के पालनहार भगवान विष्णु के शांत और मंगलकारी रूप का स्मरण करें।
  6. जल अर्पण — तांबे या पीतल के पात्र से भगवान के सम्मुख प्रेमपूर्वक शुद्ध जल अर्पित करें।
  7. गंध एवं अक्षत अर्पण — भगवान विष्णु को शुद्ध चंदन या रोली का तिलक लगाएं और बिना टूटे साबुत अक्षत समर्पित करें।
  8. पुष्प समर्पण — ताजे और सुगंधित पुष्प श्रद्धा भाव से भगवान के चरणों में अर्पित करें।
  9. धूप अर्पण — धूपबत्ती या अगरबत्ती जलाकर वातावरण को सुगंधित और पवित्र बनाएं।
  10. मंगल दर्शन एवं प्रार्थना — भगवान के विग्रह का दर्शन करें और वर्ष भर धर्म, सुख और स्वास्थ्य बने रहने की प्रार्थना करें।
  11. आरती — दीपक को घुमाते हुए भगवान विष्णु की भावपूर्ण आरती करें और अपने दोनों हाथों से आरती ग्रहण करें।
  12. चरण वंदना एवं आशीर्वाद — पूजा के अंत में भगवान को साष्टांग प्रणाम करें तथा घर के वरिष्ठ जनों के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें।

⚡ 5-मिनट विधि

  1. प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थान पर दीपक जलाएं।
  2. हाथ में जल लेकर नए वर्ष के मंगल और सुख-शांति का संकल्प करें।
  3. भगवान विष्णु को चंदन का तिलक लगाएं और ताजे पुष्प अर्पित करें।
  4. दो मिनट शांत बैठकर भगवान का ध्यान करें और कल्याण की प्रार्थना करें।
  5. श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके दीपक की आरती लें और परिवार के बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करें।

🛒 വിഷു पूजा सामग्री

आवश्यक

  • भगवान विष्णु का चित्र अथवा विग्रह
  • पूजा की स्वच्छ थाली
  • दीपक (पीतल या मिट्टी का)
  • दीपक के लिए घी अथवा तेल और रुई की बत्ती
  • शुद्ध जल के लिए आचमन पात्र व चम्मच
  • चंदन अथवा रोली
  • अक्षत (अखंडित साबुत चावल)
  • ताजे स्वच्छ पुष्प
  • धूप अथवा अगरबत्ती

वैकल्पिक

  • पीतल की घंटी
  • पूजा के लिए साफ पीला या लाल आसन
  • गंगाजल
  • कपूर
  • आरती की अलग छोटी थाली

अगर कुछ उपलब्ध न हो

  • यदि पीतल का दीपक उपलब्ध न हो, तो मिट्टी का स्वच्छ दीपक पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि तांबे का जल पात्र उपलब्ध न हो, तो किसी भी स्वच्छ धातु का लोटा पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि चंदन उपलब्ध न हो, तो रोली का तिलक पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि ताजे पुष्प उपलब्ध न हो, तो शुद्ध अक्षत अर्पित करना पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि गंगाजल उपलब्ध न हो, तो साधारण शुद्ध व स्वच्छ जल पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।

❓ വിഷു: क्या करें और क्या न करें

क्या इस दिन सिर धोकर स्नान करना चाहिए?

हाँ, नववर्ष के पहले दिन प्रातःकाल सिर से पूर्ण स्नान करना अत्यंत शुभ और पारंपरिक माना जाता है। इससे शरीर और मन दोनों में शुद्धि और ताजगी आती है।

क्या इस दिन नाखून या बाल काट सकते हैं?

संक्रांति और नववर्ष के पावन दिन पर बाल या नाखून काटना पारंपरिक रूप से वर्जित माना जाता है। ऐसे सभी कार्य पर्व से एक दिन पहले ही पूरे कर लेने चाहिए।

क्या पूजा से पहले कुछ खा या पी सकते हैं?

सामान्यतः प्रातःकाल की मुख्य पूजा और दर्शन करने तक निराहार रहना सबसे उत्तम माना जाता है। यदि स्वास्थ्य संबंधी कोई विवशता हो, तो जल या सादा पेय लिया जा सकता है।

क्या इस दिन भोजन में नमक का सेवन किया जा सकता है?

हाँ, यह पर्व उपवास का नहीं बल्कि नववर्ष के आनंद और उत्सव का दिन है, इसलिए सात्विक भोजन में नमक का प्रयोग पूर्णतः मान्य है। केवल भोजन सात्विक और शुद्ध होना चाहिए।

क्या इस दिन नया व्यापार या नया काम शुरू कर सकते हैं?

नववर्ष का दिन नई शुरुआत और नए संकल्पों के लिए बहुत शुभ माना जाता है। दिन के शुभ समय और शुभ चौघड़िया या अभिजीत मुहूर्त में नया कार्य प्रारंभ किया जा सकता है।

क्या इस पावन दिन पर सोने या कपड़ों की खरीदारी कर सकते हैं?

हाँ, वर्ष के पहले दिन नए वस्त्र, बर्तन या स्वर्ण आदि की खरीदारी को समृद्धिदायक माना जाता है। परिवार के लिए उपहार और उपयोगी वस्तुएं खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है।

क्या पूजा समाप्त होने के बाद तुरंत भोजन कर सकते हैं?

पूजा और मंगल दर्शन संपन्न होने के बाद परिवार के साथ बैठकर सात्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है। भोजन से पहले भगवान को भोग अर्पित करना एक अच्छी परंपरा है।

क्या यह पूजा रात्रि के समय की जा सकती है?

नहीं, विशु का मुख्य विधान सूर्योदय के समय प्रातःकाल में ही दर्शन और पूजन करने का है। संक्रांति और नववर्ष का आध्यात्मिक स्वागत प्रभात वेला में ही सबसे श्रेष्ठ माना गया है।

क्या इस दिन यात्रा करना शास्त्रसम्मत है?

यदि आवश्यक न हो तो नववर्ष के दिन लंबी यात्रा से बचना चाहिए ताकि पूरा दिन परिवार के साथ शांति से व्यतीत हो सके। अत्यंत आवश्यक कार्य होने पर शुभ दिशाशूल विचार कर यात्रा कर सकते हैं।

क्या पूजा में घर के बच्चों का शामिल होना आवश्यक है?

हाँ, इस पर्व का मूल उद्देश्य ही परिवार में अच्छे संस्कारों का संचार करना है। बच्चों को प्रातःकाल दर्शन कराना और बड़ों से आशीर्वाद दिलाना इस दिन का प्रमुख संस्कार है।

क्या इस दिन घर में कलह या वाद-विवाद से बचना चाहिए?

वर्ष के प्रथम दिन मन, वचन और कर्म से पूर्ण शांति बनाए रखनी चाहिए। माना जाता है कि वर्ष के पहले दिन का आचरण पूरे वर्ष के पारिवारिक वातावरण को प्रभावित करता है।

क्या इस दिन तामसिक भोजन का सेवन किया जा सकता है?

संक्रांति और नववर्ष के पवित्र अवसर पर तामसिक भोजन, मदिरा और मांसाहार का सेवन पूरी तरह त्याज्य है। इस दिन घर में केवल शुद्ध, सात्विक और पारंपरिक व्यंजन ही बनने चाहिए।

क्या किसी सूतक या पातक की स्थिति में यह पूजा की जा सकती है?

यदि परिवार में जन्म या मृत्यु के कारण अशौच चल रहा हो, तो मूर्ति स्पर्श और प्रत्यक्ष पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसे समय में केवल मानसिक रूप से भगवान का स्मरण करना उचित है।

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⚠️ आम गलतियाँ

  • प्रातःकाल देर से सोकर उठने से नववर्ष के प्रथम सूर्योदय की सात्विक ऊर्जा और दर्शन का लाभ अधूरा रह जाता है।
  • पूजा में बिना आचमन और शुद्धि के सीधे दीपक जलाने से पूजन का प्रारंभिक शास्त्रीय क्रम अधूरा माना जाता है।
  • भगवान विष्णु के सम्मुख टूटे हुए अथवा खंडित अक्षत अर्पित करने से समर्पण की पूर्णता नहीं मानी जाती।
  • पूजा के दौरान मन में क्रोध या अशांति रखने से ध्यान और आराधना का वास्तविक फल प्राप्त नहीं होता।
  • पूजा समाप्त करने के बाद घर के वरिष्ठ जनों का आशीर्वाद न लेने से नववर्ष का अनुष्ठान अपूर्ण रह जाता है।
  • बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा सामग्री को स्पर्श करने से अनुष्ठान की मर्यादा खंडित होती है।
  • दिन भर सात्विक आचरण न रखकर व्यर्थ विवादों में समय गंवाने से पर्व का आध्यात्मिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

📖 വിഷു कथा

विशु पर्व के पीछे कई प्राचीन और प्रेरणादायी पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। दक्षिण भारत की लोक मान्यताओं में एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा लंकापति रावण के अभिमान और उसके अंत से संबंधित है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार रावण ने अपने तपोबल और अहंकार के वशीभूत होकर समस्त नवग्रहों को अपने अधीन कर लिया था। उसने सूर्य देव को भी विवश कर दिया था कि वे उसकी इच्छानुसार ही उदित और अस्त हों। सूर्य देव लंका के आकाश में रावण की आज्ञा के बिना सीधा प्रकाश नहीं फैला सकते थे। जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने रावण का वध कर धर्म की पुनर्स्थापना की, तब समस्त देवगण और ग्रह उसके भय से मुक्त हुए। ऐसा माना जाता है कि रावण के आतंक की समाप्ति के बाद इसी पावन दिन सूर्य देव ने पहली बार पूर्व दिशा से अपनी पूरी स्वतंत्रता, तेज और गरिमा के साथ उदित होकर संसार को नवजीवन प्रदान किया था। इस मुक्ति और नव प्रभात के आनंद को लोगों ने उत्सव के रूप में मनाया, जो कालांतर में नववर्ष का प्रतीक बन गया। एक अन्य लोकप्रिय कथा के अनुसार, यह दिन भगवान श्री कृष्ण द्वारा नरकासुर पर विजय प्राप्त करने की पावन स्मृति से भी जुड़ा हुआ है। नरकासुर के अत्याचारों से जब तीनों लोक त्रस्त हो उठे थे, तब भगवान ने उसका संहार कर समस्त बंदी जनों को अभयदान दिया था। विजय के उपरांत जब प्रभात हुआ, तो समस्त प्रजा ने भगवान के मंगल दर्शन कर उनका अभिनंदन किया। इस प्रकार यह कथा हमें यह सनातन संदेश देती है कि चाहे अंधकार और अन्याय कितना भी प्रबल क्यों न प्रतीत हो, अंततः सत्य, धर्म और प्रकाश की ही विजय होती है। नववर्ष का यह प्रभात केवल कैलेंडर का बदलना नहीं है, बल्कि हमारे जीवन से अज्ञान, आलस्य और अहंकार के अंधकार को समाप्त कर परमात्मा के आलोक को अपनाने का पावन पर्व है।

🪔 आरती

भगवान विष्णु की आरती मुख्य पूजा के समापन पर श्रद्धापूर्वक की जाती है। पीतल या मिट्टी के दीपक में शुद्ध घी अथवा तेल की बाती जलाकर आरती की थाली सजाएं। थाली को भगवान के सम्मुख घड़ी की सुई की दिशा में गोलाकार घुमाते हुए एकाग्र मन से आरती करें। आरती करते समय घंटी बजाना वातावरण को सकारात्मक बनाता है। आरती पूर्ण होने के बाद स्वयं और परिवार के सभी सदस्यों को दोनों हाथों से आरती की पवित्र ज्योति का स्पर्श कराएं।

🔮 आपकी समस्या के अनुसार വിഷു के उपाय

धन समस्या

तांबे के पात्र में स्वच्छ जल भरकर उसमें चुटकी भर हल्दी मिलाएं और भगवान विष्णु के सम्मुख रखें। कब: पर्व के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: मेष संक्रांति के सौर दिवस पर भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में समृद्धि का भाव जाग्रत करने की परंपरा है।

करियर में रुकावट

उगते सूर्य देव को तांबे के लोटे से अर्घ्य दें और अपने कर्मक्षेत्र में सफलता का मौन संकल्प लें। कब: पर्व के दिन प्रातः सूर्योदय के तुरंत बाद। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 7 दिन। आपके लिए क्यों: सूर्य के मेष राशि में प्रवेश पर आत्मबल और कर्मक्षेत्र में नई ऊर्जा के संचार का विश्वास माना जाता है।

वैवाहिक विलंब या तनाव

एक पीले पुष्प पर थोड़ा सा चंदन लगाकर भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करें। कब: पर्व के दिन प्रातः पूजन के समय। खर्च: ₹10. कितने दिन: 11 दिन। आपके लिए क्यों: भगवान विष्णु की अर्चना से संबंधों में मधुरता और पारिवारिक संतुलन की शास्त्रीय मान्यता है।

संतान संबंधी चिंता

तुलसी के पौधे के समीप गाय के घी का एक छोटा दीपक जलाकर उसकी परिक्रमा करें। कब: पर्व के दिन संध्याकाल में सूर्यास्त के समय। खर्च: ₹10. कितने दिन: 21 दिन। आपके लिए क्यों: सौर नववर्ष के पावन अवसर पर संतान के उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की मंगल प्रार्थना का विधान है।

गृह क्लेश व अशांति

घर के मुख्य द्वार पर स्वच्छ जल का छिड़काव करें और दोनों ओर हल्दी से स्वास्तिक बनाएं। कब: पर्व के दिन प्रातःकाल घर की सफाई के बाद। खर्च: ₹10. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: नववर्ष के प्रथम दिन घर की देहरी पर सकारात्मक ऊर्जा और मंगल भाव की स्थापना की लोक परंपरा है।

नकारात्मक ऊर्जा या भय

पूजा के उपरांत तांबे के पात्र के जल से पूरे घर में आचमनी द्वारा जल के छींटे दें। कब: पर्व के दिन दोपहर के भोजन से पूर्व। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 3 दिन। आपके लिए क्यों: संक्रांति के पावन काल में वातावरण की शुद्धि और नकारात्मक विचारों के शमन की पारंपरिक मान्यता है।

क्या വിഷു आपके लिए विशेष है?

इस पर्व पर बताए गए सामान्य नियम सभी के लिए एक समान रूप से लागू होते हैं। खगोलीय संक्रमण का प्रभाव पूरी प्रकृति पर पड़ता है, लेकिन आपकी जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति अनूठी होती है। सामान्य लेख यह नहीं बता सकता कि आपकी व्यक्तिगत महादशा क्या संकेत कर रही है। त्रिकाल वाणी में हम आपकी कुंडली के आधार पर व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। हमारी जन्म कुंडली सेवा से आप करियर, धन और समय के उतार-चढ़ाव को समझ सकते हैं। यदि वैवाहिक जीवन का प्रश्न है, तो कुंडली मिलान से स्वभाव और अनुकूलता का सटीक आकलन होता है। जन्म विवरण के अभाव में हस्तरेखा विश्लेषण हथेली की रेखाओं से मार्गदर्शन प्रदान करता है। वहीं स्वप्न शास्त्र के माध्यम से आप निरंतर आने वाले विशेष स्वप्नों का अर्थ जान सकते हैं।

शब्दावली · Glossary

मेष संक्रांति
सौर पंचांग के अनुसार वह संक्रमण काल जिससे नए सौर वर्ष और मेदम मास का आरंभ माना जाता है।
विषुवत्
वह खगोलीय स्थिति जब दिन और रात की अवधि बराबर होती है और सूर्य विषुव रेखा के समीप रहता है।
मेदम मास
केरल के पारंपरिक सौर पंचांग का प्रथम मास, जिससे नववर्ष की शुरुआत होती है।
अभिजीत मुहूर्त
दोपहर के समय का वह शुभ काल, जिसे पारंपरिक रूप से पूजा-अर्चना और नए कार्यों के लिए उत्तम माना जाता है।
राहुकाल
दिन का वह विशिष्ट समयखंड, जिसमें शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार नए अथवा मांगलिक कार्य का आरंभ वर्जित माना गया है।
संकल्प
पूजा या अनुष्ठान के आरंभ में हाथ में जल लेकर अपने पूजन और धर्म के पालन की मानसिक प्रतिज्ञा करना।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

  1. [1]↑पंच सिद्धांतिका
    मेषतुलादौ विषुवत् षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु। षडशीतिमुखेषु रवेः पितृदिवसा येऽवशेषाः स्युः
    — पंच सिद्धांतिका, अध्याय 3 — वासिष्ठपौलिशसिद्धान्तौ · श्लोक 23

    मेष और तुला राशि में सूर्य के प्रवेश पर विषुवत् होता है।

    The equinox occurs at the solar ingress into Mesha and Tula signs.

  2. [2]↑बृहत् पाराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    यदव्यक्तात्मको विष्णुः कालरूपो जनार्दनः । तस्याङ्गानि निबोध त्वं क्रमान्मेषादिराश्यः
    — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 · श्लोक 2

    अव्यक्त स्वरूप भगवान विष्णु ही काल-रूपी जनार्दन हैं, जिनके अंग क्रमशः मेष आदि राशियां हैं।

    The unmanifest Lord Vishnu is Janardana in the form of Time, whose limbs in order are the signs beginning with Mesha.

  3. [3]↑सूर्य सिद्धांत
    सौरमानस्य।अथ सौरेण व्यवहारं प्रदर्शयतिसौरेण युनिशोर्मानं षडशीतिमुखानि च। अयनं विषुवच्चैवं संक्रान्तेः पुण्यकालता
    — सूर्य सिद्धांत, अध्याय 10 — ज्योतिषाधिकारः · श्लोक 3

    अयन और विषुव के समय सूर्य संक्रांति का काल अत्यंत पुण्यदायी होता है।

    The ingress of the Sun at the solstices and equinoxes marks a time of supreme religious merit.

कोलकाता में വിഷു — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वर्ष 2027 में विशु का त्योहार किस तारीख को मनाया जाएगा?

इस वर्ष विशु का पावन पर्व 15 अप्रैल 2027, गुरुवार को मनाया जाएगा। सौर पंचांग के अनुसार इसी दिन केरल के पारंपरिक सौर मास मेदम का शुभारंभ हो रहा है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में सूर्योदय के समय नवमी तिथि, पुष्य नक्षत्र और धृति योग का संयोग रहेगा। भक्त इस दिन प्रातःकाल से ही पूजन और नववर्ष के दर्शन की परंपरा का पालन करेंगे।

विशु की मुख्य पूजा और मंगल दर्शन का सबसे सही समय क्या है?

इस पर्व पर सबसे मुख्य विधान प्रातःकाल सूर्योदय के समय भगवान के दर्शन और पूजन का होता है। भक्तगण ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय के समय जागकर अपनी आंखें खोलते ही भगवान की छवि का दर्शन करते हैं। आपके शहर के अनुसार सटीक सूर्योदय और प्रातःकालीन समय इस पृष्ठ पर दी गई तालिका में दिखाया गया है। उसी समयावधि में पूजा संपन्न करना सबसे शुभ और मंगलकारी माना गया है।

क्या इस दिन पूजा के लिए कोई विशेष चौघड़िया या अभिजीत मुहूर्त देखना आवश्यक है?

विशु का मुख्य संकल्प प्रातःकालीन वेला में ही लिया जाता है, इसलिए सूर्योदय का समय ही इसके लिए मुख्य माना गया है। यदि आप कोई नया कार्य या बड़ा अनुष्ठान शुरू कर रहे हैं, तो पृष्ठ पर दर्शाए गए अभिजीत मुहूर्त का उपयोग कर सकते हैं। राहुकाल की अवधि में नए कार्यों की शुरुआत करने से बचना पारंपरिक रूप से श्रेयस्कर रहता है। तालिका में आपके शहर के अनुसार राहुकाल का समय स्पष्ट रूप से दिया गया है।

विशु के पावन दिन पर घर में मुख्य रूप से क्या करना चाहिए?

प्रातःकाल उठते ही सबसे पहले भगवान विष्णु की प्रतिमा और पवित्र वस्तुओं का मंगल दर्शन करें। इसके बाद स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और विधिवत धूप-दीप जलाकर पूजन संपन्न करें। पूजा के बाद परिवार के सभी छोटे सदस्य अपने बुजुर्गों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। अंत में पूरा परिवार साथ बैठकर शुद्ध और सात्विक पारंपरिक भोजन का आनंद लेता है।

विशु के पावन पर्व पर किन बातों और गलतियों से बचना चाहिए?

नववर्ष के प्रथम दिन किसी भी प्रकार के पारिवारिक कलह, कटु वाणी और क्रोध से पूर्णतः बचना चाहिए। इस दिन देर तक सोते रहना अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के स्थान को छूना अनुचित माना जाता है। घर में तामसिक भोजन, मदिरा अथवा मांसाहार का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित रखें। किसी भी जरूरतमंद को द्वार से खाली हाथ लौटाने की भूल इस दिन नहीं करनी चाहिए।

क्या विशु के दिन पूरे दिन का उपवास या व्रत रखा जाता है?

विशु का पर्व मूल रूप से आनंद, उल्लास और नववर्ष के उत्सव का दिन है, इसलिए इसमें निर्जला या दिन भर का कठिन उपवास नहीं होता। अधिकांश श्रद्धालु प्रातःकाल पूजा और दर्शन संपन्न होने तक ही निराहार रहते हैं। पूजा के बाद परिवार सहित सात्विक भोजन ग्रहण करने की ही मुख्य परंपरा है। यदि किसी को कोई स्वास्थ्य समस्या या रोग हो, तो उसे भूखे रहने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

इस दिन भोजन में क्या खाना चाहिए और किस तरह का आहार बनता है?

इस पावन दिन पर पारंपरिक रूप से सभी रसों से युक्त शुद्ध शाकाहारी और सात्विक भोजन बनाया जाता है। भोजन में खट्टे, मीठे, कड़वे और नमकीन स्वादों का संतुलन जीवन के हर अनुभव को स्वीकार करने का संदेश देता है। भोजन में प्याज, लहसुन और अन्य तामसिक वस्तुओं का उपयोग पूरी तरह वर्जित माना गया है। सबसे पहले तैयार सात्विक भोजन का भोग भगवान को अर्पित किया जाता है और फिर प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।

पूजा के लिए न्यूनतम आवश्यक सामग्री क्या होनी चाहिए?

पूजा के लिए भगवान विष्णु का सुंदर चित्र या प्रतिमा, एक स्वच्छ थाली और शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक आवश्यक है। इसके साथ ही आचमन के लिए तांबे या पीतल का पात्र, शुद्ध जल, रोली अथवा चंदन और अक्षत की आवश्यकता होती है। यदि संभव हो तो ताजे सुगंधित पुष्प और धूपबत्ती की व्यवस्था भी अवश्य कर लें। किसी दुर्लभ सामग्री के अभाव में साधारण शुद्ध जल और भावपूर्ण प्रार्थना ही पर्याप्त मानी जाती है।

विशु के साथ कौन सी मुख्य पौराणिक कथा जुड़ी हुई है?

एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा रावण के संहार के बाद सूर्य देव उसके बंधन से मुक्त हुए थे। रावण के भय से मुक्त होकर सूर्य देव ने पहली बार पूर्व दिशा से स्वतंत्र होकर अपनी संपूर्ण ऊर्जा के साथ दर्शन दिए थे। दूसरी कथा भगवान श्री कृष्ण द्वारा अत्याचारी नरकासुर के वध और प्रजा को अभयदान देने से संबंधित है। दोनों ही कथाएं हमें अधर्म पर धर्म और अंधकार पर प्रकाश की शाश्वत विजय का स्मरण कराती हैं।

ज्योतिषीय और आध्यात्मिक दृष्टि से विशु का क्या महत्व है?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह दिन सौर वर्ष का आरंभ बिंदु है, जब सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश करते हैं। महर्षि पराशर के सिद्धांत में काल-पुरुष के रूप में भगवान विष्णु के अंगों का आरंभ मेष राशि से ही माना गया है। यह संक्रमण प्रकृति में शीत और ग्रीष्म के संतुलन तथा नवजीवन के संचार का प्रतीक है। इस दिन की गई आराधना पूरे वर्ष के लिए चित्त को सात्विक और ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है।

क्या विशु के दिन नई नौकरी, दुकान या नया कार्य शुरू किया जा सकता है?

नववर्ष का प्रथम दिन किसी भी शुभ और कल्याणकारी नए कार्य के आरंभ के लिए बहुत उत्तम माना जाता है। संक्रांति के इस पुण्य काल में शुरू किए गए कार्यों में स्थिरता और शुभता का वास माना गया है। बस यह ध्यान रखें कि कार्य की शुरुआत पृष्ठ पर दी गई तालिका के अनुसार राहुकाल की अवधि में न हो। शुभ समय या अभिजीत मुहूर्त में ईश्वर का स्मरण करके कदम आगे बढ़ाएं।

क्या इस दिन वस्त्र, बर्तन या सोना खरीदना शुभ माना जाता है?

हाँ, वर्ष के प्रथम दिन सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में नए वस्त्र, आभूषण अथवा उपयोगी घरेलू वस्तुएं खरीदना अत्यंत शुभ है। परंपरा के अनुसार नववर्ष के दिन घर में नई और मंगलकारी वस्तुओं का आगमन वर्ष भर संपन्नता बनाए रखता है। परिवार के छोटे बच्चों को उपहार या नए वस्त्र देना इस दिन का विशेष आनंद माना जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार सादगी से की गई खरीदारी श्रेष्ठ फल देती है।

विशु की पूजा के समय कौन सा मंत्र पढ़ना चाहिए?

इस पर्व के लिए पंचांग और शास्त्रों में कोई एक अनिवार्य या विशिष्ट मंत्र दर्ज नहीं है। आप अत्यंत सरल और शांत भाव से केवल भगवान विष्णु के नाम का स्मरण कर सकते हैं। अपनी मातृभाषा में शुद्ध हृदय से की गई प्रार्थना भी भगवान को उतनी ही प्रिय होती है। किसी भी कठिन अथवा अशुद्ध मंत्र के उच्चारण से बचना ही अधिक श्रेयस्कर रहता है।

विशु के पावन दिन पर किस प्रकार का दान करना सर्वोत्तम माना गया है?

सौर संक्रांति और नववर्ष के अवसर पर अन्न, मौसमी फल, स्वच्छ वस्त्र और शीतल जल का दान अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना अथवा किसी जरूरतमंद की आर्थिक सहायता करना सबसे बड़ा धर्म है। दान सदैव निष्काम भाव से और बिना किसी अहंकार के सीधे सुपात्र व्यक्ति को ही देना चाहिए। घर आए किसी भी अतिथि या याचक का आदरपूर्वक सत्कार करना भी दान के समान ही फल देता है।

क्या इस दिन ग्रहों के दोष निवारण के लिए कोई सरल उपाय किया जा सकता है?

यदि जीवन में संघर्ष चल रहा हो, तो इस दिन प्रातः स्नान के बाद उगते सूर्य को अर्घ्य देकर भगवान विष्णु का ध्यान करें। तांबे के पात्र में जल भरकर घर में उसका छिड़काव करना और मुख्य द्वार को स्वच्छ रखना अत्यंत सकारात्मक माना जाता है। किसी भी प्रकार के महंगे रत्न अथवा जटिल अनुष्ठान के बिना केवल सात्विक आचरण ही श्रेष्ठ उपाय है। अपनी व्यक्तिगत कुंडली के सटीक दोष जानने के लिए व्यक्तिगत परामर्श लेना अधिक उपयोगी रहता है।

अलग-अलग शहरों में विशु के पूजा समय और मुहूर्त में अंतर क्यों दिखाई देता है?

प्रत्येक नगर का अक्षांश और देशांतर अलग होने के कारण वहां सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग-अलग मिनटों पर होता है। वैदिक ज्योतिष में संक्रांति और पूजा के मुहूर्त स्थानीय सूर्योदय के आधार पर ही निर्धारित किए जाते हैं। इसलिए दिल्ली, मुंबई, चेन्नई या कोलकाता के समय में कुछ मिनटों का स्वाभाविक अंतर देखने को मिलता है। आपको सदैव अपने वर्तमान निवास स्थान के अनुसार ऊपर दी गई तालिका का समय ही देखना चाहिए।

विशु और उगादि अथवा तमिल पुथांडु में क्या मुख्य अंतर है?

उगादि चंद्र पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर आधारित नववर्ष है, जबकि विशु पूरी तरह सौर गणना और मेष संक्रांति पर आधारित है। तमिल पुथांडु भी सौर नववर्ष है, परंतु विशु मुख्य रूप से केरल की परंपरा और विशिष्ट खगोलीय नियमों से संचालित होता है। विशु में प्रातःकाल भगवान के मंगल दर्शन की अनूठी परंपरा है, जो इसे अन्य उत्सवों से अलग पहचान देती है। यद्यपि ये सभी पर्व नववर्ष का ही स्वागत करते हैं, फिर भी इनके पंचांग नियम और क्षेत्रीय रीति-रिवाज भिन्न हैं।

विशु के अनुष्ठानों में बच्चों और पूरे परिवार की क्या भूमिका होती है?

विशु पूरी तरह से एक पारिवारिक उत्सव है, जिसमें घर के हर सदस्य का सक्रिय योगदान रहता है। प्रातःकाल परिवार के वरिष्ठ सदस्य बच्चों को आंखें बंद करवाकर पूजा स्थल तक लाते हैं ताकि वे सबसे पहले ईश्वर के दर्शन करें। इसके बाद घर के बड़े बुजुर्ग छोटों को आशीर्वाद के साथ कुछ सिक्के या उपहार भेंट करते हैं। यह परंपरा नई पीढ़ी में पारिवारिक आदर, संस्कार और एकजुटता की गहरी भावना भरती है।

इस दिन किस प्रकार के वस्त्र पहनना और घर की व्यवस्था कैसी रखना शास्त्रसम्मत है?

इस पावन अवसर पर श्वेत, पीत अथवा हल्के मांगलिक रंगों के स्वच्छ व पारंपरिक वस्त्र धारण करना बहुत अच्छा माना जाता है। पर्व से एक दिन पूर्व ही पूरे घर की अच्छी तरह साफ-सफाई कर लेनी चाहिए ताकि सकारात्मक ऊर्जा का वास हो। फटे, मैले अथवा गहरे काले रंग के वस्त्र पहनने से इस दिन बचना चाहिए। घर के मुख्य द्वार पर रंगोली सजाना और स्वच्छता बनाए रखना देवी-देवताओं के स्वागत का प्रतीक है।

वर्ष 2027 में विशु 14 अप्रैल के बजाय 15 अप्रैल को क्यों मनाया जा रहा है?

इस वर्ष सूर्य देव का मेष राशि में संक्रमण 14 अप्रैल 2027 को अपराह्न काल में दिन के तीन बटा पांच भाग बीतने के बाद हो रहा है। भारत सरकार की कैलेंडर सुधार समिति 1955 के संक्रांति नियमों और पारंपरिक मालाबार नियम के अनुसार यदि संक्रमण इस काल के बाद हो, तो सौर मास अगले दिन से आरंभ होता है। इसी शास्त्रीय सिद्धांत के कारण केरल का मेदम मास 15 अप्रैल 2027 को शुरू होगा। यही कारण है कि विशु का पर्व 14 अप्रैल को न होकर 15 अप्रैल 2027 को पूरे शास्त्रसम्मत विधान से मनाया जा रहा है।

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