नोएडा · Uttar Pradesh

नोएडा में होलिका दहन

सोमवार, 22 मार्च 2027· Read in English →

त्रिकाल संदेश — सीधा उत्तर

इस वर्ष यह पर्व 22 मार्च 2027, सोमवार को मनाया जाएगा। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सायंकाल भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में पवित्र अग्नि प्रज्वलित कर पूजन और परिक्रमा करना मुख्य परंपरा है। सूर्यास्त के बाद शुभ समय में लकड़ियों और उपलों की चिता पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित करके परिवार के मंगल की प्रार्थना करें।

🕐 नोएडा के लिए होलिका दहन का समय

तिथिPurnima (Shukla Paksha) — 16:13 तक
नक्षत्रUttara Phalguni, पाद 2 — 20:46 तक
योग · करणGanda · Bava
पूजा मुहूर्त16:03-18:28 (सायाह्न)
अभिजित मुहूर्त12:02-12:51
राहुकाल07:56-09:26
यमगंड · गुलिक10:56-12:27 · 13:57-15:27
सूर्योदय · सूर्यास्त06:26 · 18:28

नोएडा (28.5355, 77.391) के लिए स्विस एफ़ेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से गणना। पाँचों अंग स्थानीय सूर्योदय पर।

मुफ़्त कुंडली — कोई भुगतान नहीं, कोई साइनअप नहीं →

✅ होलिका दहन पर क्या करें

  1. होलिका दहन के स्थान पर लकड़ी, उपले और सूखी सामग्री व्यवस्थित रूप से एकत्रित करें।
  2. तैयार की गई चिता पर होलिका का पारंपरिक स्वरूप या प्रतीक स्थापित करें।
  3. पूजा की थाली में शुद्ध जल, कच्चा सूत, साबुत अनाज, रोली और ताजे पुष्प रखें।
  4. ऊपर तालिका में दिए गए शुभ मुहूर्त का ध्यान रखते हुए ही अग्नि प्रज्वलित करें।
  5. प्रज्वलित अग्नि में जल का अर्घ्य दें और रोली, अक्षत तथा नए अनाज अर्पित करें।
  6. परिवार के कल्याण और रक्षा की भावना से होलिका की तीन या सात बार परिक्रमा करें।
  7. पूजा संपन्न होने के बाद सभी परिजनों और पड़ोसियों में पारंपरिक प्रसाद का वितरण करें।

समय कम है? → 5-मिनट पूजा विधि

📜 यह तारीख कैसे तय हुई

Purnima pervades sayahna kaal on one day only (5% of the window). The pyre is lit in the second half of Purnima at night, and Bhadra must be avoided — Purnima pervading sayahna decides the day. Bhadra (Vishti karana) occupies sayahna kaal on 21 Mar from 18:22 to 05:16, so that day is rejected — the rite may not be performed during Bhadra.

त्रिकाल वाणी द्वारा स्विस एफ़ेमेरिस और शास्त्रीय निर्णय नियमों से गणना — निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, और कैलेंडर रिफ़ॉर्म कमेटी की रिपोर्ट। किसी अन्य पंचांग से नकल नहीं।

🕐 भारत भर में होलिका दहन का समय

शहरसूर्योदयअभिजित मुहूर्तराहुकाल
नोएडा06:2612:02-12:5107:56-09:26
दिल्ली एनसीआर06:2712:03-12:5207:57-09:27
मुंबई06:4412:20-13:0908:14-09:44
गुरुग्राम06:2712:04-12:5207:57-09:27
बेंगलुरु06:2612:02-12:5007:56-09:26
हैदराबाद06:2211:58-12:4607:52-09:22
पुणे06:4112:17-13:0508:11-09:41
कोलकाता05:4211:18-12:0707:12-08:42
चेन्नई06:1511:51-12:3907:45-09:15
अहमदाबाद06:4512:21-13:1008:15-09:45

होलिका दहन क्यों मनाया जाता है

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्षीय पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला होलिका दहन का पर्व भारतीय सनातन संस्कृति में असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की अंतिम विजय का एक अनुपम प्रतीक माना जाता है। प्राचीन काल से ही हमारे धर्मग्रंथों में इस दिन को विशेष स्थान दिया गया है, जहाँ रात्रि के समय पवित्र अग्नि प्रज्वलित कर समाज और परिवार के कल्याण की कामना की जाती है [1]। यह दिन ऋतु परिवर्तन का एक प्रमुख संधिकाल भी माना गया है। शीत ऋतु की विदाई और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के समय प्रकृति में कई प्रकार के बदलाव आते हैं। वैदिक ऋषियों ने पूर्णिमा की इस पावन तिथि को संवत्सर चक्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुख या प्रारंभिक बिंदु माना है, जो जीवन में नए उत्साह और चेतना का सृजन करती है [2]। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह पर्व भक्त प्रह्लाद और उनकी बुआ होलिका की स्मृति से संबंधित है। प्रह्लाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अहंकारवश स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया था और अपनी प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार करता था। जब प्रह्लाद ने अपने पिता के अत्याचार और अहंकार को स्वीकार करने से मना कर दिया, तब हिरण्यकशिपु ने उन्हें मारने के कई षड्यंत्र रचे। अंत में उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका बालक प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर विशाल चिता में प्रविष्ट हो गई। किंतु सच्ची भक्ति और धर्म की शक्ति के आगे वरदान का अहंकार चूर-चूर हो गया। प्रह्लाद अग्नि में भी सुरक्षित रहे और होलिका उसी चिता में जलकर भस्म हो गई। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस पर्व के अधिष्ठाता ग्रह मंगल माने जाते हैं। महर्षि पराशर की परंपरा के अनुसार मंगल ग्रह तेज, पराक्रम और अग्नि तत्व का मुख्य प्रतिनिधित्व करते हैं [3]। होलिका की पावन अग्नि में जब पारंपरिक आहुतियां दी जाती हैं, तो उससे आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और मन में व्याप्त निराशा तथा भय समाप्त होते हैं। मंगल का प्रभाव व्यक्ति को कठिनाइयों से लड़ने का साहस देता है। अग्नि की परिक्रमा करने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। इस पूजा का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए काल शुद्धि का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। होलिका से पूर्व के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है, जिसमें किसी भी प्रकार के नवीन और मांगलिक कार्यों को करना वर्जित माना गया है [4]। पूर्णिमा की सायंकाल में भद्रा का समय समाप्त होने के बाद ही अग्नि प्रज्वलित करने का शास्त्र सम्मत विधान है।

🪔 होलिका दहन पूजा विधि

  1. स्थान की शुद्धि — होलिका दहन के स्थान को साफ करके गंगाजल छिड़कें और वहाँ की भूमि को स्वच्छ बनाएं।
  2. सामग्री एकत्र करना — होलिका निर्माण के लिए सूखी लकड़ियां, उपले, सूखे पत्ते और अन्य पारंपरिक सामग्री व्यवस्थित रूप से एकत्रित करें।
  3. होलिका स्थापना — तैयार की गई चिता के ऊपर होलिका और भक्त प्रह्लाद के प्रतीक रूप में पुतले या उपले स्थापित करें।
  4. प्रारंभिक पूजन — पूजा की थाली तैयार करें जिसमें शुद्ध जल का लोटा, रोली, अक्षत, ताजे फूल और कच्चा सूत रखें।
  5. अर्घ्य और समर्पण — चिता पर जल का अर्घ्य दें और रोली, अक्षत, फूल तथा नए अनाज की बालियां श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
  6. सूत का वेष्टन — कच्चे सफेद सूत को चिता के चारों ओर लपेटते हुए तीन या सात बार कच्चा धागा बांधें।
  7. अग्नि प्रज्वलन — ऊपर तालिका में दिए गए शुभ मुहूर्त में ही पवित्र अग्नि प्रज्वलित करें और भद्रा काल से पूरी तरह बचें।
  8. अग्नि में आहुति — प्रज्वलित अग्नि में उपलों के टुकड़े, अक्षत और घर से लाई गई पवित्र सामग्री समर्पित करें।
  9. परिक्रमा और प्रार्थना — जलती हुई अग्नि की तीन, पांच या सात बार परिक्रमा करें और परिवार की सुख, शांति व आरोग्य की प्रार्थना करें।
  10. प्रसाद वितरण — पूजा संपन्न होने के बाद उपस्थित सभी परिजनों और पड़ोसियों में पारंपरिक प्रसाद बांटें।

⚡ 5-मिनट विधि

  1. पूजा स्थल पर पहुंचकर हाथ-पैर धोकर शुद्ध जल से आचमन करें और मन को शांत रखें।
  2. ऊपर बताए गए शुभ मुहूर्त में होलिका के निकट एक लोटा जल, रोली और अक्षत अर्पित करें।
  3. होलिका में ताजे अनाज की बालियां या उपलों का छोटा टुकड़ा समर्पित करें।
  4. जलती हुई अग्नि की तीन बार परिक्रमा करें और अपने परिवार की रक्षा व कल्याण की प्रार्थना करें।
  5. अग्नि को नमन करके उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें और शांतिपूर्वक घर लौटें।

🛒 होलिका दहन पूजा सामग्री

आवश्यक

  • सूखी लकड़ियां
  • गाय के गोबर से बने उपले (गुलरी या बड़कुले)
  • शुद्ध जल से भरा लोटा
  • कच्चा सूत (सफेद धागा)
  • रोली या कुमकुम
  • साबुत अक्षत (बिना टूटे चावल)
  • ताजे पुष्प
  • साबुत नए अनाज (गेंहू या चने की बालियां)

वैकल्पिक

  • गंगाजल
  • हल्दी की गांठ
  • बताशे या गुड़ की मिठाई
  • सूखा नारियल (गोला)
  • अगरबत्ती या धूपबत्ती
  • कपूर

अगर कुछ उपलब्ध न हो

  • यदि गोबर के उपले उपलब्ध न हों, तो सूखी आम या पीपल की समिधा का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि कच्चा सूत उपलब्ध न हो, तो कलावा (मौली) का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि नए अनाज की बालियां उपलब्ध न हों, तो साबुत गेहूं या अक्षत का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि ताजे फूल उपलब्ध न हों, तो शुद्ध अक्षत और जल का अर्पण पारंपरिक रूप से मान्य है।

🌙 होलिका दहन व्रत विधि

व्रत कब शुरू करें: होलिका दहन का व्रत फाल्गुन पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद संकल्प लेकर प्रारंभ किया जाता है। व्रती दिनभर सात्विक आचरण रखते हुए सायंकाल होलिका दहन और अग्नि दर्शन तक उपवास रखते हैं।

क्या खा सकते हैं

  • दूध और ताजे फल
  • सिंघाड़े या कूटू के आटे से बनी सात्विक वस्तुएं
  • साबूदाना की खीर या खिचड़ी
  • सेंधा नमक से बना हल्का फलाहार
  • शुद्ध जल, नारियल पानी और ताजे फलों का रस

क्या नहीं खाना चाहिए

  • अन्न (गेहूं, चावल, दालें)
  • साधारण सफेद नमक (समुद्री नमक)
  • लहसुन और प्याज
  • मांसाहारी भोजन और अंडे
  • मदिरा तथा सभी प्रकार के नशीले पदार्थ
  • बासी या अत्यधिक तला-भुना भोजन

पारण: व्रत का पारण सायंकाल होलिका दहन की पूजा संपन्न होने, अग्नि दर्शन करने और उसकी परिक्रमा पूरी करने के बाद किया जाता है। कुछ लोग अगली सुबह धुलंडी पर स्नान-दान के बाद पूर्ण भोजन करके पारण करते हैं।

किन्हें परंपरागत रूप से व्रत नहीं रखना चाहिए: छोटे बच्चे, बहुत वृद्ध व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों के लिए पारंपरिक रूप से निर्जला या कठोर उपवास का नियम नहीं है। वे केवल सात्विक भोजन ग्रहण करके मानसिक रूप से पूजा में सम्मिलित हो सकते हैं।

यदि आप गर्भवती हैं, अस्वस्थ हैं या किसी नियमित दवा पर हैं, तो उपवास करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

❓ होलिका दहन: क्या करें और क्या न करें

क्या होलिका दहन के दिन बाल धो सकते हैं?

हाँ, इस दिन सामान्य स्नान के साथ बाल धोए जा सकते हैं। पारंपरिक रूप से पूजा से पूर्व शरीर और वस्त्रों की शुद्धि को ही मुख्य माना गया है।

क्या इस दिन नाखून या बाल काटना उचित है?

पूर्णिमा तिथि और होलिका दहन के दिन बाल या नाखून काटने से पारंपरिक रूप से बचने की सलाह दी जाती है। यदि बहुत आवश्यक न हो, तो यह कार्य किसी अन्य सामान्य दिन पर करना बेहतर माना जाता है।

क्या व्रत के दौरान साधारण नमक खा सकते हैं?

यदि आपने उपवास का संकल्प लिया है, तो साधारण नमक के स्थान पर केवल सेंधा नमक का ही सेवन करना चाहिए। जो लोग व्रत नहीं रख रहे हैं, वे सामान्य सात्विक भोजन में नमक ले सकते हैं।

क्या होलिका दहन के दिन यात्रा की जा सकती है?

सामान्य और आवश्यक यात्रा करने में कोई धार्मिक निषेध नहीं है। हालांकि, सायंकाल के समय जब होलिका पूजा का मुहूर्त हो, उस समय यात्रा में रहने के बजाय पूजा स्थल पर उपस्थित रहना पारंपरिक रूप से श्रेयस्कर माना गया है।

क्या इस दिन कोई नया व्यापार या नया काम शुरू कर सकते हैं?

होलिका दहन से पूर्व के आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं, जिनमें नए व्यापार, गृह प्रवेश या मांगलिक कार्यों की शुरुआत को पारंपरिक रूप से टाला जाता है। नया कार्य आरंभ करने के लिए होली के बाद आने वाली शुभ तिथियों को प्राथमिकता दी जाती है।

क्या होलिका दहन के दिन खरीदारी (शॉपिंग) कर सकते हैं?

दैनिक आवश्यकताओं और पूजा सामग्री की सामान्य खरीदारी की जा सकती है। परंतु भूमि, भवन, वाहन या आभूषणों जैसी बड़ी खरीदारी के लिए इस दिन को पारंपरिक रूप से उपयुक्त नहीं माना जाता।

क्या पूजा के तुरंत बाद भोजन किया जा सकता है?

हाँ, सायंकाल होलिका की पूजा, परिक्रमा और प्रसाद ग्रहण करने के उपरांत सात्विक भोजन किया जा सकता है। उपवास रखने वाले व्रती भी पूजा के बाद अपना फलाहार या हल्का भोजन ग्रहण करते हैं।

क्या होलिका की पूजा केवल रात में ही करनी चाहिए?

होलिका में अग्नि प्रज्वलित करने का कार्य शास्त्रों के अनुसार सायंकाल भद्रा बीत जाने के बाद प्रदोष या निशीथ काल में ही किया जाता है। यद्यपि दिन में चिता की तैयारी और दोपहर में पारंपरिक पूजन किया जा सकता है, किंतु अग्नि प्रज्वलन रात्रि के शुभ मुहूर्त में ही मान्य है।

क्या गर्भवती महिलाएं होलिका की परिक्रमा कर सकती हैं?

गर्भवती महिलाओं को जलती हुई होलिका की तेज आंच और भीड़भाड़ से दूर रहने की पारंपरिक सलाह दी जाती है। वे दूर से ही हाथ जोड़कर नमन कर सकती हैं ताकि स्वास्थ्य और सुरक्षा पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।

क्या होलिका दहन के समय काले या गहरे नीले वस्त्र पहन सकते हैं?

मांगलिक और धार्मिक अनुष्ठानों में काले अथवा गहरे नीले वस्त्र पहनने से पारंपरिक रूप से परहेज किया जाता है। इस पावन अवसर पर श्वेत, पीले, लाल या हल्के रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना श्रेष्ठ माना गया है।

क्या घर के चूल्हे में होलिका की अग्नि लाई जा सकती है?

कई ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में होलिका की पवित्र अग्नि घर लाकर चूल्हा या दीपक जलाने की सुंदर परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और अन्न-धन में बरकत आती है।

क्या किसी भी पेड़ की लकड़ी होलिका में जलाई जा सकती है?

नहीं, पीपल, बरगद, नीम, आम या शमी जैसे पवित्र और फलदार जीवित वृक्षों को काटकर जलाना पूर्णतः वर्जित माना गया है। केवल सूखी टहनियां, गिरे हुए पत्ते और गाय के गोबर से बने उपलों का उपयोग ही शास्त्र सम्मत है।

क्या नवविवाहित वधू को पहली होलिका जलते हुए देखना चाहिए?

कई उत्तर भारतीय लोक परंपराओं में नवविवाहित स्त्री को विवाह के पहले वर्ष अपने मायके में रहकर ससुराल की होलिका की जलती अग्नि देखने से बचने की रीति है। हालांकि यह एक क्षेत्रीय सामाजिक विश्वास है, कोई सार्वभौमिक वैदिक नियम नहीं।

✓ क्या करें

  • Observe the auspicious Muhurat.
  • Offer traditional Puja items.
  • Pray for family's well-being.
  • Share Prasad with others.
  • Maintain cleanliness around pyre.

✗ क्या न करें

  • Do not light before Muhurat.
  • Avoid negative thoughts or actions.
  • Do not harm any animals.
  • Avoid consuming intoxicants.

⚠️ आम गलतियाँ

  • भद्रा काल समाप्त होने से पहले ही अग्नि प्रज्वलित कर देने से होलिका दहन का अनुष्ठान शास्त्रीय दृष्टि से अधूरा माना जाता है।
  • पूजा के समय हरे या फलदार जीवित वृक्षों की लकड़ियों का उपयोग करने से पारंपरिक पूजा की पवित्रता खंडित होती है।
  • अग्नि प्रज्वलित करने के बाद बिना परिक्रमा किए और बिना जल अर्पित किए चले जाने से पूजा अधूरी रह जाती है।
  • होलिका दहन के पावन अवसर पर तामसिक भोजन या नशीले पदार्थों का सेवन करने से अनुष्ठान का सात्विक संकल्प भंग हो जाता है।
  • पूजा के दौरान मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध या दुर्भावना रखने से इस पर्व का आध्यात्मिक उद्देश्य पूर्ण नहीं होता।
  • चिता के आसपास गंदगी, कचरा या प्लास्टिक जैसी अशुद्ध सामग्री जलाने से पारंपरिक पूजन अधूरा माना जाता है।
  • होलिका दहन के बाद परिवार और उपस्थित लोगों में प्रसाद का वितरण न करने से लोक पूजा की परंपरा अधूरी रह जाती है।

📖 होलिका दहन कथा

प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी दैत्य राजा था। उसने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था, जिससे उसे न तो कोई मनुष्य मार सकता था और न कोई पशु। वह न दिन में मर सकता था, न रात में, न घर के भीतर और न घर के बाहर। इस वरदान ने उसके भीतर असीम अहंकार भर दिया। उसने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की पूजा नहीं करेगा, बल्कि केवल उसी को भगवान मानकर उसकी पूजा की जाएगी। किंतु उसके अपने घर में एक विलक्षण बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बाल्यावस्था से ही भगवान के अनन्य भक्त थे। वे निरंतर ईश्वर के पावन नाम का स्मरण करते रहते थे। हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को ईश्वर भक्ति से विमुख करने के लिए अनेक प्रयास किए। जब प्रह्लाद अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए, तो क्रूर पिता ने उन्हें विष पिलाया, विषैले सर्पों के बीच फिंकवाया और मतवाले हाथियों के पैरों तले कुचलवाने का यत्न किया। किंतु ईश्वरीय कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। अंत में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे स्पर्श भी नहीं कर सकती। योजना के अनुसार एक विशाल चिता तैयार की गई। होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर उस धधकती हुई चिता में बैठ गई। उसका विचार था कि प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएंगे और वह स्वयं सुरक्षित बाहर आ जाएगी। किंतु प्रह्लाद शांत भाव से ईश्वर के स्मरण में लीन रहे। तभी वायु का एक तीव्र झोंका आया और होलिका का वह रक्षा कवच उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गया। देखते ही देखते दंभी होलिका उस भीषण अग्नि में जलकर राख हो गई, जबकि ईश्वर के अनन्य भक्त प्रह्लाद उस अग्नि से पूर्णतः सुरक्षित और प्रसन्नचित्त बाहर निकल आए। तभी से यह दिन अहंकार के विनाश और निष्कपट भक्ति की विजय के रूप में मनाया जाने लगा।

🪔 आरती

होलिका दहन के अवसर पर आरती अग्नि प्रज्वलित करने और पारंपरिक आहुतियां समर्पित करने के तुरंत बाद की जाती है। पूजा की थाली में शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित कर होलिका की अग्नि के सम्मुख प्रदक्षिणा भाव से घुमाएं। आरती करते समय परिवार के सभी सदस्य हाथ जोड़कर खड़े हों और मन में शुद्धि का भाव रखें। आरती संपन्न होने पर थाली को सभी परिजनों के समक्ष ले जाएं ताकि वे अग्नि के तेज का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें।

🔮 आपकी समस्या के अनुसार होलिका दहन के उपाय

धन संबंधी रुकावट

होलिका दहन के स्थान से थोड़ी सी भस्म लाकर एक लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रखें। कब: पर्व की अगली सुबह स्नान के बाद। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: मंगल ग्रह भूमि और स्थायी संपत्ति के कारक हैं, जिससे रुका हुआ धन गति पकड़ता है।

करियर में ठहराव

होलिका की प्रज्वलित अग्नि में थोड़े से काले तिल और जौ के दाने दोनों हाथों से समर्पित करें। कब: पर्व की शाम को अग्नि प्रज्वलन के तुरंत बाद। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: मंगल ग्रह कार्यक्षेत्र में साहस और ऊर्जा का संचार कर निर्णय क्षमता को सशक्त बनाते हैं।

वैवाहिक कलह

एक तांबे के लोटे में शुद्ध जल और थोड़ा सा लाल चंदन मिलाकर होलिका की सात बार परिक्रमा करते हुए जल अर्पित करें। कब: पर्व की रात को अग्नि की परिक्रमा के समय। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: मंगल के उग्र प्रभाव को शांत कर दांपत्य जीवन में आपसी तालमेल और सामंजस्य स्थापित होता है।

संतान के स्वास्थ्य या एकाग्रता की चिंता

साबुत नारियल पर मौली लपेटकर संतान के सिर से सात बार वारकर होलिका की अग्नि में भेंट करें। कब: पर्व की शाम को सूर्यास्त के बाद। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: अग्नि तत्व और मंगल का यह पारंपरिक उपाय संतान के चारों ओर से नकारात्मक प्रभाव को समाप्त करता है।

घर में निरंतर कलह और अशांति

होलिका दहन की ठंडी भस्म लाकर घर के मुख्य द्वार पर अंदर की ओर छिड़कें। कब: पर्व के अगले दिन प्रातः सूर्योदय के तुरंत बाद। खर्च: free. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: मंगल की पावन अग्नि से शुद्ध हुई भस्म घर के वास्तु और वातावरण से नकारात्मक स्पंदन को दूर करती है।

मन में अज्ञात भय और नकारात्मकता

एक चुटकी राई और साबुत नमक अपने सिर से तीन बार घुमाकर जलती हुई होलिका में डाल दें। कब: पर्व की रात को होलिका की अग्नि के समक्ष। खर्च: free. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: मंगल ग्रह भय को समाप्त करने वाले आत्मबल के कारक हैं, जिससे मानसिक दुर्बलता नष्ट होती है।

क्या होलिका दहन आपके लिए विशेष है?

त्योहार और ग्रह-गोचर से जुड़े सामान्य उपाय सभी के लिए एक जैसे बताए जाते हैं, किंतु ज्योतिष का मूल सत्य यह है कि हर व्यक्ति की जन्मकुंडली अद्वितीय होती है। इस पर्व के अधिपति मंगल देव का प्रभाव सामान्य रूप से सभी पर पड़ता है, लेकिन आपकी अपनी कुंडली में मंगल किस भाव में हैं और आपकी महादशा क्या है, यह केवल व्यक्तिगत विश्लेषण से ही स्पष्ट हो सकता है। त्रिकाल वाणी में रोहीत गुप्ता पराशर परंपरा के अनुसार व्यक्तिगत परामर्श प्रदान करते हैं। यदि आप करियर, धन, दशा और सही समय को लेकर असमंजस में हैं, तो कुंडली सेवा आपको स्पष्ट दिशा देती है। वैवाहिक जीवन के तालमेल और रिश्ते की अनुकूलता के लिए कुंडली मिलान सेवा उपयोगी है। यदि जन्म विवरण उपलब्ध न हो, तो हस्तरेखा शास्त्र से दिशा समझी जा सकती है, जबकि गहरे संकेतों के अर्थ स्वप्न शास्त्र के माध्यम से जाने जा सकते हैं।

शब्दावली · Glossary

तिथि
चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोणीय अंतर पर आधारित वैदिक पंचांग का एक दिवस।
मुहूर्त
किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या मांगलिक कार्य के लिए निर्धारित अत्यंत शुभ समयावधि।
भद्रा
पंचांग का विष्टि करण, जिसमें होलिका दहन और शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है।
प्रदोष काल
सूर्यास्त के तुरंत बाद का वह पवित्र समय जिसमें सायंकालीन पूजन किया जाता है।
होलाष्टक
होलिका दहन से पूर्व के आठ दिनों की अवधि जिसमें शुभ संस्कार निषिद्ध होते हैं।
परिक्रमा
श्रद्धा और समर्पण के भाव से किसी पावन प्रतीक या पवित्र अग्नि के चारों ओर घूमना।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

  1. [1]↑अथर्व परिशिष्ट
    अथ फाल्गुन्यां पौर्णमास्यां रात्रौ होलाका ॥
    — अथर्व परिशिष्ट, अध्याय 18 — राजकर्मसांवत्सरीयम् · श्लोक 18b.12.1

    अथर्व परिशिष्ट के अनुसार होलिका का अनुष्ठान फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में किया जाता है।

    Atharva Parishishta states that the rite of Holika is observed at night on Phalguna Purnima.

  2. [2]↑कौषीतकि ब्राह्मण
    मुखम् वा एतत् संवत्सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी ।
    — कौषीतकि ब्राह्मण, अध्याय 4 · श्लोक 4.3

    कौषीतकि ब्राह्मण के अनुसार फाल्गुनी पूर्णिमा को संवत्सर का मुख माना गया है।

    Kaushitaki Brahmana notes that Phalguna Purnima is considered the mouth or opening of the sacrificial year.

  3. [3]↑बृहत् पाराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    स्वांशे बलयुते भौमे जातः कन्तायुघी भवेत् । वह्निजीवी नरो वाऽपि रसवादी च जायते
    — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 33 · श्लोक 14

    बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार बलवान मंगल का संबंध अग्नि और पराक्रम से होता है।

    Brihat Parashara Hora Shastra associates a strong Mars with fire energy and valor.

  4. [4]↑मुहूर्त चिंतामणिमुहूर्तचिन्तामणि · Rama Daivajna
    विपादेरावतीतीरे शल्याश्च त्रिपुष्करे। विवाहादिदिने नेष्टं होलिकाप्राग्दिनाष्टकम्॥
    — मुहूर्त चिंतामणि, अध्याय 1 · श्लोक 40

    मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार होलिका से पूर्व के आठ दिनों में विवाह आदि मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं।

    Muhurta Chintamani states that the eight days preceding Holika are not favored for auspicious rites like marriage.

नोएडा में होलिका दहन — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

होलिका दहन 2027 में किस तारीख को है?

वर्ष 2027 में होलिका दहन का पर्व 22 मार्च, सोमवार को मनाया जाएगा। यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को सायंकाल भद्रा रहित काल में मनाया जाता है। 21 मार्च को सायंकाल में भद्रा का प्रभाव रहने के कारण शास्त्रों के अनुसार 22 मार्च को ही दहन का निर्णय लिया गया है। इस दिन सूर्यास्त के बाद निर्धारित शुभ मुहूर्त में पूजा और अग्नि प्रज्वलन संपन्न करना श्रेयस्कर है।

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त कैसे निर्धारित किया जाता है?

होलिका दहन के लिए फाल्गुन पूर्णिमा का सायंकाल यानी प्रदोष काल देखा जाता है और उसमें भद्रा का पूर्ण अभाव होना अनिवार्य है। यदि पूर्णिमा के दौरान भद्रा लगी हो, तो भद्रा मुख या भद्रा काल में अग्नि प्रज्वलित करना शास्त्रों में सर्वथा वर्जित माना गया है। जब भद्रा समाप्त हो जाती है और पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहती है, वही समय होलिका दहन के लिए शुद्ध माना जाता है। आपके शहर के सटीक मुहूर्त की जानकारी ऊपर दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से उपलब्ध है।

क्या अलग-अलग शहरों में होलिका दहन का समय अलग होता है?

हाँ, भारत और विश्व के विभिन्न शहरों में सूर्यास्त और स्थानीय पंचांग गणना के अनुसार मुहूर्त के समय में कुछ मिनटों का अंतर आ सकता है। प्रत्येक स्थान के देशांतर और अक्षांश के कारण तिथियों का प्रवेश और प्रदोष काल का समय थोड़ा भिन्न होता है। इसीलिए स्थानीय सूर्यास्त के समय को ध्यान में रखकर ही पूजा का सही समय निकालना चाहिए। आप जिस नगर में हैं, उसके अनुसार सटीक समय जानने के लिए इसी पेज पर दिए गए गणना चार्ट को देखें।

होलिका दहन के दिन सबसे मुख्य पूजा क्या होती है?

इस दिन का मुख्य अनुष्ठान सायंकाल लकड़ी और उपलों से सजी होलिका की विधिवत पूजा करना और शुभ मुहूर्त में अग्नि प्रज्वलित करना है। पूजा के दौरान चिता पर कच्चा सूत लपेटा जाता है, शुद्ध जल का अर्घ्य दिया जाता है और नए अनाज की बालियां समर्पित की जाती हैं। इसके बाद अग्नि की परिक्रमा करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की प्रार्थना की जाती है। अंत में अग्नि की पवित्र राख को माथे पर लगाना और प्रसाद बांटना इस पूजा का अभिन्न अंग है।

होलिका दहन और धुलंडी (रंगों वाली होली) में क्या अंतर है?

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की सायंकाल को मनाया जाने वाला एक विशुद्ध वैदिक और धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें अग्नि पूजा की जाती है। इसके ठीक अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंगों का त्योहार धुलंडी या रंगवाली होली का उत्सव हर्षोल्लास के साथ खेला जाता है। होलिका दहन का संबंध तप, त्याग, शुद्धि और असत्य पर सत्य की विजय से है, जबकि धुलंडी वसंत ऋतु के स्वागत और आपसी प्रेम का सामाजिक पर्व है। इस प्रकार दोनों पर्व एक-दूसरे से जुड़े होने के बावजूद अपने स्वरूप और परंपरा में पूरी तरह भिन्न हैं।

इस दिन किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?

होलिका दहन के दिन शास्त्रों के अनुसार निर्धारित मुहूर्त से पहले कभी भी अग्नि प्रज्वलित नहीं करनी चाहिए। किसी भी जीवित पेड़-पौधे या हरे वृक्ष की लकड़ियों को काटकर चिता में डालना सर्वथा अनुचित माना गया है। इस दिन तामसिक भोजन, मदिरा या अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से पूरी तरह बचना चाहिए। साथ ही अपने मन में किसी भी व्यक्ति के प्रति कटुता या दुर्भावना न रखकर केवल सात्विक भाव बनाए रखना चाहिए।

क्या होलिका दहन के दिन उपवास रखना अनिवार्य है?

होलिका दहन पर उपवास रखना पूरी तरह से पारंपरिक और स्वैच्छिक आस्था पर निर्भर करता है, यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है। कई श्रद्धालु फाल्गुन पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल से लेकर सायंकाल होलिका प्रज्वलन तक फलाहार का व्रत रखते हैं। जो लोग व्रत नहीं रख पाते, वे भी इस दिन सात्विक आहार ग्रहण करके पूजा में श्रद्धापूर्वक सम्मिलित हो सकते हैं। अपने स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता के अनुसार ही उपवास का निर्णय लेना सबसे उचित रहता है।

होलिका दहन के व्रत में क्या खा सकते हैं?

यदि आप उपवास रख रहे हैं, तो दिन के समय ताजे फल, दूध, दही और फलों के रस का सेवन कर सकते हैं। फलाहार में कूटू, सिंघाड़े के आटे से बनी वस्तुएं या साबूदाना की खिचड़ी ली जा सकती है जिसमें केवल सेंधा नमक का उपयोग किया गया हो। साधारण नमक, अन्न और दालों का सेवन व्रत के दौरान पारंपरिक रूप से वर्जित माना जाता है। पर्याप्त मात्रा में जल पीकर शरीर में तरलता बनाए रखना भी आवश्यक है।

इस दिन की पूजा के लिए कौन-कौन सी सामग्री आवश्यक है?

पूजा के लिए एक तांबे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल, रोली, बिना टूटे साबुत अक्षत और ताजे पुष्प आवश्यक होते हैं। इसके साथ ही कच्चा सफेद सूत, गाय के गोबर से बने उपले या बड़कुले और नए गेहूं या चने की बालियां पूजा थाली में रखी जाती हैं। यदि संभव हो तो थोड़ा सा कपूर, धूपबत्ती और गुड़ या बताशे भी भोग के लिए रख लें। यह बहुत ही सरल सामग्री है जो सामान्यतः हर घर में सहजता से उपलब्ध हो जाती है।

होलिका दहन की पारंपरिक कथा क्या संदेश देती है?

होलिका और प्रह्लाद की कथा यह शाश्वत संदेश देती है कि ईश्वर के प्रति निष्काम भक्ति और सत्य का मार्ग कभी पराजित नहीं हो सकता। हिरण्यकशिपु का असीम बल और होलिका को मिला वरदान भी अहंकार और अधर्म की रक्षा नहीं कर सका। जब मनुष्य अपने वरदानों या शक्तियों का दुरुपयोग दूसरों को कष्ट देने के लिए करता है, तो उसका स्वयं का विनाश निश्चित हो जाता है। यह कथा हमें कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धर्म और सत्य पर अडिग रहने की प्रेरणा देती है।

ज्योतिष में इस पर्व का क्या आध्यात्मिक महत्व बताया गया है?

ज्योतिषीय परंपरा में होलिका दहन के दिन अग्नि तत्व की प्रधानता होती है और इसके अधिष्ठाता ग्रह मंगल माने जाते हैं। फाल्गुन पूर्णिमा की पावन अग्नि वातावरण में फैली नकारात्मक तरंगों और मानसिक तनाव को भस्म करने का माध्यम बनती है। इस दिन की गई आराधना से व्यक्ति के भीतर साहस, आत्मबल और सकारात्मक चेतना का विकास होता है। यह पर्व पिछले वर्ष की सभी कड़वाहटों को जलाकर जीवन में एक नई सात्विक शुरुआत करने का शुभ अवसर प्रदान करता है।

क्या होलिका दहन के दिन कोई नया काम या व्यापार शुरू कर सकते हैं?

होलिका दहन से पहले के आठ दिनों में होलाष्टक लगा रहता है, जिसे नए कार्यों के शुभारंभ के लिए शुभ नहीं माना जाता। पारंपरिक ज्योतिष के अनुसार इस काल में सभी ग्रह उग्र अवस्था में माने जाते हैं, इसलिए नया व्यापार, गृह प्रवेश या विवाह आदि टालने की सलाह दी जाती है। यदि कोई अत्यंत अनिवार्य कार्य हो, तो किसी योग्य ज्योतिषी से व्यक्तिगत कुंडली के अनुसार मुहूर्त विचार लेना चाहिए। सामान्यतः नए कार्यों की शुरुआत के लिए होली के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की तिथियों को उत्तम माना जाता है।

क्या इस पावन दिन पर सोने-चांदी के गहने या वाहन की खरीदारी कर सकते हैं?

दैनिक जीवन की सामान्य वस्तुएं और पूजा सामग्री खरीदने पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है। परंतु नए वाहन, भूमि, मकान या बहुमूल्य आभूषणों की बड़ी खरीदारी को होलाष्टक और होलिका दहन के दिन पारंपरिक रूप से टाला जाता है। लोग इस अवधि में केवल उत्सव और पूजन की तैयारियों से जुड़ी आवश्यक वस्तुएं ही खरीदते हैं। बड़ी खरीदारी के लिए चैत्र नवरात्रि या अन्य आगामी शुभ योगों की प्रतीक्षा करना अधिक फलदायी माना गया है।

क्या होलिका दहन की पूजा में कोई विशेष मंत्र पढ़ना आवश्यक है?

इस परंपरा के अधिकृत तथ्यों में कोई विशिष्ट मंत्र दर्ज नहीं है, इसलिए किसी भी मनगढ़ंत मंत्र का जाप करने की आवश्यकता नहीं है। पूजा के दौरान आप पूरी एकाग्रता और शांत मन से केवल भगवान का स्मरण कर सकते हैं। शुद्ध भाव से अग्नि को जल और पुष्प अर्पित करते हुए अपने परिवार के कल्याण की सरल प्रार्थना ही पर्याप्त मानी जाती है। शास्त्रों में मंत्र के शब्दों से अधिक मन की निष्कपट भावना और भक्ति को प्रधानता दी गई है।

होलिका दहन के दिन दान का क्या महत्व है और क्या दान करना चाहिए?

इस पावन पूर्णिमा के दिन जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। आप किसी असहाय व्यक्ति को अनाज, गुड़, तिल या स्वच्छ वस्त्रों का दान कर सकते हैं। पशु-पक्षियों के लिए दाना और जल की व्यवस्था करना भी इस दिन विशेष रूप से शुभ माना गया है। बिना किसी दिखावे के शुद्ध अंतःकरण से किया गया छोटा सा दान भी घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

जीवन में शांति और उन्नति के लिए इस दिन कौन सा सरल उपाय कर सकते हैं?

होलिका दहन के अवसर पर मंगल के अग्नि तत्व को शांत और अनुकूल करने के लिए परिक्रमा करना सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है। आप पूजा के समय अग्नि में थोड़े से अक्षत, जौ या काले तिल अर्पित करके तीन बार परिक्रमा कर सकते हैं। इसके साथ ही अगले दिन प्रातःकाल होलिका की थोड़ी सी पवित्र भस्म लाकर माथे पर तिलक के रूप में लगाना पारंपरिक रूप से शुभकारी माना जाता है। यह सरल क्रिया बिना किसी अतिरिक्त खर्च के मन के भय और नकारात्मक विचारों को दूर करने में सहायक मानी जाती है।

भद्रा क्या है और होलिका दहन में भद्रा का विचार क्यों किया जाता है?

ज्योतिष शास्त्र के पंचांग में विष्टि करण को ही लोक भाषा में भद्रा कहा जाता है। भद्रा को एक उग्र और संहारक काल माना गया है, जिसमें मांगलिक कार्य और अग्नि प्रज्वलन सर्वथा निषिद्ध होते हैं। प्राचीन ग्रंथों के स्पष्ट निर्देश हैं कि यदि भद्रा में होलिका दहन किया जाए तो वह क्षेत्र और समाज के लिए शुभ फलदायी नहीं होता। इसी कारण पंचांग गणना में भद्रा के पूर्ण रूप से समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन का मुहूर्त निकाला जाता है।

क्या होलिका की राख को घर लाना चाहिए और इसका क्या उपयोग है?

हाँ, पारंपरिक लोक विश्वास के अनुसार होलिका दहन की अगली सुबह उसकी पवित्र भस्म को घर लाना बहुत शुभ माना जाता है। इस भस्म को घर के चारों कोनों या मुख्य द्वार पर छिड़कने से नकारात्मक ऊर्जा का निवारण माना जाता है। कई परिवारों में इस भस्म को पूरे वर्ष तांबे या चांदी की डिब्बी में सुरक्षित रखने की भी परंपरा है। यह भस्म हमें यह भी याद दिलाती है कि बुराई चाहे कितनी भी प्रबल हो, अंत में सत्य के सम्मुख राख ही बनती है।

क्या परिवार का कोई भी सदस्य होलिका की पूजा कर सकता है?

हाँ, परिवार का कोई भी वयस्क स्त्री या पुरुष पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ होलिका का पूजन संपन्न कर सकता है। परंपरागत रूप से घर के सभी सदस्य एक साथ मिलकर पूजा स्थल पर जाते हैं और सामूहिक रूप से परिक्रमा करते हैं। बच्चों को भी इस पूजन में सम्मिलित किया जाता है ताकि वे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा से परिचित हो सकें। केवल इतना ध्यान रखना आवश्यक है कि जो भी व्यक्ति पूजा करे, वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वच्छ स्थिति में हो।

होलिका दहन 2027 की रात को क्या विशेष सावधानी रखनी चाहिए?

वर्ष 2027 में होलिका दहन के समय भीड़भाड़ और अग्नि की लपटों से सुरक्षित दूरी बनाए रखना सबसे पहली सावधानी है। छोटे बच्चों को जलती हुई चिता के बहुत निकट न जाने दें और सूती वस्त्र ही धारण करें। किसी भी प्रकार के रासायनिक या ज्वलनशील द्रव्यों का उपयोग करने के बजाय केवल पारंपरिक लकड़ियों और उपलों से ही दहन करें। पूजा के बाद आसपास की स्वच्छता का ध्यान रखें और शांतिपूर्वक अपने घर लौटकर उत्सव की सात्विकता बनाए रखें।

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