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मूल नक्षत्र कैसे जानें: गंडमूल की पहचान

Rohiit Gupta· Chief Vedic Architect14 min read

Trikaal Sandesh — Direct Answer

जन्म मूल नक्षत्र जानने के लिए जन्म के समय चंद्रमा का नक्षत्र देखें। अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती छह गंडमूल नक्षत्र माने जाते हैं। जन्म-समय इनमें हो तो परंपरा शांति कराने को कहती है, पर इसे भय नहीं, जाँच और सरल उपाय का विषय समझें।

Deep Dive Analysis

जन्म मूल नक्षत्र कैसे जानें: सीधा उत्तर

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही जन्म नक्षत्र है। यदि वह अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल या रेवती हो, तो उसे गंडमूल कहा जाता है। इसलिए पहला काम सही जन्म-समय और स्थान के साथ कुंडली बनाना है। नक्षत्र जानने के लिए मुफ़्त नक्षत्र कैलकुलेटर सबसे सीधा साधन है। संतान के जन्म-समय की पूरी योजना समझने के लिए संतान जन्म मुहूर्त गाइड पढ़ें।

सबसे पहले सही जन्म-विवरण जुटाएँ

नक्षत्र का निर्णय चंद्रमा की स्थिति से होता है, जो लगभग एक दिन में एक नक्षत्र पार करता है, इसलिए कुछ घंटों की गलती से भी नक्षत्र बदल सकता है। इसलिए जन्म की तारीख, सही समय और जन्म-स्थान तीनों लिखकर रखें। अस्पताल का रिकॉर्ड सबसे भरोसेमंद माना जाता है। अनुमान से बताए गए समय पर कभी-कभी गंडमूल या ग़ैर-गंडमूल का निष्कर्ष उलट जाता है। इस कारण संदेह हो तो समय का शोधन किसी जानकार से कराएँ।

चंद्र का नक्षत्र कैसे पता चलता है

कुंडली में चंद्रमा जिस राशि-अंश पर है, उससे नक्षत्र और चरण तय होता है। आप जन्म कुंडली कैलकुलेटर से पूरी कुंडली बना सकते हैं, या सीधे नक्षत्र कैलकुलेटर में जन्म-विवरण दे सकते हैं। विधि को विस्तार से समझने के लिए जन्म नक्षत्र कैसे पता करें और नक्षत्र कैलकुलेटर गाइड उपयोगी हैं। चंद्र राशि के लिए राशि कैलकुलेटर भी देखें।

छह नक्षत्रों के अंश: कहाँ से कहाँ तक

हर नक्षत्र 13 अंश 20 कला का होता है। अश्विनी मेष के आरंभिक 13 अंश 20 कला में आता है, आश्लेषा कर्क के अंतिम 13 अंश 20 कला में और मघा सिंह के आरंभ में। ज्येष्ठा वृश्चिक के अंतिम 13 अंश 20 कला में, मूल धनु के आरंभ में और रेवती मीन के अंतिम भाग में है। यानी चंद्रमा जब मेष, सिंह या धनु के पहले हिस्से में या कर्क, वृश्चिक, मीन के अंतिम हिस्से में हो, तब जन्म गंडमूल नक्षत्र में माना जाता है।

गंडांत तीन प्रकार का होता है: तिथि, नक्षत्र और लग्न

बृहत् पराशर होरा शास्त्र में गंडांत तीन प्रकार का बताया गया है। ये तिथि, नक्षत्र और लग्न के भेद से हैं और जन्म, यात्रा तथा विवाह आदि में अशुभ कहे गए हैं[1]। इसलिए मूल नक्षत्र का प्रश्न नक्षत्र-गंडांत से जुड़ा है, पर पूरी जाँच में तिथि और लग्न के गंडांत भी देखे जाते हैं। यह जाँच कुंडली के बिना अधूरी रहती है। लग्न जानने के लिए लग्न कैलकुलेटर का उपयोग कर सकते हैं।

छह गंडमूल नक्षत्र और उनके संधि-स्थान

शास्त्र के अनुसार नक्षत्र गंडांत रेवती और अश्विनी के संधि, आश्लेषा और मघा के संधि तथा ज्येष्ठा और मूल के संधि पर बताया गया है। इसका विस्तार चार नाड़ी यानी लगभग 96 मिनट का कहा गया है[2]। इसी कारण तीन जोड़े बनते हैं: रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा और ज्येष्ठा-मूल। इन तीनों जोड़ों में बुध-केतु का संधि भी जुड़ा है, क्योंकि आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती बुध के तथा अश्विनी, मघा और मूल केतु के नक्षत्र हैं। इसे जानने से दशा का क्रम भी समझ आता है।

अश्विनी और रेवती: केतु और बुध का संधि-स्थान

रेवती मीन का अंतिम नक्षत्र है और अश्विनी मेष का पहला, इसलिए यह संधि राशि-चक्र के अंत और आरंभ का बिंदु है। रेवती बुध का और अश्विनी केतु का नक्षत्र है। इस संधि के आसपास जन्म को सावधानी से देखा जाता है। रेवती के बारे में संतान जन्म के संदर्भ में अलग लेख रेवती नक्षत्र और संतान जन्म में है। केतु की प्रकृति समझने के लिए केतु क्या है पढ़ें।

आश्लेषा और मघा: सर्प और पितृ का संधि-स्थान

आश्लेषा कर्क के अंतिम भाग में है और मघा सिंह के आरंभ में। आश्लेषा का देवता सर्प और मघा का देवता पितृगण माना जाता है। यहाँ भी बुध और केतु के नक्षत्र आपस में मिलते हैं। परंपरा में इसे गंडांत की श्रेणी में रखा गया है। इसका यह अर्थ नहीं कि इसमें जन्मे सभी जातक कष्ट पाते हैं। यह केवल संधि के कारण अतिरिक्त ध्यान रखने की सूचना है। मघा और पितृ-संबंधों की चर्चा केतु और पितृ दोष में देखी जा सकती है।

ज्येष्ठा और मूल: सबसे संवेदनशील संधि

ज्येष्ठा वृश्चिक का अंतिम नक्षत्र है और मूल धनु का पहला। तीनों संधियों में परंपरा ज्येष्ठा-मूल के संधि को सबसे अधिक गंभीर मानती है। इसी स्थान के लिए अभुक्त मूल शब्द आता है। यह वह छोटा सा समय-खंड है जहाँ दोनों नक्षत्र मिलते हैं। इसलिए जन्म का केवल नक्षत्र जानना काफ़ी नहीं, यह भी देखना होता है कि जन्म संधि के कितने पास हुआ। यह जाँच केवल सटीक कुंडली और पंचांग से संभव है।

अभुक्त मूल क्या है और उसका समय कैसे गिनें

बृहत् पराशर होरा शास्त्र कहता है कि इन गंडांतों में अभुक्त मूल को महान विघ्न का कारण माना गया है, जो इंद्र और राक्षस नक्षत्रों के संधि में क्रमशः पाँच और आठ घटी का होता है[3]। एक घटी लगभग 24 मिनट की होती है। इस तरह ज्येष्ठा का अंतिम लगभग दो घंटे और मूल का आरंभिक लगभग तीन घंटे बारह मिनट का हिस्सा अभुक्त मूल कहलाता है। इसी कारण जन्म-समय की सटीकता सबसे अधिक यहीं महत्त्व रखती है।

ज्येष्ठा और मूल के अधिपति: इंद्र और राक्षस

शास्त्र में ज्येष्ठा और मूल के अधिपति इंद्र और राक्षस बताए गए हैं। उनके आपसी महान वैर के कारण दोनों का संधि-स्थान बड़ा दोष देने वाला कहा गया है[4]। यह एक प्रतीकात्मक व्याख्या है, जो समझाती है कि संधि पर दो भिन्न स्वभाव के नक्षत्र आपस में टकराते हैं। आज इसे डर की तरह नहीं, यह जानने की कसौटी की तरह देखें कि जन्म-समय की विशेष जाँच और सरल शांति करने का उद्देश्य क्या है।

शास्त्र की कठोर भाषा को आज कैसे पढ़ें

इसी अध्याय में अभुक्त मूल में जन्मे संतान के त्याग, या पिता द्वारा आठ वर्ष तक उसका मुख न देखने का उल्लेख भी है[5]। यह अपने समय की कठोर प्रथा का वर्णन है। हम इसे आज के लिए निर्देश नहीं मानते और किसी परिवार को ऐसा कदम उठाने को नहीं कहते। इसका स्वस्थ पाठ यही है कि शास्त्र ने इस संधि को गंभीर माना और उसके निवारण के लिए शांति-विधि भी दी। इसलिए डर नहीं, शांति और प्रेम का रास्ता अपनाएँ।

मूल नक्षत्र की प्रकृति: सामान्य संकेत

केतु के नक्षत्रों अश्विनी, मघा और मूल में पहल, जड़ों तक जाने की प्रवृत्ति और स्वतंत्र सोच के संकेत माने जाते हैं। बुध के नक्षत्रों आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती में बुद्धि, संवाद और संवेदनशीलता प्रमुख मानी जाती है। ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, किसी की कुंडली का पक्का चित्र नहीं। हर व्यक्ति में लग्न, ग्रह और दशा से फल बदलता है। नक्षत्र का भाव पूरी कुंडली में समझने के लिए चंद्र नक्षत्र और मन पढ़ें।

क्या हर गंडमूल जन्म अशुभ होता है

नहीं। यह सबसे बड़ा भ्रम है कि गंडमूल में जन्मा बच्चा परिवार के लिए अशुभ होता है। गंडमूल एक चेतावनी-सूचक वर्ग है, परिणाम की गारंटी नहीं। कई गंडमूल जातक अपने क्षेत्रों में शिखर तक पहुँचते हैं। असली प्रभाव कुंडली के लग्न, ग्रहों की स्थिति और दशा से तय होता है। इसलिए जल्दबाज़ी में कोई निष्कर्ष न निकालें और ज्योतिषी से भी भय की भाषा सुनने के बजाय स्पष्ट विश्लेषण माँगें।

चरण का प्रश्न: क्या चरण से फल बदलता है

लोक-परंपरा में कहा जाता है कि मूल नक्षत्र के अलग-अलग चरण में जन्म का असर परिवार के अलग सदस्यों पर माना जाता है। हमने इस विभाजन का श्लोक-संदर्भ अपने पुस्तकालय के इन अध्यायों में सत्यापित नहीं पाया, इसलिए इसे हम पक्का नियम नहीं मानते। इसे परंपरा के रूप में सुनें और पक्की घोषणा के रूप में नहीं। चरण की सही गणना के लिए कुंडली में चंद्र का सटीक अंश देखना आवश्यक है।

शांति कब करनी चाहिए

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार शांति जन्म के बारहवें दिन, उसी नक्षत्र वाले शुभ दिन, या बालक के आठवें वर्ष में विधि-पूर्वक करनी चाहिए[6]। व्यवहार में बहुत से परिवार जन्म के लगभग सत्ताईसवें दिन जब वही नक्षत्र लौटता है, तब यह शांति करवाते हैं। शुभ दिन चुनने के लिए पंचांग देखें और शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर की मदद लें। अवसर चूक जाए तो चिंता न करें, आगे भी रास्ता खुला रहता है।

शांति की सरल रूपरेखा

शास्त्र में शांति का विस्तृत विधान है। इसमें साफ़ स्थान पर मंडप, कलश-स्थापना, नक्षत्र देवता की सोने की प्रतिमा या उसका मूल्य, आचार्य का वरण, हवन, जप और अभिषेक का क्रम बताया गया है। प्रतिमा सामर्थ्य के अनुसार सोने की न्यून मात्रा में भी हो सकती है। आज अधिकतर परिवार योग्य पंडित से पूरी या संक्षिप्त विधि कराते हैं। विधि का चयन अपने कुलाचार और बजट के अनुसार करें और किसी दबाव में महँगा आयोजन न करें।

त्र्यम्बक मंत्र और अभिषेक

शांति के विधान में त्र्यम्बक मंत्र का जप प्रमुख है। शास्त्र कहता है कि शांति के लिए त्र्यम्बक मंत्र का जप करें और फिर आदरपूर्वक अभिषेक के लिए देवता से प्रार्थना करें[7]। इस मंत्र की भावना रक्षा और आरोग्य की है। जो परिवार बड़ी विधि न कर सकें, वे श्रद्धा से घर पर जप और जल-अर्पण कर सकते हैं। इसकी संख्या और विधि अपने कुलपुरोहित से पूछ लें। मन की शांति सबसे बड़ा परिणाम है।

क्या शांति कराना अनिवार्य है

शांति परंपरा का हिस्सा है, पर इसे अनिवार्य नियम बनाकर डर पैदा करना ठीक नहीं। जिन परिवारों की आस्था है, वे सरल विधि से शांति करवा सकते हैं। जिनकी आस्था नहीं है, वे भी बच्चे के प्रति प्रेम, उसका स्वास्थ्य और संस्कार पर ध्यान देकर वही सकारात्मकता पा सकते हैं। निर्णय कुंडली के विश्लेषण और परिवार की आस्था दोनों पर आधारित हो। कोई भी सलाह जो कर्ज़ लेकर अनुष्ठान माँगे, उसे सावधानी से देखें।

शांति से पहले परिवार के लिए तैयारी सूची

शांति की तारीख तय होने पर सबसे पहले जन्म-विवरण की पुष्टि करें और कुल-पुरोहित से संपर्क करें। फिर पूजा की सामग्री, कलश, वस्त्र और भोजन की व्यवस्था देखें। माता-पिता और बच्चे के लिए स्वच्छ वस्त्र रखें। बच्चे की सेहत को देखते हुए समय का चुनाव करें, खासकर जब वह बहुत छोटा हो। पूरा खर्च पहले से समझ लें। सरल विधि में भी भावना उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। अपनी कुंडली के उपाय जाँचने के लिए उपाय कैलकुलेटर देखें।

बचपन में शांति न हुई हो तो वयस्क क्या करें

कई वयस्कों को बाद में पता चलता है कि उनका जन्म गंडमूल में हुआ था। ऐसे में घबराने की ज़रूरत नहीं। शास्त्र आठवें वर्ष का अवसर भी बताता है, और परंपरा में जब चंद्रमा उसी नक्षत्र में लौटे तब सरल जप और दान करना भी मान्य रहा है। जीवन में चल रही परिस्थितियों को केवल मूल नक्षत्र से न जोड़ें, क्योंकि करियर, संबंध और स्वास्थ्य के कई कारण होते हैं। पहले कुंडली की पूरी जाँच कराएँ, फिर ज़रूरत लगे तो उपाय चुनें।

मूल नक्षत्र और दशा का संबंध

विंशोत्तरी दशा में जन्म के समय चल रही महादशा चंद्र के नक्षत्र के स्वामी से तय होती है। इसलिए अश्विनी, मघा और मूल में जन्मे बच्चे की पहली दशा केतु की और आश्लेषा, ज्येष्ठा तथा रेवती में जन्मे बच्चे की पहली दशा बुध की होती है। यही कारण है कि मूल नक्षत्र का फल दशा के साथ पढ़ा जाता है। अपनी दशा की स्पष्ट तस्वीर के लिए दशा कैलकुलेटर चलाएँ। शेष दशा की गणना जन्म-अंश पर निर्भर करती है।

नामकरण और मूल नक्षत्र का संबंध

नामकरण आमतौर पर जन्म नक्षत्र के चरण के अनुसार अक्षर चुनकर किया जाता है, इसलिए मूल नक्षत्र में जन्मे बच्चे के लिए सही चरण जानना आवश्यक है। उचित अक्षर जानने के लिए नक्षत्र से शुभ नाम अक्षर और बेबी नेम कैलकुलेटर देखें। नामकरण की तिथि के लिए नामकरण का शुभ मुहूर्त पढ़ें। शांति के बाद नामकरण करना भी कई परिवारों की परंपरा है।

मुंडन और अन्य संस्कारों में ध्यान

शांति के बाद मुंडन, अन्नप्राशन जैसे संस्कार सामान्य तरीके से किए जाते हैं। इन संस्कारों के मुहूर्त का चुनाव पंचांग, नक्षत्र और बच्चे की सुविधा देखकर होता है। मुंडन की तिथि के लिए मुंडन का शुभ मुहूर्त देखें। संस्कारों को डर या दबाव में नहीं, उत्सव की भावना से करें। बच्चे का स्वास्थ्य, मौसम और परिवार की उपलब्धता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना नक्षत्र।

प्रसव की योजना: चिकित्सक की सलाह सबसे ऊपर

कुछ परिवार चाहते हैं कि जन्म मूल नक्षत्र से बचकर हो। पर प्रसव का समय माँ और शिशु के स्वास्थ्य के आधार पर चिकित्सक तय करते हैं, और ज्योतिष की इच्छा उस पर भारी नहीं पड़नी चाहिए। मुहूर्त का विचार केवल उसी सुरक्षित सीमा के भीतर होता है जो डॉक्टर बताएँ। इस संतुलन को समझने के लिए डॉक्टर की सुरक्षित अवधि बनाम मुहूर्त और संतान जन्म मुहूर्त के 9 कारक पढ़ें।

नक्षत्र बाद में पता चले तो पहले क्या करें

यदि बच्चे के जन्म के कुछ दिन बाद पता चले कि नक्षत्र गंडमूल है, तो पहले जन्म-समय की पुष्टि करें, फिर कुंडली के आधार पर निर्णय लें। जल्दबाज़ी में कोई बड़ा खर्च न करें। शांति का एक उचित समय मिल सकता है, जैसे बारहवाँ दिन या उसी नक्षत्र का अगला शुभ दिन। तब तक बच्चे के साथ सामान्य जीवन और माँ के स्वास्थ्य का ध्यान रखें। जल्दी की ज़रूरत हो तो संतान जन्म मुहूर्त FAQ भी पढ़ें।

विवाह और मूल नक्षत्र: क्या सचमुच बाधा है

कुछ परिवार गंडमूल नक्षत्र वाले वर या वधू को लेकर विवाह में हिचकिचाते हैं। पर विवाह का निर्णय केवल नक्षत्र से नहीं, पूरी कुंडली से होना चाहिए। शास्त्र ने गंडांत को जन्म और विवाह के संदर्भ में चेतावनी के रूप में रखा है, पर मिलान में गुण, मंगल की स्थिति, सप्तमेश का बल और दशा का भी मेल देखा जाता है। इसके लिए 36 गुण मिलान समझें और कुंडली मिलान देखें।

पितृ दोष और मूल नक्षत्र का भ्रम

कई लोग मानते हैं कि मूल नक्षत्र में जन्म का अर्थ पितृ दोष है। ये दोनों अलग विषय हैं। गंडमूल जन्म-समय की संधि का विषय है, जबकि पितृ दोष कुंडली के सूर्य, चंद्र, राहु-केतु और नवम भाव से जुड़ा विषय है। दोनों का एक साथ होना ज़रूरी नहीं। पितृ-संबंधी जाँच के लिए पितृ दोष कैलकुलेटर और बच्चे के जन्म से जुड़ी चर्चा के लिए पितृ दोष और संतान जन्म पढ़ें।

ठगी और डर के व्यापार से बचें

गंडमूल शब्द सुनते ही कई परिवार घबराकर महँगे अनुष्ठान करवा लेते हैं। कोई भी सच्चा मार्गदर्शन आपको पहले जन्म-विवरण की पुष्टि कराएगा, संधि से दूरी बताएगा और सरल विकल्प देगा। जो डर पैदा करे, तुरंत बड़ी रकम माँगे या अनिष्ट की गारंटी दे, उससे दूरी रखें। शास्त्र स्वयं सामर्थ्य के अनुसार विधि करने की बात कहता है। निर्णय अपनी आस्था और स्पष्ट जानकारी पर आधारित रखें।

Trikaal Vaani मूल नक्षत्र को कैसे पढ़ता है

हम जन्म-समय को स्विस एफेमेरिस से जाँचकर चंद्र का नक्षत्र, चरण और संधि से दूरी निकालते हैं, फिर कुंडली के बाकी घटकों के साथ पढ़ते हैं। शास्त्र का हवाला तभी देते हैं जब श्लोक हमारे पुस्तकालय में सत्यापित हो, और कठोर श्लोकों को उनके संदर्भ के साथ बताते हैं। परिवार से जुड़े अन्य लेख परिवार विषय में हैं। हमारे संस्थापक रोहित गुप्ता की पद्धति के लिए संस्थापक परिचय पढ़ें।

नक्षत्र को कुंडली के अन्य घटकों के साथ पढ़ें

केवल नक्षत्र देखकर निष्कर्ष निकालना अधूरा है। कुंडली में लग्न का बल, चंद्र की शक्ति और कमज़ोर ग्रह भी साथ में देखे जाते हैं। इसके लिए कमज़ोर ग्रह खोजक, कुंडली बल कैलकुलेटर और लग्न बल कैलकुलेटर उपयोगी हैं। कुंडली पढ़ने की बुनियादी समझ के लिए जन्म कुंडली क्या है और मेरी जन्म कुंडली पढ़ें। इस तरह मूल नक्षत्र का प्रश्न बड़े चित्र में अपनी सही जगह पर बैठ जाता है।

बच्चे के भविष्य को लेकर माता-पिता की चिंता

गंडमूल जन्म के बाद माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता बच्चे का भविष्य होती है। बच्चे की प्रतिभा, पढ़ाई की दिशा और विकास को समझने में पंचमेश, गुरु और दशा की भूमिका अहम है। इस पर बच्चे का भाग्य और ज्योतिष, गुरु पुत्रकारक और संतान, दशा और बच्चे का विकास और पंचमेश और बच्चे की प्रतिभा पढ़ें। भविष्य की तस्वीर केवल मूल नक्षत्र से नहीं बनती।

सारांश: मूल नक्षत्र पर याद रखने योग्य बातें

जन्म मूल नक्षत्र जानने का तरीका सरल है: सही जन्म-विवरण से चंद्र का नक्षत्र निकालें। अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती गंडमूल हैं और अभुक्त मूल का समय ज्येष्ठा-मूल के संधि पर होता है। शास्त्र शांति का समय और मंत्र बताता है, पर कठोर बातों को आज के लिए निर्देश न मानें। डर से बचें और पूरी कुंडली देखें। अपना नक्षत्र जानने के लिए नक्षत्र कैलकुलेटर और संतान जन्म की योजना के लिए संतान जन्म मुहूर्त कैलकुलेटर देखें।

Apna Personalized Analysis Lein

Yeh article general framework hai. Aapke specific chart ke according detailed analysis ke liye:

शब्दावली · Glossary

गंडमूल
अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती नक्षत्रों का समूह, जिनमें जन्म को परंपरा सावधानी से देखती है।
गंडांत
तिथि, नक्षत्र या लग्न के संधि-स्थान का वह समय-खंड, जिसे जन्म आदि में अशुभ माना गया है।
अभुक्त मूल
ज्येष्ठा और मूल के संधि पर आने वाला सबसे संवेदनशील समय-खंड।
घटी
समय की पारंपरिक इकाई, जो लगभग 24 मिनट की होती है।
चरण
नक्षत्र का चौथाई भाग, जिससे नामकरण का अक्षर और अंश तय होते हैं।
महादशा
विंशोत्तरी पद्धति में ग्रह का लंबा काल-खंड, जो जन्म के चंद्र नक्षत्र से शुरू होता है।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

इस लेख के हर नियम का मूल स्रोत — ग्रंथ, अध्याय और श्लोक संख्या के साथ।

  1. [1]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    तिथिनक्षत्रलग्नानां गण्डान्तं त्रिविधं स्मृतम्।ह् । जन्मयात्राविवाहादौ भवेत्तन्निधनप्रदम्।ह्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 92 — गण्डान्तजातशान्त्यध्याय · श्लोक 1

    गंडांत तिथि, नक्षत्र और लग्न के भेद से तीन प्रकार का कहा गया है और जन्म, यात्रा तथा विवाह आदि में अशुभ बताया गया है।

    Gandanta is described as of three kinds, relating to tithi, nakshatra and lagna, and is said to be inauspicious at birth, travel, marriage and similar events.

  2. [2]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    रेवतीदास्रयोः साप्रमघयोः शाक्रमूलयोः । सन्धौ नक्षत्रगण्डान्तमेवं नाडीचतुष्टयम्।ह्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 92 — गण्डान्तजातशान्त्यध्याय · श्लोक 3

    नक्षत्र गंडांत रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा और ज्येष्ठा-मूल के संधि-स्थानों पर बताया गया है, जिसका विस्तार चार नाड़ी का है।

    The nakshatra gandanta lies at the junctions of Revati and Ashwini, of Ashlesha and Magha, and of Jyeshtha and Mula, each spanning four nadis.

  3. [3]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    एषु चाभुक्तमूलाख्यं महाविघ्नपदं स्मृतम्।ह् । इन्द्रराक्षसयोः सन्धौ पञ्चाष्टघटिकाः क्रमात्।ह्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 92 — गण्डान्तजातशान्त्यध्याय · श्लोक 5

    इनमें अभुक्त मूल को महान विघ्न का कारण कहा गया है, जो इंद्र और राक्षस नक्षत्रों के संधि में क्रमशः पाँच और आठ घटी का होता है।

    Among these, abhukta-mula is described as the source of great obstacles, lying at the junction of the Indra and Rakshasa nakshatras and spanning five and eight ghatis respectively.

  4. [4]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    ज्येष्ठामूलमयोर्यस्मादधिपाविन्द्रराक्षसौ । महावैरात्।ह् तयोः सन्धिर्महादोषप्रदः स्मृतः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 93 — अभुक्तमूलशान्त्यध्याय · श्लोक 1

    ज्येष्ठा और मूल के अधिपति इंद्र और राक्षस हैं और उनमें महान वैर है, इसलिए उनका संधि-स्थान बड़ा दोष देने वाला कहा गया है।

    Because the presiding deities of Jyeshtha and Mula are Indra and Rakshasa, bitter rivals, the junction between them is said to give a great dosha.

  5. [5]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    अभुक्तमूलजं पुत्रं पुत्रीं वाऽपि परित्यजेत्।ह् । अथवाऽब्दाष्टकं तातस्तन्मुखं न विलोकयेत्।ह्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 93 — अभुक्तमूलशान्त्यध्याय · श्लोक 2

    अभुक्त मूल में जन्मे पुत्र या पुत्री का त्याग, अथवा पिता द्वारा आठ वर्ष तक उसका मुख न देखना बताया गया है।

    A son or daughter born in abhukta-mula is to be abandoned, or else the father should not look at the childs face for eight years.

  6. [6]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    जन्मतो द्वादशाहे वा तदृक्षे वा शुभे दिने । जातस्य वाऽष्टमे वर्षे शान्तिं कुर्याद्।ह् विधानतः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 93 — अभुक्तमूलशान्त्यध्याय · श्लोक 4

    शांति जन्म के बारहवें दिन, उसी नक्षत्र वाले शुभ दिन, या बालक के आठवें वर्ष में विधि-पूर्वक करनी चाहिए।

    The shanti is to be performed in due form on the twelfth day after birth, on a day when the same nakshatra recurs, or in the eighth year of the child.

  7. [7]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    मृत्युप्रशमनार्थं च मन्त्रं त्र्यम्बकं जपेत्।ह् । प्रार्थयेच्च ततो देवमभिषेकार्थमादरात्।ह्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 93 — अभुक्तमूलशान्त्यध्याय · श्लोक 15

    शांति के लिए त्र्यम्बक मंत्र का जप करें और फिर आदरपूर्वक अभिषेक के लिए देवता से प्रार्थना करें।

    For pacification, the Tryambaka mantra is to be recited, followed by respectful prayer to the deity for the abhisheka.

हर सन्दर्भ त्रिकाल वाणी ग्रंथ-पुस्तकालय या प्रतिष्ठित मुक्त स्रोत से मिलाया गया · व्याख्या: Rohiit Gupta, Chief Vedic Architect

Frequently Asked Questions

जन्म मूल नक्षत्र कैसे जानें?

सही जन्म-तिथि, समय और स्थान से कुंडली बनाकर देखें कि जन्म के समय चंद्रमा किस नक्षत्र में था। नक्षत्र कैलकुलेटर से भी यह तुरंत पता चल जाता है।

गंडमूल नक्षत्र कौन-कौन से हैं?

अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती ये छह गंडमूल नक्षत्र माने जाते हैं। ये तीन संधि-जोड़ों में बँटे हैं: रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा और ज्येष्ठा-मूल।

अभुक्त मूल क्या होता है?

ज्येष्ठा और मूल के संधि पर आने वाला समय-खंड अभुक्त मूल कहलाता है। शास्त्र के अनुसार यह ज्येष्ठा के अंतिम पाँच और मूल के आरंभिक आठ घटी का होता है, यानी लगभग दो घंटे और तीन घंटे बारह मिनट।

क्या मूल नक्षत्र में जन्म अशुभ होता है?

नहीं। यह केवल सावधानी की सूचना है। असली फल कुंडली के लग्न, ग्रहों और दशा पर निर्भर करता है। कई गंडमूल जातक जीवन में सफल होते हैं।

मूल नक्षत्र की शांति कब करनी चाहिए?

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार जन्म के बारहवें दिन, उसी नक्षत्र वाले शुभ दिन, या आठवें वर्ष में शांति करनी चाहिए। अधिकतर परिवार लगभग सत्ताईसवें दिन जब वही नक्षत्र लौटता है, तब कराते हैं।

क्या शास्त्र में बच्चे के त्याग की बात है?

हाँ, अभुक्त मूल अध्याय में ऐसा उल्लेख है। यह अपने समय की कठोर प्रथा है। हम इसे आज के लिए निर्देश नहीं मानते। शास्त्र ने साथ में शांति-विधि भी दी है।

मूल नक्षत्र की शांति में कौन सा मंत्र जपा जाता है?

शास्त्र में त्र्यम्बक मंत्र का जप बताया गया है। साथ में अभिषेक, हवन और दान का क्रम है। संख्या और विधि कुलपुरोहित से पूछ लें।

क्या मूल नक्षत्र का असर विवाह पर पड़ता है?

विवाह का निर्णय केवल नक्षत्र से नहीं होना चाहिए। गुण, मंगल की स्थिति, सप्तमेश का बल और दशा सहित पूरी कुंडली देखी जाती है।

मूल नक्षत्र में जन्मे बच्चे की पहली दशा कौन सी होती है?

अश्विनी, मघा और मूल में केतु की तथा आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती में बुध की महादशा जन्म के समय चल रही होती है। शेष अवधि जन्म-अंश से निकलती है।

क्या प्रसव का समय मूल नक्षत्र से बचाकर तय कर सकते हैं?

प्रसव का समय माँ और शिशु के स्वास्थ्य के आधार पर चिकित्सक तय करते हैं। मुहूर्त का विचार केवल उसी सुरक्षित सीमा के भीतर हो सकता है।

यह भी देखें · See also

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समूह: संतान जन्म के लिए नक्षत्र-विशिष्ट गाइड

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