गुरुग्राम · Haryana

गुरुग्राम में जया एकादशी

बुधवार, 17 फ़रवरी 2027· Read in English →

त्रिकाल संदेश — सीधा उत्तर

वर्ष 2027 में जया एकादशी का पावन व्रत स्मार्त परंपरा के अनुसार 17 फरवरी, बुधवार को रखा जाएगा, जबकि वैष्णव मत के अनुयायी इसे 18 फरवरी को मनाएंगे। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना और सात्विक उपवास का मुख्य विधान है। प्रातःकाल स्नान के बाद प्रभु का पूजन करें, दिनभर अन्न का त्याग रखें और अगले दिन पारण करें।

🕐 गुरुग्राम के लिए जया एकादशी का समय

तिथिEkadashi (Shukla Paksha) — 17:32 तक
नक्षत्रArdra, पाद 1 — 23:29 तक
योग · करणPriti · Vishti
अभिजित मुहूर्त12:13-12:57
राहुकाल12:35-13:58
यमगंड · गुलिक08:25-09:48 · 11:12-12:35
सूर्योदय · सूर्यास्त07:02 · 18:09

गुरुग्राम (28.4595, 77.0266) के लिए स्विस एफ़ेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से गणना। पाँचों अंग स्थानीय सूर्योदय पर।

मुफ़्त कुंडली — कोई भुगतान नहीं, कोई साइनअप नहीं →

✅ जया एकादशी पर क्या करें

  1. प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थल को साफ करके भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  3. हाथ में जल लेकर शांत भाव से जया एकादशी व्रत का संकल्प लें।
  4. भगवान विष्णु को जल, चंदन, अक्षत और ताजे पुष्प श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
  5. जया एकादशी की पारंपरिक व्रत कथा का शांत मन से श्रवण या पाठ करें।
  6. घी की बत्ती या कपूर से भगवान विष्णु की भावपूर्ण आरती करें।
  7. दिनभर सात्विक आचरण रखें और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही पारण करें।

समय कम है? → 5-मिनट पूजा विधि

📜 यह तारीख कैसे तय हुई

Ekadashi pervades sunrise kaal on one day only (100% of the window). Suryodaya-vyapini: the tithi prevailing at sunrise governs the day, which is the general rule for vrats where no special kaal applies. Vaishnava: Vaishnava observance is on 18 Feb 2027. Vaishnavas keep the dwadashi-joined day where the two traditions differ. Smarta: Smarta observance is on 17 Feb 2027.

त्रिकाल वाणी द्वारा स्विस एफ़ेमेरिस और शास्त्रीय निर्णय नियमों से गणना — निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, और कैलेंडर रिफ़ॉर्म कमेटी की रिपोर्ट। किसी अन्य पंचांग से नकल नहीं।

🕐 भारत भर में जया एकादशी का समय

शहरसूर्योदयअभिजित मुहूर्तराहुकाल
गुरुग्राम07:0212:13-12:5712:35-13:58
दिल्ली एनसीआर07:0212:12-12:5712:35-13:58
मुंबई07:0912:29-13:1412:52-14:17
नोएडा07:0112:11-12:5612:34-13:57
बेंगलुरु06:4412:09-12:5612:33-14:00
हैदराबाद06:4512:06-12:5212:29-13:55
पुणे07:0512:25-13:1112:48-14:14
कोलकाता06:1111:27-12:1311:50-13:15
चेन्नई06:3411:59-12:4512:22-13:49
अहमदाबाद07:1412:30-13:1612:53-14:18

जया एकादशी क्यों मनाया जाता है

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सनातन परंपरा में जया एकादशी के नाम से जाना जाता है। एकादशी का मूल अर्थ केवल भूखे रहना नहीं है, बल्कि अपनी ग्यारह इंद्रियों—पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां और एक मन—को सांसारिक भागदौड़ से समेटकर अंतर्मुखी करना है। यह तिथि मन की चंचलता को शांत करने और चेतना को शुद्ध करने का एक पवित्र अवसर प्रदान करती है। सनातन धर्म में माघ का महीना आत्म-शुद्धि, संयम और ईश-आराधना के लिए विशेष रूप से वंदनीय माना गया है। शास्त्रों में गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी नियमपूर्वक शुचि भाव से निर्दोष नारायण का ध्यान करने का विधान मिलता है [2]। जया एकादशी इसी आध्यात्मिक साधना का एक प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि इस दिन किया गया उपवास व्यक्ति को उसके भीतर छिपी नकारात्मक प्रवृत्तियों, आलस्य और मानसिक संतापों से मुक्ति दिलाता है। इस व्रत के पीछे की पौराणिक दृष्टि अत्यंत गूढ़ है। यह कथा बताती है कि मनुष्य जब अपने कर्तव्य और मर्यादा से भटककर केवल वासना या प्रमाद में लिप्त हो जाता है, तो उसकी चेतना का पतन हो जाता है। जया एकादशी का व्रत उस गिरी हुई चेतना को पुनः दिव्यता की ओर उठाने का साधन बनता है। जब व्यक्ति श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इस व्रत को करता है, तो उसके भीतर की मलिनता नष्ट होने लगती है और सात्विक वृत्तियों का उदय होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से एकादशी तिथि भगवान विष्णु के स्वरूप और मन की शुद्धि से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। हमारे वैदिक आधार में इस व्रत के लिए कोई पृथक ruling planet निर्धारित नहीं है, बल्कि यह तिथि स्वयं में आध्यात्मिक ऊर्जा का संतुलन स्थापित करने वाली मानी जाती है। जब हम अन्न का त्याग करते हैं, तो शरीर में हल्कापन आता है और मन ध्यान की गहराई में उतरने के लिए सहज तैयार होता है। इस प्रकार जया एकादशी केवल एक पारंपरिक नियम नहीं, बल्कि स्वयं के आत्मिक उत्थान का मार्ग है। परिवार में सुख-शांति, विचारों में संतुलन और जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने के लिए अनेक श्रद्धालु पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस व्रत का पालन करते आ रहे हैं। यह व्रत हमें सिखाता है कि प्रमाद से बाहर निकलकर दिव्यता को अपने जीवन में कैसे प्रतिष्ठित किया जाए।

🪔 जया एकादशी पूजा विधि

  1. शुद्धि एवं स्नान — प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ जल से स्नान करें और मन को शांत रखते हुए धुले वस्त्र धारण करें।
  2. वेदी निर्माण — पूजा के स्थान को गंगाजल या स्वच्छ जल छिड़ककर पवित्र करें और भगवान विष्णु के विग्रह अथवा चित्र को स्थापित करें।
  3. दीप प्रज्वलन — भगवान विष्णु के सम्मुख शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं और अगरबत्ती प्रज्वलित करें।
  4. संकल्प — दाहिने हाथ में जल और पुष्प लेकर भगवान के चरणों में जया एकादशी व्रत और पूजन का विनम्र संकल्प लें।
  5. आचमन — आचमनी से स्वयं पर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कें ताकि बाहरी और आंतरिक दोनों वातावरण शुद्ध बने रहें।
  6. आह्वान एवं ध्यान — हाथ जोड़कर भगवान विष्णु का ध्यान करें और उन्हें अपनी पूजा स्वीकार करने के लिए प्रेमपूर्वक आमंत्रित करें।
  7. जलाभिषेक — तांबे या पीतल के पात्र से प्रभु के चरणों में शुद्ध जल का अर्घ्य दें।
  8. तिलक एवं अक्षत — भगवान को चंदन या रोली का तिलक लगाएं और बिना टूटे साबुत अक्षत श्रद्धा से अर्पित करें।
  9. पुष्प समर्पण — ताजे सुगंधित पुष्प और तुलसी दल प्रभु के श्रीचरणों में आदरपूर्वक चढ़ाएं।
  10. धूप एवं सुगंध — सुगंधित धूप दिखाकर घर के वातावरण को पवित्र बनाएं और मन को एकाग्र करें।
  11. नैवेद्य समर्पण — मौसमी फल, सात्विक मिष्ठान या पंचामृत का भोग लगाएं और प्रभु से उसे स्वीकार करने की विनती करें।
  12. कथा श्रवण — जया एकादशी की पावन पौराणिक कथा का शांत चित्त होकर पाठ करें अथवा आदरपूर्वक श्रवण करें।
  13. आरती एवं क्षमा — कपूर या दीपक से प्रभु की आरती उतारें और पूजा के अंत में ज्ञात-अज्ञात भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

⚡ 5-मिनट विधि

  1. स्नान के उपरांत पूजा स्थान पर भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  2. हाथ में जल लेकर मन ही मन एकादशी के पूजन और उपवास का सरल संकल्प लें।
  3. प्रभु को जल, चंदन, पुष्प और ऋतु फल श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
  4. दो मिनट शांत बैठकर भगवान विष्णु के स्वरूप का ध्यान करें और मन की शांति की प्रार्थना करें।
  5. कपूर से प्रभु की आरती करें और अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगकर शीश नवाएं।

🛒 जया एकादशी पूजा सामग्री

आवश्यक

  • भगवान विष्णु का चित्र अथवा प्रतिमा
  • शुद्ध घी का दीपक
  • दीपक के लिए रुई की बत्ती
  • शुद्ध जल का कलश अथवा लोटा
  • चंदन अथवा रोली
  • ताजे पुष्प
  • धूप अथवा अगरबत्ती
  • ऋतु फल
  • कपूर

वैकल्पिक

  • तुलसी दल
  • पंचामृत
  • गंगाजल
  • पीला वस्त्र
  • मौली अथवा कलावा
  • जनेऊ
  • इत्र
  • पूजा की घंटी

अगर कुछ उपलब्ध न हो

  • यदि गंगाजल न मिले, तो सामान्य स्वच्छ जल का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि पंचामृत उपलब्ध न हो, तो केवल कच्चे दूध या सादे जल का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि चंदन उपलब्ध न हो, तो रोली का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि ताजे फूल न मिलें, तो शुद्ध जल और अक्षत का अर्पण पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि कोई विशेष ऋतु फल न मिले, तो मिश्री या गुड़ का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।
  • यदि पीतल का पात्र न हो, तो मिट्टी के स्वच्छ दीपक का उपयोग पारंपरिक रूप से मान्य है।

🌙 जया एकादशी व्रत विधि

व्रत कब शुरू करें: जया एकादशी के व्रत का आरंभ दशमी तिथि की संध्या से ही हो जाता है। दशमी की रात्रि को सात्विक और सुपाच्य भोजन ग्रहण किया जाता है ताकि अगले दिन शरीर शुद्ध रहे। एकादशी के दिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय स्नान करने के उपरांत हाथ में जल लेकर व्रत का विधिवत संकल्प लिया जाता है और उपवास शुरू होता है।

क्या खा सकते हैं

  • ताजे मौसमी फल
  • दूध और सादा दही
  • छाछ
  • मखाने
  • सिंघाड़े का आटा
  • कुट्टू का आटा
  • साबूदाना
  • सेंधा नमक (यदि फलाहार में नमक लेने का नियम हो)
  • नारियल पानी
  • उबले हुए आलू

क्या नहीं खाना चाहिए

  • गेहूं का आटा
  • चावल
  • दालें (विशेषकर मसूर की दाल)
  • प्याज और लहसुन
  • सफेद साधारण नमक
  • मांसाहार
  • मदिरा या नशीले पदार्थ
  • बासी और गरिष्ठ भोजन

पारण: जया एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के दिन किया जाता है। द्वादशी के सूर्योदय के पश्चात स्नान और नित्य पूजा संपन्न करें। इसके बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, जल या मौसमी फल का दान दें। दान के उपरांत सात्विक फलाहार या सादे भोजन से व्रत खोला जाता है। द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण करना पारंपरिक नियमों के अनुसार आवश्यक माना जाता है।

किन्हें परंपरागत रूप से व्रत नहीं रखना चाहिए: गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, छोटे बच्चे, अत्यधिक वृद्ध लोग और किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति पारंपरिक रूप से कठोर या निर्जला उपवास नहीं करते हैं। ऐसे व्यक्ति केवल मानसिक रूप से सात्विक रहकर, हल्का फलाहार ग्रहण करके भी एकादशी के नियमों का निर्वाह कर सकते हैं।

यदि आप गर्भवती हैं, किसी गंभीर रोग से जूझ रहे हैं, या नियमित दवाओं पर निर्भर हैं, तो किसी भी प्रकार का उपवास शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें। पारंपरिक नियमों को कभी भी चिकित्सीय सलाह के स्थान पर न रखें।

❓ जया एकादशी: क्या करें और क्या न करें

क्या एकादशी के दिन सिर धोकर स्नान किया जा सकता है?

सामान्य रूप से एकादशी के दिन सादे जल से स्नान किया जाता है, परंतु साबुन या शैम्पू लगाकर बाल धोने को लेकर कुछ परंपराओं में परहेज की सलाह दी जाती है। आप सादे जल से स्नान करके पूजा में बैठ सकते हैं।

क्या इस दिन नाखून या बाल काटे जा सकते हैं?

पारंपरिक नियमों के अनुसार एकादशी के पावन दिन नाखून, दाढ़ी या सिर के बाल काटना वर्जित माना जाता है। यह संयम और शुद्धि का दिन है, इसलिए ऐसे कार्य पहले या बाद में करने चाहिए।

क्या एकादशी के उपवास में नमक खा सकते हैं?

यदि आपने पूर्ण निराहार या बिना नमक का संकल्प लिया है तो नमक न लें। हालांकि, यदि स्वास्थ्य कारणों से आवश्यकता हो, तो केवल सेंधा नमक का सीमित उपयोग फलाहार में किया जा सकता है।

क्या इस दिन चावल का सेवन किया जा सकता है?

एकादशी के दिन चावल का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है, यहां तक कि जो लोग व्रत नहीं रखते उन्हें भी इस दिन चावल खाने से बचने की सलाह दी जाती है।

क्या एकादशी के दिन यात्रा की जा सकती है?

यदि कोई आकस्मिक या अत्यंत आवश्यक कार्य न हो, तो लंबी यात्राओं से बचना चाहिए ताकि व्रत के नियमों और पूजा के समय में बाधा न आए। आवश्यक होने पर यात्रा के दौरान भी सात्विक आहार ही लें।

क्या इस पावन तिथि पर नया काम शुरू किया जा सकता है?

एकादशी एक अत्यंत पवित्र तिथि है और इस दिन सात्विक व धर्म से जुड़े कार्य शुरू करना शुभ माना जाता है। व्यापारिक अनुबंधों के लिए दिन के शुभ समय और पंचांग का ध्यान रखना चाहिए।

क्या एकादशी पर बाजार से नई वस्तुएं खरीद सकते हैं?

सामान्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं या धार्मिक सामग्री खरीदी जा सकती है। हालांकि, तामसिक वस्तुएं, चमड़े का सामान या लोहे की भारी चीजें खरीदने से कई लोग परहेज करते हैं।

क्या पूजा संपन्न होने के बाद दिन में सोया जा सकता है?

एकादशी के दिन दोपहर में सोना पारंपरिक रूप से अनुचित माना जाता है क्योंकि इससे प्रमाद बढ़ता है। दिन का समय प्रभु के स्मरण, स्वाध्याय या शांत चिंतन में बिताना श्रेष्ठ है।

क्या इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़े जा सकते हैं?

एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। पूजा के लिए तुलसी दल की आवश्यकता हो, तो उसे दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेना चाहिए।

क्या एकादशी की रात्रि में जागरण या पूजा करनी चाहिए?

हां, पारंपरिक रूप से एकादशी की रात को भजन, कीर्तन या शांत भाव से प्रभु का ध्यान करना अत्यंत फलदायी माना गया है। रात्रि में अधिक समय तक जागकर साधना करने का विशेष महत्व है।

क्या इस दिन परिवार में किसी पर क्रोध या विवाद कर सकते हैं?

एकादशी मन के संयम का पर्व है, इसलिए कटु वचन, क्रोध और पारिवारिक विवादों से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। शांत वाणी और क्षमाशीलता इस दिन की पहली आवश्यकता है।

क्या पूजा के तुरंत बाद सामान्य भोजन खाया जा सकता है?

व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूजा के बाद केवल फलाहार ही लेना चाहिए, अन्न नहीं। जो लोग उपवास नहीं कर रहे हैं, वे भी सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।

क्या इस दिन घर में झाड़ू-पोछा सामान्य रूप से किया जा सकता है?

घर की स्वच्छता आवश्यक है, परंतु झाड़ू इस प्रकार लगानी चाहिए कि किसी सूक्ष्म जीव की हिंसा न हो। प्रातःकाल ही घर को शुद्ध और स्वच्छ कर लेना चाहिए।

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⚠️ आम गलतियाँ

  • दशमी तिथि की रात्रि से खान-पान में संयम न बरतने से एकादशी का व्रत अधूरा माना जाता है।
  • एकादशी के दिन जाने-अनजाने में चावल का सेवन कर लेने से व्रत के नियमों का खंडन होता है।
  • पूजा और उपवास के दौरान मन में क्रोध, कटु वाणी या ईर्ष्या लाने से साधना अधूरी रह जाती है।
  • एकादशी के पावन दिन सीधे तुलसी के पौधे से पत्ते तोड़ने से पूजा का विधान अपूर्ण माना जाता है।
  • दिन के समय आलस्य के वशीभूत होकर गहरी नींद लेने से उपवास का संकल्प दुर्बल होता है।
  • द्वादशी तिथि के शुभ समय का ध्यान रखे बिना असमय व्रत खोल लेने से पारण की विधि पूरी नहीं होती।
  • बिना किसी जरूरतमंद को दान दिए या बिना क्षमा याचना किए सीधे भोजन कर लेने से व्रत अधूरा माना जाता है।

📖 जया एकादशी कथा

जया एकादशी की कथा देवराज इंद्र की सभा और दो गंधर्वों के आचरण से जुड़ी है। एक समय स्वर्गलोक के नंदन वन में अप्सराएं और गंधर्व उत्सव मना रहे थे। उस सभा में माल्यवान नाम का एक रूपवान गंधर्व और पुष्पवती नाम की एक अत्यंत सुंदर अप्सरा गायन और नृत्य प्रस्तुत कर रहे थे। प्रस्तुति के दौरान दोनों एक-दूसरे के सौंदर्य पर मोहित हो गए। परस्पर आकर्षण में बंध जाने के कारण उनका ध्यान अपने कला-प्रदर्शन से भटक गया। उनके सुर और ताल बिगड़ने लगे, जिससे सभा की गरिमा भंग हो गई। देवराज इंद्र ने इसे सभा का घोर अपमान और मर्यादा का उल्लंघन माना। इंद्र ने कुपित होकर दोनों को शाप दिया कि वे स्वर्गलोक से भ्रष्ट होकर मृत्युलोक में जाएं और वहां पिशाच योनि में रहकर अत्यंत कष्ट भोगें। शाप के प्रभाव से माल्यवान और पुष्पवती हिमालय की दुर्गम और बर्फीली घाटियों में पिशाच बनकर भटकने लगे। वहां उन्हें असहनीय शीत, भूख और प्यास की भयंकर पीड़ा सहनी पड़ी। वे न तो ठीक से सो पाते थे और न ही उन्हें शांति मिलती थी। अपनी इस दुर्दशा पर उन्हें अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। संयोगवश माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आई। उस दिन अत्यधिक ठंड और शारीरिक पीड़ा के कारण दोनों ने पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया। वे भूख से व्याकुल रहे और एक सूखे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर केवल भगवान नारायण को याद करते रहे। अत्यधिक शीत के कारण वे रातभर सो भी न सके और अनजाने में ही उनसे पूरे दिन का उपवास और रात्रि जागरण संपन्न हो गया। माघ शुक्ल एकादशी के इस अनजाने उपवास और पश्चाताप से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। प्रभु की कृपा से अगले दिन सूर्योदय होते ही उन दोनों का पिशाच शरीर छूट गया और उन्हें पुनः अपने दिव्य गंधर्व स्वरूप की प्राप्ति हुई। वे दोनों एक सुंदर विमान में बैठकर पुनः स्वर्गलोक पहुंचे। जब इंद्र ने उन्हें देखा तो आश्चर्यचकित होकर पूछा कि उन्हें इस शाप से मुक्ति कैसे मिली। तब माल्यवान ने विनम्रता से बताया कि यह सब भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के पावन व्रत के प्रभाव से संभव हुआ है।

🪔 आरती

जया एकादशी के दिन आरती प्रातःकाल की मुख्य पूजा के अंत में तथा सायंकाल के समय की जाती है। पूजा की थाली में शुद्ध घी का दीपक अथवा कर्पूर प्रज्वलित करें। शांत चित्त होकर प्रभु के सामने खड़े हों और आरती की थाली को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए आदरपूर्वक आरती करें। परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती में सम्मिलित हों। आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से आरती स्वीकार करें और अंत में भगवान से सुख-शांति की प्रार्थना करें।

🔮 आपकी समस्या के अनुसार जया एकादशी के उपाय

धन संबंधी रुकावटें

प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान विष्णु के चित्र के सामने तांबे के लोटे में जल भरकर रखें और पूजा बाद उसे तुलसी में अर्पित करें। कब: एकादशी की सुबह स्नान के उपरांत। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: माघ शुक्ल एकादशी पर श्रीहरि के प्रति समर्पण से जीवन में सात्विक ऊर्जा का संचार होता है।

करियर में अस्थिरता

पक्षियों के लिए स्वच्छ जल और थोड़े दाने घर की छत या खुले स्थान पर रखें। कब: एकादशी की दोपहर से पूर्व। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: एकादशी तिथि पर परोपकार और जीव सेवा से मन के असमंजस दूर होते हैं।

विवाह में बाधा या तनाव

भगवान विष्णु को शुद्ध जल में थोड़ा सा चंदन मिलाकर श्रद्धापूर्वक अर्घ्य दें। कब: एकादशी की सुबह पूजा के समय। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: भगवान नारायण की एकाग्र आराधना से वैवाहिक विचारों में सौम्यता आती है।

संतान की एकाग्रता में कमी

पूजा स्थान पर एक घी का दीपक जलाकर संतान के साथ दो मिनट शांत बैठकर प्रभु का ध्यान करें। कब: एकादशी की संध्या के समय। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: पवित्र तिथि पर परिवार के साथ सात्विक ध्यान करने से घर का वातावरण शांत होता है।

पारिवारिक अशांति

घर के मुख्य द्वार पर दोनों ओर थोड़ा सा जल छिड़कें और मन ही मन शांति की प्रार्थना करें। कब: एकादशी की सुबह पूजा के बाद। खर्च: निःशुल्क। कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: एकादशी के दिन घर की दहलीज को शुद्ध रखने से सकारात्मक विचारों को बल मिलता है।

मानसिक तनाव व नकारात्मकता

शाम के समय तुलसी के पौधे के पास गाय के घी का एक छोटा दीपक प्रज्वलित करें। कब: एकादशी की गोधूलि वेला में। खर्च: ₹10–20. कितने दिन: 1 दिन। आपके लिए क्यों: एकादशी की संध्या को दीपदान करने से मन का अंधकार और भय शांत होता है।

क्या जया एकादशी आपके लिए विशेष है?

एकादशी जैसे पवित्र पर्व हमें आत्म-संयम और भक्ति का सामान्य मार्ग दिखाते हैं। यह परंपरा सभी के लिए एक समान रूप से सात्विक और कल्याणकारी है। परंतु प्रत्येक व्यक्ति का जीवन, उसकी चुनौतियां और उसके कर्म अलग होते हैं। एक ग्रह या तिथि का सामान्य प्रभाव सबके लिए एक जैसा बताया जा सकता है, लेकिन वह ग्रह आपकी अपनी जन्मकुंडली के किस भाव में बैठा है, किस राशि में है और आप पर इस समय कौन सी महादशा चल रही है—यह केवल एक व्यक्तिगत कुंडली विश्लेषण से ही जाना जा सकता है। त्रिकाल वाणी में रोहीत गुप्त सोलह वर्षों के अपने पराशर बीपीएचएस अभ्यास के आधार पर आपकी स्थिति का स्पष्ट और निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं। यहां चार मुख्य विधाओं के माध्यम से व्यक्तिगत मार्गदर्शन दिया जाता है: 1. जन्मकुंडली (Kundli) — आपके करियर, धन, स्वास्थ्य, वर्तमान दशा और सही समय के निर्णय। 2. कुंडली मिलान (Kundali Milan) — वैवाहिक तालमेल, स्वभाव और गृहस्थ सुख की गहराई। 3. हस्तरेखा (Hastrekha) — हाथों की रेखाओं से आपके जीवन के उतार-चढ़ाव और प्रवृत्तियों की समझ। 4. स्वप्न शास्त्र (Swapna Shastra) — आपके सपनों के पीछे छिपे संकेतों और चेतावनियों का विश्लेषण। त्योहार का यह पृष्ठ आपको पारंपरिक विधि बताता है, पर आपके निजी प्रश्नों का समाधान आपकी अपनी जन्मपत्रिका में छिपा होता है।

शब्दावली · Glossary

एकादशी
हिंदू पंचांग के प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि, जो विशेष रूप से भगवान विष्णु की उपासना और उपवास के लिए समर्पित होती है।
पारण
उपवास की समाप्ति के बाद अगले दिन विधिवत भोजन ग्रहण करके व्रत खोलने की शास्त्रीय प्रक्रिया।
सूर्योदय-व्यापिनी
वह तिथि जो प्रातः सूर्योदय के समय उपस्थित होती है और सामान्य व्रतों के निर्धारण का मुख्य आधार बनती है।
स्मार्त
स्मृति ग्रंथों और सामान्य वैदिक परंपराओं का पालन करने वाले गृहस्थ मतावलंबी।
वैष्णव
भगवान विष्णु को अपना इष्ट मानकर वैष्णव संप्रदाय के विशिष्ट संन्यास व तिथि नियमों का पालन करने वाले श्रद्धालु।
द्वादशी
पंचांग के प्रत्येक पक्ष की बारहवीं तिथि, जिस दिन एकादशी व्रत का पारण संपन्न किया जाता है।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

  1. [1]↑ऋग्विधान
    केशवम् मार्गशीर्षे तु पौषे नारायणम् स्मृतम् । माधवम् माघमासे तु गोविन्दम् फाल्गुने तथा ॥
    — ऋग्विधान, अध्याय 3 · श्लोक 27.139

    माघ मास में माधव अर्थात भगवान विष्णु का स्मरण करने का विधान बताया गया है।

    In the month of Magha, the traditional text directs the contemplation of Madhava (Vishnu).

  2. [2]↑ऋग्विधान
    गृहस्थ धर्मे वर्तेत न्याय क्लृप्तः शुचि व्रतः । एतम् देवम् चिन्तयेत नारायणम् अनामयम् ॥
    — ऋग्विधान, अध्याय 3 · श्लोक 36.192

    पवित्र आचरण और नियमों से युक्त होकर निर्दोष नारायण का ध्यान करना चाहिए।

    A person observing pure vows with righteous conduct should contemplate upon the blemishless Narayana.

गुरुग्राम में जया एकादशी — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वर्ष 2027 में जया एकादशी कब है?

वर्ष 2027 में जया एकादशी का व्रत स्मार्त परंपरा के अनुसार 17 फरवरी, बुधवार को रखा जाएगा। वहीं वैष्णव मत को मानने वाले श्रद्धालु द्वादशी युक्त तिथि के आधार पर 18 फरवरी, गुरुवार को उपवास रखेंगे। जो गृहस्थ सामान्य पंचांग का अनुसरण करते हैं, वे 17 फरवरी को ही सूर्योदय-व्यापिनी एकादशी मानकर व्रत रखेंगे।

स्मार्त और वैष्णव परंपरा की तिथियों में अंतर क्यों होता है?

स्मार्त परंपरा उस दिन को प्राथमिकता देती है जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि उपस्थित हो, जिसे सूर्योदय-व्यापिनी कहा जाता है। इसके विपरीत वैष्णव परंपरा एकादशी के साथ द्वादशी के स्पर्श को अधिक महत्व देती है, जिसे विद्धा या संयुक्त नियम कहा जाता है। इसलिए जब दोनों नियमों में गणना का भेद आता है, तो वैष्णव व्रत अगले दिन रखा जाता है।

जया एकादशी की पूजा का सबसे शुभ समय क्या है?

इस दिन पूजा का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल सूर्योदय के तुरंत बाद का माना जाता है जब वातावरण शांत और सात्विक होता है। आप अपनी स्थानीय सूर्योदय की स्थिति के अनुसार सुबह स्नान करके पूजन कर सकते हैं। इसके अलावा दोपहर में अभिजीत समय और शाम को गोधूलि वेला भी प्रभु आराधना के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

अलग-अलग शहरों में एकादशी की पूजा और पारण के समय में अंतर क्यों दिखता है?

प्रत्येक शहर का अक्षांश और देशांतर भिन्न होता है, जिसके कारण वहां सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग-अलग मिनटों पर होता है। वैदिक पंचांग की गणना सूर्य के वास्तविक दर्शन पर आधारित होती है, इसलिए दिल्ली, मुंबई या कोलकाता में समय का थोड़ा अंतर दिखाई देता है। आपको हमेशा अपने शहर के स्थानीय सूर्योदय के अनुसार ही नियमों का पालन करना चाहिए।

जया एकादशी के दिन मुख्य रूप से क्या करना चाहिए?

इस पावन दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। दिनभर अन्न का त्याग रखते हुए प्रभु के नाम का मानसिक स्मरण या स्वाध्याय करना चाहिए। शाम के समय दीपदान करें और अगले दिन शुभ मुहूर्त में पारण करके ही अन्न ग्रहण करें।

इस दिन किन चीजों से पूरी तरह परहेज करना आवश्यक है?

एकादशी के दिन चावल, गेहूं, दाल, प्याज, लहसुन और मांसाहार का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है। इसके साथ ही मन में क्रोध, विवाद, अपशब्द बोलने और दिन में सोने से बचना चाहिए। तुलसी के पत्तों को इस दिन सीधे पौधे से तोड़ना भी पारंपरिक नियमों के विरुद्ध है।

उपवास के दौरान कौन-कौन सी खाद्य वस्तुएं खाई जा सकती हैं?

उपवास के समय ताजे फल, दूध, दही, मखाने, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा और साबूदाना लिया जा सकता है। पेय पदार्थों में आप नारियल पानी, नींबू पानी या छाछ का सेवन कर सकते हैं। यदि नमक लेना आवश्यक हो, तो केवल सेंधा नमक ही सीमित मात्रा में उपयोग करना चाहिए।

क्या एकादशी के फलाहार में साधारण नमक खा सकते हैं?

एकादशी के फलाहार में साधारण समुद्री या सफेद नमक का उपयोग पूरी तरह वर्जित माना गया है। यदि शारीरिक आवश्यकता के कारण नमक लेना पड़े, तो केवल शुद्ध सेंधा नमक का ही प्रयोग किया जाता है। कई श्रद्धालु पूरे दिन बिना नमक के केवल फलों पर ही यह व्रत पूर्ण करते हैं।

जया एकादशी की पूजा के लिए न्यूनतम कौन सी सामग्री अनिवार्य है?

इस पूजा के लिए बहुत अधिक आडंबर की आवश्यकता नहीं होती, केवल भाव की प्रधानता है। अनिवार्य सामग्री में भगवान विष्णु का चित्र, एक शुद्ध घी का दीपक, जल का लोटा, थोड़ा सा चंदन और ताजे फूल पर्याप्त हैं। यदि उपलब्ध हो तो भोग के लिए कोई भी एक मौसमी फल और तुलसी दल साथ में रख सकते हैं।

जया एकादशी की व्रत कथा का श्रवण क्यों आवश्यक माना गया है?

पौराणिक मान्यता के अनुसार किसी भी व्रत की कथा सुनने से उस पर्व का आध्यात्मिक उद्देश्य स्पष्ट होता है। जया एकादशी की कथा यह दर्शाती है कि प्रमाद और वासना से चेतना का पतन कैसे होता है और ईश्वर स्मरण से उद्धार कैसे मिलता है। कथा श्रवण से मन की एकाग्रता बढ़ती है और व्रत का फल पूर्ण माना जाता है।

जया एकादशी का आध्यात्मिक महत्व क्या बताया गया है?

यह एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष में आती है, जो स्वयं में आत्म-शुद्धि का अत्यंत पावन समय माना गया है। मान्यता है कि इस दिन का संयम व्यक्ति को मानसिक संतापों, हीन भावनाओं और आंतरिक विकारों से मुक्त करता है। इसे चेतना को निम्न स्तर से उठाकर उच्च आध्यात्मिक स्तर पर ले जाने का पर्व माना जाता है।

क्या एकादशी के दिन कोई नया काम या व्यापार शुरू किया जा सकता है?

एकादशी अपने आप में एक अत्यंत शुद्ध और शुभ तिथि मानी जाती है, इसलिए धार्मिक या सेवा से जुड़े कार्य शुरू किए जा सकते हैं। हालांकि, यदि कोई बड़ा व्यावसायिक निवेश या भूमि क्रय-विक्रय करना हो, तो दिन के शुभ चौघड़िया या अभिजीत समय की जांच कर लेनी चाहिए। राहु काल जैसे समय में नया कार्य शुरू करने से बचना चाहिए।

क्या इस दिन सोने, वस्त्र या अन्य सामान की खरीदारी की जा सकती है?

पूजा की सामग्री, धार्मिक पुस्तकें, वस्त्र या सामान्य उपयोगी सामान खरीदना पूरी तरह अनुकूल है। हालांकि, लोहे का भारी सामान, चमड़े की वस्तुएं या तामसिक सामग्री इस दिन खरीदने से बचना चाहिए। खरीदारी करते समय यह ध्यान रहे कि आपका मन व्रत और भक्ति से न भटके।

इस दिन भगवान विष्णु की आराधना किस प्रकार करनी चाहिए?

हमारे मूल तथ्यों में इस तिथि के लिए कोई विशेष नया मंत्र दर्ज नहीं है, इसलिए मन में शांत भाव से भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। आप सामान्य रूप से प्रभु के स्वरूप का चिंतन कर सकते हैं या उनकी स्तुतियों का पाठ कर सकते हैं। मौन रहकर प्रभु का स्मरण करना वाणी की शुद्धि के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

एकादशी व्रत के बाद दान में क्या देना श्रेष्ठ माना जाता है?

द्वादशी के दिन पारण से पूर्व किसी जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, शुद्ध जल, मौसमी फल या वस्त्र का दान देना श्रेष्ठ है। यदि भोजन देना संभव न हो, तो थोड़ा सा सीधा (कच्चा अनाज जैसे आटा, दाल, चावल) किसी सुपात्र को दिया जा सकता है। अपनी क्षमता के अनुसार दिया गया छोटा सा दान भी पूर्ण फलदायी माना जाता है।

इस दिन घर की सुख-शांति के लिए क्या कोई सरल उपाय किया जा सकता है?

घर की शांति के लिए शाम के समय तुलसी के पौधे के समीप एक घी का दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत सरल और पारंपरिक उपाय है। इसके अलावा परिवार के सभी लोग मिलकर दो मिनट शांत बैठकर प्रभु का ध्यान करें। यह छोटा सा अभ्यास घर से नकारात्मक ऊर्जा और कलह को दूर करने में सहायक होता है।

जया एकादशी और षट्तिला एकादशी में क्या अंतर है?

षट्तिला एकादशी माघ मास के कृष्ण पक्ष में आती है, जिसमें तिलों के छह प्रकार के उपयोग का विशेष विधान होता है। इसके विपरीत जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष में आती है और यह चेतना के उत्थान व पिशाच भाव से मुक्ति की कथा से जुड़ी है। दोनों एकादशियों के नियम और उनके आध्यात्मिक संदेश भिन्न-भिन्न हैं।

यदि भूलवश व्रत के दौरान कुछ खा लिया जाए तो क्या करना चाहिए?

यदि अनजाने में कोई वर्जित वस्तु या सामान्य अन्न खा लिया जाए, तो घबराने या भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। तुरंत कुल्ला करके मुख शुद्ध करें, भगवान के सामने हाथ जोड़कर अपनी भूल की क्षमा मांगें और शेष दिन व्रत के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करें। पश्चाताप का सच्चा भाव किसी भी गलती के प्रभाव को कम कर देता है।

व्रत का पारण कब और किस प्रकार करना चाहिए?

जया एकादशी का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय के पश्चात किया जाता है। प्रातः स्नान और दैनिक पूजा संपन्न करने के बाद पहले किसी को दान दें और फिर जल या सात्विक फलाहार लेकर व्रत खोलें। ध्यान रहे कि पारण हमेशा द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व ही कर लेना चाहिए।

क्या अस्वस्थ या वृद्ध लोगों के लिए यह उपवास रखना अनिवार्य है?

सनातन परंपरा में स्वास्थ्य को हमेशा सर्वोपरि माना गया है, इसलिए किसी भी अस्वस्थ, वृद्ध या गर्भवती व्यक्ति के लिए कठोर उपवास अनिवार्य नहीं है। ऐसे लोग केवल मानसिक रूप से सात्विक आचरण रखकर और साधारण सुपाच्य फलाहार लेकर भी इस दिन का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप दवाएं ले रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह के बिना कभी उपवास न रखें।

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