मुंबई · Maharashtra

मुंबई में गुड़ी पड़वा

बुधवार, 7 अप्रैल 2027· Read in English →

त्रिकाल संदेश — सीधा उत्तर

साल 2027 में गुड़ी पड़वा 7 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि सूर्योदय व्यापिनी है। सुबह जल्दी उठकर मुख्य द्वार पर रंगोली सजाएं, नए वस्त्र पहनें और घर पर गुड़ी स्थापित करें। इसके बाद भगवान ब्रह्मा की पूजा करके नीम-गुड़ का प्रसाद ग्रहण करें और नए कार्यों का आरंभ करें।

🕐 मुंबई के लिए गुड़ी पड़वा का समय

तिथिPratipada (Shukla Paksha) — 04:29 (08 Apr) तक
नक्षत्रRevati, पाद 3 — 18:25 तक
योग · करणIndra · Kimstughna
अभिजित मुहूर्त12:15-13:05
राहुकाल12:40-14:12
यमगंड · गुलिक08:03-09:35 · 11:08-12:40
सूर्योदय · सूर्यास्त06:31 · 18:50

मुंबई (19.076, 72.8777) के लिए स्विस एफ़ेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से गणना। पाँचों अंग स्थानीय सूर्योदय पर।

मुफ़्त कुंडली — कोई भुगतान नहीं, कोई साइनअप नहीं →

✅ गुड़ी पड़वा पर क्या करें

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए पारंपरिक वस्त्र धारण करें।
  2. घर के मुख्य द्वार को साफ करके सुंदर ताजी रंगोली सजाएं।
  3. एक सीधे बांस पर चमकीला नया कपड़ा, नीम और आम के पत्ते बांधें।
  4. बांस के ऊपरी सिरे पर चांदी अथवा तांबे का कलश उलटा लगाएं।
  5. इस सजी हुई गुड़ी को मुख्य द्वार पर ऊंचा स्थापित करें।
  6. गुड़ी पर हल्दी-कुमकुम और फूल चढ़ाकर भगवान ब्रह्मा की प्रार्थना करें।
  7. परिवार सहित नीम-गुड़ का प्रसाद खाएं और पूरन पोली का आनंद लें।

समय कम है? → 5-मिनट पूजा विधि

📜 यह तारीख कैसे तय हुई

Pratipada pervades sunrise kaal on one day only (100% of the window). Suryodaya-vyapini: the tithi prevailing at sunrise governs the day, which is the general rule for vrats where no special kaal applies.

त्रिकाल वाणी द्वारा स्विस एफ़ेमेरिस और शास्त्रीय निर्णय नियमों से गणना — निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, और कैलेंडर रिफ़ॉर्म कमेटी की रिपोर्ट। किसी अन्य पंचांग से नकल नहीं।

🕐 भारत भर में गुड़ी पड़वा का समय

शहरसूर्योदयअभिजित मुहूर्तराहुकाल
मुंबई06:3112:15-13:0512:40-14:12
पुणे06:2712:11-13:0112:36-14:08

गुड़ी पड़वा क्यों मनाया जाता है

गुड़ी पड़वा सनातन परंपरा में नववर्ष के आरंभ का पावन पर्व है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नए संवत्सर की शुरुआत मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार काल गणना में संवत्सर का विशेष महत्व है, जिसका चक्र आकाशीय गतियों पर आधारित होता है[1]। यह केवल ऋतु परिवर्तन का समय नहीं है, बल्कि प्रकृति और मानवीय चेतना के नवीनीकरण का दिन है। वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही चारों ओर नई ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पावन तिथि के अधिष्ठाता देवता भगवान ब्रह्मा हैं। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना आरंभ की थी। इसी कारण गुड़ी को 'ब्रह्मध्वज' का प्रतीक भी माना जाता है। घर के मुख्य द्वार पर ऊंचे स्थान पर गुड़ी फहराना विजय, धर्म और नए आरंभ का संदेश देता है। यह विजय पताका घर में सकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करती है और सभी नकारात्मक प्रभावों को दूर रखती है। ज्योतिषीय दृष्टि से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन विशेष प्रभाव रखता है। इस दिन की प्रतिपदा तिथि नए उद्यम, नए संकल्प और शुभ कार्यों को गति देने के लिए अत्यंत श्रेष्ठ मानी जाती है[2]। इस पर्व के स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं। चंद्रमा मन, मानसिक संतुलन, भाव और पोषण के कारक ग्रह हैं। अमावस्या की गहन अंधकारमयी रात्रि के बाद जब चंद्रमा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में प्रवेश करता है, तो उसके बल और आभा में निरंतर वृद्धि होने लगती है[3]। यह वृद्धि हमारे विचारों में नई स्पष्टता और मानसिक दृढ़ता लेकर आती है। मन के कारक चंद्रमा का शुभ प्रभाव व्यक्ति को नए कार्य शुरू करने का साहस देता है। इस पावन दिन पर नीम के पत्तों और गुड़ को एक साथ मिलाकर खाने की विशेष परंपरा है। यह परंपरा जीवन के गहरे सच को सहजता से समझाती है। जीवन में सुख और दुख, सफलता और विफलता दोनों का अस्तित्व रहता है। कड़वे नीम और मीठे गुड़ का साथ में सेवन हमें यह सिखाता है कि आने वाले नए वर्ष में हमें हर अनुभव को समभाव से स्वीकार करना चाहिए। इसके साथ ही घर-परिवार में प्रेम, सौहार्द और नए उत्साह के साथ जीवन की नई शुरुआत करनी चाहिए। इस पर्व के दिन घर के सभी सदस्य नए वस्त्र पहनते हैं और आपसी मनमुटाव भुलाकर एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं। समाज में परस्पर सद्भाव बढ़ाने और नई उमंग के साथ भविष्य की ओर कदम बढ़ाने की दृष्टि से यह दिन अत्यंत फलदायी माना गया है। घर की देहरी पर स्थापित की गई गुड़ी पूरे परिवार को सुरक्षा और शुभता का अहसास कराती है।

🪔 गुड़ी पड़वा पूजा विधि

  1. प्रातः स्नान और शुद्धि — सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त हों और नए पारंपरिक वस्त्र धारण करें।
  2. मुख्य द्वार की सज्जा — घर के मुख्य प्रवेश द्वार को अच्छी तरह धोकर साफ करें और ताजी सुंदर रंगोली बनाएं।
  3. गुड़ी की तैयारी — एक साफ और मजबूत बांस की लकड़ी लें, उसके ऊपरी सिरे पर चमकीला नया रेशमी या सूती कपड़ा बांधें।
  4. पत्तों का बंधन — कपड़े के साथ नीम की ताजी टहनियां और आम के हरे पत्ते अच्छी तरह से बांधें।
  5. कलश स्थापना — बांस के सबसे ऊपरी सिरे पर चांदी अथवा तांबे के साफ कलश को उलटा करके मजबूती से लगाएं।
  6. गुड़ी आरोहण — तैयार गुड़ी को घर के मुख्य द्वार पर या बालकनी में ऐसे स्थान पर ऊंचा लगाएं जहां से वह आसानी से दिखाई दे।
  7. पूजन अर्चन — गुड़ी पर हल्दी, कुमकुम, अक्षत और ताजे पुष्प अर्पित करें।
  8. धूप-दीप दर्शन — धूप और गाय के घी का दीपक जलाकर गुड़ी और देव प्रतिमा के सम्मुख भाव से रखें।
  9. भगवान ब्रह्मा की प्रार्थना — सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा का ध्यान करें और उनसे सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
  10. नैवेद्य समर्पण — भगवान को पूरन पोली तथा अन्य सात्विक मिष्ठान्न का भोग अर्पित करें।
  11. नीम-गुड़ प्रसाद वितरण — कड़वे नीम के पत्ते और गुड़ का मिश्रण भगवान को अर्पित करने के बाद सभी परिजनों में प्रसाद रूप में बांटें।
  12. गुड़ी विसर्जन — सूर्यास्त से पहले गुड़ी की संक्षिप्त पूजा करें और आदरपूर्वक उसे उतारकर सुरक्षित रख लें।

⚡ 5-मिनट विधि

  1. स्नान करके साफ पारंपरिक वस्त्र पहनें और मुख्य द्वार पर रंगोली सजाएं।
  2. बांस की लकड़ी पर चमकीला कपड़ा, नीम और आम के पत्ते बांधकर ऊपर उलटा कलश लगाएं।
  3. इस गुड़ी को मुख्य द्वार पर ऊंचा स्थापित करके हल्दी-कुमकुम और ताजे फूल चढ़ाएं।
  4. भगवान ब्रह्मा का ध्यान करके धूप-दीप दिखाएं और पूरन पोली का भोग लगाएं।
  5. नीम और गुड़ का प्रसाद ग्रहण करें तथा सूर्यास्त से पहले गुड़ी को सम्मानपूर्वक उतार लें।

🛒 गुड़ी पड़वा पूजा सामग्री

आवश्यक

  • बांस की सीधी लकड़ी
  • चमकीला नया रेशमी या सूती कपड़ा
  • ताजी नीम की पत्तियां
  • आम के हरे पत्ते
  • चांदी या तांबे का कलश (लोटा)
  • हल्दी और कुमकुम
  • ताजे सुगंधित फूल
  • रंगोली के रंग
  • नीम की कोपलें और गुड़
  • पूरन पोली का नैवेद्य

वैकल्पिक

  • फूलों की ताजी माला
  • अक्षत (बिना टूटे चावल)
  • धूपबत्ती अथवा अगरबत्ती
  • गाय के घी का दीपक
  • बताशे की माला
  • ताजा नारियल
  • सात्विक फल

अगर कुछ उपलब्ध न हो

  • यदि चांदी का कलश उपलब्ध न हो, तो तांबे या पीतल का लोटा पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि आम के पत्ते उपलब्ध न हों, तो अशोक के पत्तों का प्रयोग पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि पूरन पोली उपलब्ध न हो, तो घर में बना कोई भी सात्विक मीठा व्यंजन या सादा गुड़ पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि रेशमी वस्त्र उपलब्ध न हो, तो कोई भी नया स्वच्छ सूती वस्त्र पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।
  • यदि रंगोली के रंग उपलब्ध न हों, तो चावल के आटे और हल्दी से बनी रंगोली पारंपरिक रूप से स्वीकार्य है।

❓ गुड़ी पड़वा: क्या करें और क्या न करें

क्या गुड़ी पड़वा के दिन बाल धो सकते हैं?

हां, इस दिन प्रातःकाल सिर से स्नान करना शुभ माना जाता है। महिलाएं और पुरुष दोनों ही शुद्ध होकर नए वस्त्र धारण कर सकते हैं।

क्या इस दिन नाखून या बाल काट सकते हैं?

पारंपरिक रूप से नववर्ष के पहले दिन बाल या नाखून काटने से बचने की सलाह दी जाती है। यह कार्य पर्व से एक दिन पूर्व कर लेना उचित माना जाता है।

क्या इस दिन नमक खाया जा सकता है?

हां, गुड़ी पड़वा पर भोजन में नमक खाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। दोपहर के पारंपरिक भोजन में पूरन पोली और अन्य सात्विक व्यंजनों के साथ सामान्य भोजन किया जाता है।

क्या इस दिन यात्रा करना ठीक रहता है?

नववर्ष के पहले दिन घर पर रहकर परिवार के साथ पूजा-अर्चना करना श्रेष्ठ माना जाता है। हालांकि किसी शुभ कार्य या आवश्यक कार्य के लिए की गई यात्रा में कोई दोष नहीं है।

क्या गुड़ी पड़वा पर नया कार्य या व्यापार शुरू कर सकते हैं?

हां, यह दिन किसी भी नए व्यापार, दुकान या शुभ उद्यम की शुरुआत के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन आरंभ किए गए कार्यों में नई ऊर्जा का संचार माना जाता है।

क्या इस दिन नए वाहन, आभूषण या संपत्ति की खरीदारी कर सकते हैं?

हां, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को खरीदारी के लिए अबूझ मुहूर्त के समान माना जाता है। बड़ी संख्या में लोग इस दिन सोना, वाहन या नए घर की रजिस्ट्री करवाते हैं।

क्या गुड़ी की पूजा रात्रि के समय की जा सकती है?

नहीं, गुड़ी की स्थापना और पूजा केवल प्रातःकाल सूर्योदय के समय ही की जाती है। रात्रि में गुड़ी की पूजा करने का कोई शास्त्रीय विधान नहीं है।

क्या गुड़ी को सूर्यास्त के बाद भी द्वार पर लगा रहने दे सकते हैं?

नहीं, परंपरा के अनुसार सूर्यास्त से पहले गुड़ी की संक्षिप्त पूजा करके उसे आदरपूर्वक उतार लेना चाहिए। गुड़ी को रात भर लगा छोड़ना अधूरा अनुष्ठान माना जाता है।

क्या इस दिन मांसाहारी भोजन और मदिरा का सेवन कर सकते हैं?

बिल्कुल नहीं, इस पावन अवसर पर मांसाहार और मदिरा का पूरी तरह त्याग करना चाहिए। घर में केवल शुद्ध सात्विक भोजन ही पकाया और खाया जाता है।

क्या इस दिन किसी से विवाद या कटु वचन बोलने की मनाही है?

हां, नववर्ष के पहले दिन कटु वाणी, क्रोध और झगड़े से पूरी तरह बचना चाहिए। इस दिन किया गया आचरण आने वाले वर्ष की मानसिक दिशा तय करता है।

क्या पूजा के तुरंत बाद भोजन किया जा सकता है?

हां, गुड़ी की स्थापना और भगवान ब्रह्मा की पूजा संपन्न होने के बाद नीम-गुड़ का प्रसाद लें और फिर परिवार के साथ भोजन कर सकते हैं।

क्या गुड़ी को घर के अंदर स्थापित किया जा सकता है?

गुड़ी को पारंपरिक रूप से घर के मुख्य द्वार पर, छत पर या बालकनी में ऐसे स्थान पर लगाया जाता है जहां से वह बाहर आकाश में दिखे। यदि स्थान का अभाव हो तो खिड़की या बालकनी में लगाना मान्य है।

क्या किराए के मकान में रहने वाले लोग भी गुड़ी लगा सकते हैं?

हां, आप जिस घर में वर्तमान में निवास कर रहे हैं, उसी के मुख्य द्वार या बालकनी पर गुड़ी लगाना पूरी तरह उचित और मान्य है।

✓ क्या करें

  • Raise the gudi at the doorway
  • Draw fresh rangoli at the entrance
  • Eat neem and jaggery together
  • Begin new ventures or purchases
  • Wear new traditional clothes

✗ क्या न करें

  • Avoid negative or harsh speech
  • Do not start quarrels today
  • Avoid non-vegetarian food
  • Do not leave the gudi up after sunset

⚠️ आम गलतियाँ

  • सूर्यास्त के बाद भी गुड़ी को द्वार पर लगा छोड़ देना, जिससे पूजन की विधि अधूरी मानी जाती है।
  • नीम और गुड़ के मिश्रण का सेवन किए बिना ही भोजन आरंभ कर देना।
  • बांस की लकड़ी के शीर्ष पर कलश को सीधा लगाना, जबकि उसे उलटा करके लगाने की परंपरा है।
  • मुख्य द्वार की शुद्धि किए बिना और रंगोली सजाए बिना सीधे गुड़ी खड़ी कर देना।
  • नववर्ष के इस पावन दिन पर परिजनों से कटु वचन बोलना या वाद-विवाद में उलझना।
  • गुड़ी सजाते समय ताजी नीम की पत्तियों और आम के पत्तों का प्रयोग न करना।
  • इस पवित्र अवसर पर तामसिक अथवा मांसाहारी भोजन बनाकर घर की शुद्धि में कमी रखना।

📖 गुड़ी पड़वा कथा

पौराणिक परंपरा के अनुसार गुड़ी पड़वा का संबंध सीधे इस सृष्टि के आरंभ से जुड़ा हुआ है। सतयुग के आरंभ में, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन ही परमपिता भगवान ब्रह्मा ने इस चराचर जगत की रचना प्रारंभ की थी। उससे पूर्व संपूर्ण सृष्टि घने अंधकार और जलमग्न अवस्था में विलीन थी। भगवान ब्रह्मा ने इसी पावन दिन पर सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, ऋतुओं, वनस्पतियों और समस्त प्राणियों का सृजन करके काल चक्र को गति प्रदान की। इसी कारण इस तिथि को नव संवत्सर का पहला दिन मानकर भगवान ब्रह्मा के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। एक अन्य लोककथा के अनुसार, गुड़ी पड़वा का यह पर्व अधर्म पर धर्म की और अन्याय पर न्याय की विजय का प्रतीक है। त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम अपने वनवास काल में दक्षिण भारत के किष्किंधा क्षेत्र पहुंचे, तो वहां की प्रजा बाली के अत्याचारों से अत्यंत त्रस्त थी। भगवान श्रीराम ने सुग्रीव को बाली के भय से मुक्ति दिलाई और वहां धर्म का राज्य पुनः स्थापित किया। बाली के दमनकारी शासन से मुक्ति मिलने की प्रसन्नता में किष्किंधा के निवासियों ने अपने-अपने घरों के बाहर विजय पताकाएं फहराई थीं। यह पताकाएं ही आगे चलकर 'गुड़ी' के रूप में प्रसिद्ध हुईं, जो हर वर्ष नई आशा, उल्लास और धर्म की विजय का स्मरण कराती हैं। इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक काल में छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी मुगलों और आतताइयों पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में जनमानस में स्वाभिमान जगाने के लिए गुड़ी फहराने की परंपरा को नई ऊर्जा दी थी। जब वसंत ऋतु में खेतों में रबी की नई फसल कटकर घर आती है, तो किसान परिवार भी इस दिन को प्रकृति के उपहार के रूप में उल्लासपूर्वक मनाते हैं। इस प्रकार यह पर्व सृष्टि के आरंभ, सत्य की विजय और जीवन के नए उल्लास की पावन त्रिवेणी है।

🪔 आरती

गुड़ी पड़वा पर आरती गुड़ी की स्थापना और विधिवत पूजन के तुरंत बाद की जाती है। पीतल या तांबे की थाली में गाय के शुद्ध घी का दीपक अथवा कपूर प्रज्वलित करें। परिवार के सभी सदस्य एक साथ खड़े होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके आरती संपन्न करें। आरती के उपरांत भगवान ब्रह्मा और कुलदेवता का स्मरण करते हुए सभी लोग आरती ग्रहण करें और घर की सुख-शांति तथा समृद्धि की मंगल कामना करें।

🔮 आपकी समस्या के अनुसार गुड़ी पड़वा के उपाय

धन की कमी और बचत न होना

एक साफ सफेद कपड़े में थोड़ी सी मिश्री और चावल बांधकर अपने धन स्थान में रखें। कब: पर्व की सुबह स्नान करने के तुरंत बाद। खर्च: ₹10. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: चंद्रमा समृद्धि और मानसिक शांति के कारक ग्रह हैं।

करियर और नौकरी में अस्थिरता

एक चांदी अथवा स्टील के लोटे में कच्चा दूध और जल मिलाकर शिवलिंग पर अर्पित करें। कब: पर्व की सुबह पूजा के बाद। खर्च: ₹15. कितने दिन: 7 दिन। आपके लिए क्यों: चंद्रमा मन की एकाग्रता और कार्यक्षेत्र में स्थिरता प्रदान करते हैं।

विवाह में देरी या तालमेल की कमी

एक चुटकी पिसा हुआ कपूर और दो बताशे जल में प्रवाहित करें या तुलसी के पास रखें। कब: पर्व की शाम सूर्यास्त से ठीक पहले। खर्च: ₹10. कितने दिन: 11 दिन। आपके लिए क्यों: चंद्रमा भावनात्मक जुड़ाव और आपसी सामंजस्य को संतुलित करते हैं।

संतान की पढ़ाई और एकाग्रता में बाधा

दो मीठे बताशे या मिश्री के दाने बच्चे के हाथ से भगवान के सम्मुख रखवाएं। कब: पर्व की सुबह पूजा के समय। खर्च: ₹5. कितने दिन: 21 दिन। आपके लिए क्यों: चंद्रमा बुद्धि के शांत प्रवाह और अध्ययन में ध्यान लगाने में सहायक होते हैं।

घर में कलह और मानसिक तनाव

एक मिट्टी के बर्तन में जल भरकर उसमें कुछ नीम के पत्ते डालकर घर के मुख्य द्वार पर छिड़कें। कब: पर्व की सुबह स्नान के बाद। खर्च: free. कितने दिन: 3 दिन। आपके लिए क्यों: चंद्रमा घर के वातावरण को शीतल और कलहमुक्त रखने में सहायक हैं।

नकारात्मक विचार और मन का डर

थोड़े से कच्चे दूध में जल मिलाकर रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें और मौन रहें। कब: पर्व की रात्रि चंद्रोदय के समय। खर्च: ₹10. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: चंद्रमा मन के स्वामी हैं और उनका शांत प्रभाव भय को दूर करता है।

क्या गुड़ी पड़वा आपके लिए विशेष है?

इस पावन पर्व पर चंद्रमा के शुभ प्रभाव और पारंपरिक नियमों की जानकारी हर व्यक्ति के लिए एक समान रूप से दी जाती है। किंतु वास्तविक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति की जन्मकुंडली अलग होती है। आपकी कुंडली में चंद्रमा किस भाव में बैठा है, किस राशि में है और उस पर किन ग्रहों की दृष्टि है, इसका प्रभाव पूरी तरह व्यक्तिगत होता है। यही कारण है कि सामान्य उपाय सबके लिए एक जैसे फलदायी नहीं होते। त्रिकाल वाणी में रोहीत गुप्त आपकी व्यक्तिगत स्थिति का गहन विश्लेषण करते हैं। व्यक्तिगत कुंडली विश्लेषण से आपको अपने करियर, धन, दशा और सही समय की सटीक जानकारी मिलती है। यदि वैवाहिक जीवन या रिश्ते का प्रश्न है, तो कुंडली मिलान से अनुकूलता समझी जा सकती है। हस्तरेखा विश्लेषण से रेखाओं की वर्तमान स्थिति और कर्म का तालमेल देखा जाता है, जबकि स्वप्न शास्त्र के माध्यम से बार-बार आने वाले सपनों के गहरे संकेतों को समझा जा सकता है।

शब्दावली · Glossary

प्रतिपदा
चंद्रमास के प्रत्येक पक्ष (शुक्ल या कृष्ण) की पहली तिथि को प्रतिपदा कहा जाता है।
सूर्योदय व्यापिनी
वह तिथि जो स्थानीय सूर्योदय के समय विद्यमान होती है, उसी के आधार पर दिन के पर्व का निर्णय होता है।
संवत्सर
वैदिक काल गणना के अनुसार सौर या चंद्र वर्ष का पारंपरिक चक्र, जिसे हिंदू नववर्ष माना जाता है।
ब्रह्मध्वज
बांस की लकड़ी, वस्त्र, नीम और उलटे कलश से तैयार की गई गुड़ी, जिसे भगवान ब्रह्मा की विजय पताका माना जाता है।
पूरन पोली
चने की दाल और गुड़ से भरी हुई मीठी पारंपरिक रोटी, जो गुड़ी पड़वा पर विशेष नैवेद्य के रूप में बनाई जाती है।
राहुकाल
दिन का वह अशुभ समय जिसमें कोई भी नया शुभ कार्य या पूजा का आरंभ करना वर्जित माना जाता है।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

  1. [1]↑बृहत् पाराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    गुरुर्द्वादशभ्र्वर्षैः पुनस्तद्राशिगो भवेत्।ह् । तत्।ह् कस्मिन्।ह् पर्ययो तस्य ज्ञेयः संवत्सरो मुने
    — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 78 · श्लोक 10

    महर्षि पराशर बताते हैं कि राशियों में बृहस्पति के भ्रमण चक्र से संवत्सर की गणना जानी जाती है।

    The movement and cycle of Jupiter across the zodiac defines the Samvatsara.

  2. [2]↑जातक पारिजातजातकपारिजातः · Vaidyanatha Dikshita
    अथ तिथिफलम् । महोद्योगी जातः प्रतिपदि तिथौ पुण्यचरितो\- द्वितीयायां तेजःपशुबलयशोवित्तविपुलः । तृतीयायां पुण्यप्रबलभयशीलश्च पटुवाक् चतुर्थामाशालुस्त्वटनवतुरो मन्त्रनिपुणः
    — जातक पारिजात, अध्याय 9 · श्लोक 34

    प्रतिपदा तिथि पर कार्य करने वाला अथवा जन्म लेने वाला व्यक्ति महोद्योगी और पुण्य चरित्र वाला होता है।

    One who acts or is born on Pratipada tithi is endowed with great enterprise and righteous conduct.

  3. [3]↑सारावलीसारावली · Kalyanavarma
    शुक्लप्रतिपदशके मध्यबलः कीर्त्यते यवनबुधैः । श्रेष्ठो द्वितीयदशके स्वल्पबलश्चन्द्रमास्तु तृतीये च ॥१६॥
    — सारावली, अध्याय 1 — सम्पूर्ण सारावली · श्लोक 131

    शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाले पहले दस दिनों में चंद्रमा को मध्यम बल वाला कहा गया है।

    The Moon is considered of moderate strength during the first ten days of the bright fortnight starting from Pratipada.

मुंबई में गुड़ी पड़वा — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

साल 2027 में गुड़ी पड़वा किस दिन और तारीख को है?

साल 2027 में गुड़ी पड़वा 7 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि सूर्योदय काल में विद्यमान रहेगी। धर्मशास्त्रों के अनुसार सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपदा होने के कारण इसी दिन गुड़ी पड़वा और नववर्ष का पर्व मनाया जाना शास्त्रसम्मत है। सभी भक्त इसी दिन प्रातःकाल से अपने घरों में गुड़ी सजाकर नववर्ष का स्वागत करेंगे।

गुड़ी पड़वा 2027 पर पूजा का सही समय और मुहूर्त क्या है?

गुड़ी पड़वा की पूजा के लिए शहरवार सटीक चौघड़िया और शुभ मुहूर्त ऊपर तालिका में दिए गए हैं। परंपरा के अनुसार गुड़ी की स्थापना प्रातःकाल सूर्योदय के तुरंत बाद कर लेनी चाहिए। राहुकाल के समय गुड़ी बांधने या पूजा करने से बचना चाहिए, जिसका समय भी ऊपर दिया गया है। अपने नगर के स्थानीय सूर्योदय समय को देखकर ही पूजा का आरंभ करें।

अलग-अलग शहरों में गुड़ी पड़वा के मुहूर्त में अंतर क्यों होता है?

प्रत्येक शहर के अक्षांश और रेखांश अलग होने के कारण वहां सूर्योदय के समय में कुछ मिनटों का अंतर आता है। गुड़ी पड़वा की तिथि का निर्णय सूर्योदय व्यापिनी नियम के आधार पर किया जाता है। इसलिए दिल्ली, मुंबई या कोलकाता जैसे नगरों के स्थानीय मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर स्वाभाविक है। आपको हमेशा अपने शहर के लिए ऊपर तालिका में दिए गए स्थानीय समय का ही पालन करना चाहिए।

गुड़ी पड़वा के दिन सबसे मुख्य काम क्या करना चाहिए?

इस दिन प्रातःकाल स्नान करके नए पारंपरिक वस्त्र पहनना और घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाना सबसे मुख्य कार्य है। इसके बाद एक सीधे बांस पर चमकीला कपड़ा, नीम-आम के पत्ते और तांबे या चांदी का कलश लगाकर गुड़ी स्थापित की जाती है। गुड़ी की विधिवत पूजा करके भगवान ब्रह्मा से परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है। अंत में नीम और गुड़ का प्रसाद सभी परिजनों के साथ मिलकर खाया जाता है।

गुड़ी पड़वा के दिन किन बातों से पूरी तरह बचना चाहिए?

इस दिन घर में किसी भी प्रकार का कलह, विवाद या कटु वचन बोलने से बचना चाहिए। नववर्ष के पहले दिन तामसिक भोजन जैसे मांसाहार और मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है। सूर्यास्त के बाद गुड़ी को द्वार पर लगा छोड़ना भी अनुचित माना जाता है, इसलिए शाम को इसे आदरपूर्वक उतार लें। मन में किसी के प्रति द्वेष या नकारात्मक विचार न आने दें।

क्या गुड़ी पड़वा पर उपवास या व्रत रखना अनिवार्य होता है?

गुड़ी पड़वा मूल रूप से नववर्ष के उल्लास और उत्सव का पर्व है, इसलिए इस दिन निर्जला या कठोर व्रत रखना अनिवार्य नहीं है। कई परिवार केवल सुबह गुड़ी पूजन संपन्न होने तक अल्प उपवास रखते हैं और पूजा के बाद भोजन करते हैं। यदि आप गर्भवती हैं, अस्वस्थ हैं या दवा ले रहे हैं, तो कोई भी उपवास रखने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। उत्सव का मुख्य उद्देश्य श्रद्धा और सात्विक भाव बनाए रखना है।

गुड़ी पड़वा के दिन भोजन में क्या खाना चाहिए?

इस पावन पर्व पर सबसे पहले नीम की कोमल पत्तियों और गुड़ का मिश्रण प्रसाद के रूप में खाया जाता है। इसके बाद दोपहर के मुख्य भोजन में पारंपरिक रूप से पूरन पोली, सात्विक दाल, चावल और सब्जियां बनाई जाती हैं। भोजन पूरी तरह शुद्ध और बिना लहसुन-प्याज के सात्विक तरीके से तैयार करना श्रेष्ठ माना जाता है। सभी परिजनों के साथ बैठकर इस पावन भोजन का आनंद लेना चाहिए।

गुड़ी तैयार करने के लिए कौन-कौन सी सामग्री की आवश्यकता होती है?

गुड़ी बनाने के लिए मुख्य रूप से एक साफ बांस की लकड़ी, चमकीला नया रेशमी या सूती कपड़ा और तांबे या चांदी का लोटा चाहिए। इसके साथ ही ताजी नीम की पत्तियां, आम के पत्ते, हल्दी, कुमकुम और फूलों की आवश्यकता होती है। दरवाजे पर सजाने के लिए रंगोली के रंग और नैवेद्य के लिए पूरन पोली व गुड़-नीम तैयार रखना चाहिए। यह सभी वस्तुएं पूजा से पूर्व ही एकत्र कर लेनी चाहिए।

गुड़ी पड़वा से कौन सी मुख्य पौराणिक कथा जुड़ी हुई है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि पर भगवान ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना का शुभारंभ किया था। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान श्रीराम ने इसी दिन किष्किंधा के लोगों को बाली के अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। बाली के शासन से मुक्त होने पर वहां की प्रजा ने अपने-अपने घरों पर विजय पताका के रूप में गुड़ी फहराई थी। इसलिए यह दिन अधर्म पर धर्म की विजय और नए आरंभ का प्रतीक है।

घर के द्वार पर गुड़ी लगाने का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व क्या है?

गुड़ी को शास्त्रों में 'ब्रह्मध्वज' अर्थात भगवान ब्रह्मा की विजय पताका माना गया है। इसे द्वार पर ऊंचा लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। यह ध्वज परिवार में सुख, समृद्धि, विजय और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है। इसे देखकर मन में नए वर्ष के प्रति आशा और उमंग का संचार होता है।

क्या गुड़ी पड़वा के दिन नया व्यापार या काम शुरू करना शुभ होता है?

हां, वैदिक परंपरा में गुड़ी पड़वा को किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए अत्यंत शुभ और सिद्ध दिन माना गया है। इस दिन आरंभ किए गए व्यापार, नए उद्यम या पढ़ाई में सफलता मिलने की पारंपरिक मान्यता है। यदि आप कोई नया कार्य शुरू करना चाहते हैं, तो ऊपर तालिका में दिए गए शुभ समय में कर सकते हैं। यह दिन स्वयं सिद्ध मुहूर्त के समान फलदायी माना जाता है।

क्या इस दिन सोना, वाहन या मकान की खरीदारी की जा सकती है?

हां, गुड़ी पड़वा का दिन बड़ी खरीदारी जैसे सोना, नए आभूषण, वाहन या संपत्ति खरीदने के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन की गई खरीदारी परिवार में बरकत और स्थायी समृद्धि लेकर आती है ऐसी लोकमान्यता है। कई लोग इस दिन नए मकान में गृह प्रवेश या रजिस्ट्री का कार्य भी करते हैं। खरीदारी करते समय केवल राहुकाल के समय का त्याग करना चाहिए।

गुड़ी पड़वा की पूजा के समय कौन सा मंत्र पढ़ना चाहिए?

हमारे परंपरा रिकॉर्ड में इस पूजा के लिए कोई स्वतंत्र विशेष मंत्र दर्ज नहीं है, इसलिए किसी नए मंत्र की कल्पना नहीं करनी चाहिए। आप शांत मन से भगवान ब्रह्मा और अपने कुलदेवता का स्मरण करते हुए सरल प्रार्थना कर सकते हैं। मन ही मन ईश्वर से नए वर्ष में परिवार के कल्याण, आरोग्य और सद्बुद्धि की कामना करें। शुद्ध अंतःकरण और सच्ची भक्ति ही किसी भी पूजा का सबसे बड़ा आधार होती है।

गुड़ी पड़वा के दिन क्या दान करना सबसे अच्छा माना जाता है?

नववर्ष के इस पहले दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न, गुड़, मौसमी फल अथवा नए वस्त्रों का दान करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है। इसके अलावा ग्रीष्म ऋतु का आरंभ होने के कारण राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था या मिट्टी के मटके का दान करना भी श्रेष्ठ है। किसी गरीब व्यक्ति को आदरपूर्वक भोजन कराने से मन को शांति मिलती है। दान हमेशा अपनी सामर्थ्य के अनुसार निस्वार्थ भाव से करना चाहिए।

इस पर्व पर मानसिक तनाव दूर करने के लिए क्या उपाय करना चाहिए?

गुड़ी पड़वा के स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं, जो सीधे हमारे मन और भावनाओं से जुड़े होते हैं। मानसिक शांति के लिए इस दिन शिवलिंग पर कच्चे दूध और जल का अर्घ्य देना बहुत हितकारी माना गया है। साथ ही घर के मुख्य द्वार पर नीम मिश्रित जल छिड़कने से पारिवारिक वातावरण शांत रहता है। ये सरल उपाय मन की घबराहट और नकारात्मक विचारों को शांत करने में सहायक होते हैं।

गुड़ी पड़वा और उगादी में क्या अंतर है?

गुड़ी पड़वा और उगादी दोनों एक ही दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाए जाने वाले नववर्ष के पर्व हैं। गुड़ी पड़वा मुख्य रूप से महाराष्ट्र और गोवा में द्वार पर गुड़ी लगाकर मनाया जाता है, जबकि उगादी कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मनाया जाता है। उगादी में 'बेव्वु-बेल्ला' (नीम और गुड़ का विशेष व्यंजन) मुख्य रूप से खाया जाता है। दोनों पर्वों की मूल भावना सृष्टि रचना और नववर्ष के स्वागत की ही है।

क्या गुड़ी पड़वा और चैत्र नवरात्रि का पहला दिन एक ही होता है?

हां, गुड़ी पड़वा और चैत्र नवरात्रि दोनों ही चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होते हैं। इस दिन सुबह महाराष्ट्रियन परंपरा के लोग गुड़ी स्थापित करते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में मां दुर्गा की घटस्थापना की जाती है। दोनों ही परंपराएं एक ही पावन तिथि पर प्रकृति और ईश्वर की आराधना से नए संवत्सर का स्वागत करती हैं। आप अपने पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार दोनों या किसी एक का पालन कर सकते हैं।

क्या गुड़ी को सूर्यास्त के बाद उतारना आवश्यक होता है?

हां, धार्मिक परंपरा के अनुसार गुड़ी को केवल दिन के समय ही फहराया जाता है और सूर्यास्त से पूर्व उतार लिया जाता है। शाम को सूर्यास्त से पहले गुड़ी के सम्मुख हाथ जोड़कर संक्षिप्त प्रार्थना करें और उसे आदर सहित नीचे उतारें। बांस पर लगे कलश, कपड़े और पत्तों को अलग करके संभाल कर रख लें। गुड़ी को रात भर द्वार पर लगा छोड़ना परंपरा के अनुसार अनुचित माना जाता है।

जो लोग फ्लैट या अपार्टमेंट में रहते हैं, वे गुड़ी कैसे लगाएं?

यदि आपके पास स्वतंत्र मुख्य द्वार या आंगन नहीं है, तो आप अपनी बालकनी में गुड़ी लगा सकते हैं। बालकनी की ग्रिल या खिड़की पर गुड़ी को इस प्रकार लगाएं कि वह बाहर आकाश की ओर ऊंची दिखे। यदि बालकनी भी उपलब्ध न हो, तो मुख्य द्वार के ठीक बाहर दीवार के सहारे इसे स्थापित किया जा सकता है। ईश्वर भाव और श्रद्धा को देखते हैं, बाहरी साधन की कमी से पूजा में कोई दोष नहीं लगता।

गुड़ी पड़वा पर नीम और गुड़ एक साथ खाना क्यों अनिवार्य माना गया है?

नीम और गुड़ का एक साथ सेवन करना यह संदेश देता है कि जीवन सुख और दुख दोनों का सुंदर मिश्रण है। कड़वा नीम बीमारियों से रक्षा करता है और मीठा गुड़ जीवन में ऊर्जा और मिठास घोलता है। इस प्रसाद को ग्रहण करके व्यक्ति आने वाले वर्ष की हर चुनौती और खुशी को समभाव से स्वीकार करने का संकल्प लेता है। यह प्राचीन परंपरा हमारे स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन दोनों के लिए अत्यंत हितकारी मानी गई है।

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