योगिनी दशा कैलकुलेटर: 36 वर्ष का चक्र
Trikaal Sandesh — Direct Answer
योगिनी दशा बृहत् पराशर होरा शास्त्र की आठ दशाओं वाली पद्धति है, जिसका पूरा चक्र 36 वर्ष का होता है। इसे निकालने के लिए जन्म नक्षत्र की संख्या में 3 जोड़ें, 8 से भाग दें और शेष से मंगला से संकटा तक पहली योगिनी जानें। मंगला का काल एक वर्ष और संकटा का आठ वर्ष है।
Deep Dive Analysis
योगिनी दशा कैलकुलेटर: संक्षिप्त उत्तर
योगिनी दशा आठ योगिनियों की दशा-पद्धति है, जिनके काल 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 और 8 वर्ष हैं, इसलिए पूरा चक्र 36 वर्ष का बनता है।[8] पहली योगिनी जानने के लिए जन्म नक्षत्र की संख्या में 3 जोड़िए, 8 से भाग दीजिए और शेष को मंगला से आगे गिनिए।[7] पहली दशा का भोग्य इस बात पर टिका है कि जन्म के समय चंद्रमा नक्षत्र में कितना आगे बढ़ चुका था। इस पेज पर नियम, 27 नक्षत्रों की प्रारंभ-तालिका और दो हल किए उदाहरण हैं। गणना छोड़कर सीधे जानना हो तो मुफ्त दशा कैलकुलेटर खोलिए और मुख्य पद्धति के लिए प्रत्यंतर दशा कैसे निकालें पढ़िए।
योगिनी दशा क्या है
योगिनी दशा उन दशा-पद्धतियों में है जिनका नाम शास्त्र में आता है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र दशा के भेद गिनाते समय योगिनी दशा को पैण्डी, अंशी और नैसर्गिक दशा के साथ रखता है।[1] विंशोत्तरी में नौ स्वामी और 120 वर्ष होते हैं,[2] जबकि योगिनी में आठ स्वामी हैं और चक्र केवल 36 वर्ष में पूरा होकर फिर दोहराया जाता है। दोनों का आधार जन्म के समय चंद्रमा का नक्षत्र है, इसलिए जन्म तारीख, समय और स्थान चाहिए। दशा की मूल बात जन्म नक्षत्र कैसे पता करें से और ग्रहों की भूमिका कुंडली के 9 ग्रह से समझें।
बृहत् पराशर होरा शास्त्र में योगिनी दशा का स्रोत
अध्याय 46 में पराशर कहते हैं कि वर्णद दशा पहले कही जा चुकी है और अब शम्भु द्वारा कही गई योगिनी दशा बताई जाती है।[3] शम्भु शिव का नाम है, इसलिए परंपरा इस पद्धति को शिव से जोड़ती है। अगला श्लोक आठों योगिनियों के नाम गिनाता है।[4] इसी कारण इस पेज पर हम श्लोक संख्या दिखाते हैं। जो बात ग्रंथ से है उस पर संदर्भ चिह्न लगता है, और जहाँ ग्रह के आधार पर व्यावहारिक पाठ दिया है वहाँ हम साफ लिखते हैं कि वह व्याख्या है। मुख्य पद्धति के उप-कालों का फॉर्मूला प्रत्यंतर दशा का फॉर्मूला में देखें।
आठ योगिनियाँ और उनके ग्रह
आठ योगिनियाँ हैं: मंगला, पिंगला, धन्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा और संकटा।[4] ग्रंथ हर योगिनी को एक ग्रह से जोड़ता है। मंगला चंद्रमा की है, पिंगला सूर्य की, धन्या गुरु की और भ्रामरी मंगल की।[5] भद्रिका बुध की है, उल्का शनि की, सिद्धा शुक्र की और संकटा राहु की।[6] ध्यान दें कि सूची में केतु नहीं है, इसलिए योगिनी में केतु की दशा कभी नहीं आती। चंद्रमा की भूमिका समझनी हो तो चंद्र और पितृ दोष और छाया ग्रह के लिए राहु और पितृ दोष पढ़ें।
चक्र 36 वर्ष का क्यों है
योगिनियों के वर्ष एक से शुरू होकर एक-एक बढ़ते हैं और आठ पर रुकते हैं।[8] 1 + 2 + 3 + 4 + 5 + 6 + 7 + 8 का योग 36 है। इसलिए यह चक्र विंशोत्तरी के 120 वर्ष से काफ़ी छोटा है।[2] व्यवहार में संकटा के बाद क्रम फिर मंगला से पढ़ा जाता है, इसलिए लंबे जीवन में यही आठ दशाएँ दो या तीन बार आती हैं। चक्र छोटा होने से हर दशा जल्दी बदलती है और मन या ध्यान का रुख़ बार-बार बदलता लग सकता है। ग्रह को देखकर योजना बनाइए, डर को नहीं, और अपनी तारीखें मुफ्त दशा कैलकुलेटर से देखिए।
मंगला योगिनी और चंद्रमा: 1 वर्ष
मंगला का अर्थ शुभ है और वह चंद्रमा से जुड़ी है, काल एक वर्ष।[5] चंद्रमा मन, माता, घर और भावनात्मक लय का कारक है, इसलिए मंगला का वर्ष अक्सर परिवार, नींद, खान-पान और अपनेपन की ओर ध्यान खींचता है। यह सबसे छोटी दशा है, इसलिए छोटे और स्थिर निर्णय लीजिए, जैसे दिनचर्या, घर की मरम्मत या माँ से बातचीत। चंद्रमा बलवान हो तो वर्ष शांत रहता है, कमज़ोर हो तो मन उतार-चढ़ाव वाला लगता है, और तब बड़े फैसलों से ज़्यादा शाम की सरल दिनचर्या काम आती है। मन के विषय पर मानसिक स्वास्थ्य और चंद्र-शनि-राहु पढ़ें।
पिंगला योगिनी और सूर्य: 2 वर्ष
पिंगला पीले-भूरे सुनहरे रंग का नाम है और वह सूर्य से जुड़ी है, काल दो वर्ष।[5] सूर्य अधिकार, पिता, शरीर की ऊर्जा और सार्वजनिक प्रतिष्ठा का कारक है। पिंगला में अक्सर अधिकारियों, बॉस या पिता से मेलजोल बढ़ता है और कार्यक्षेत्र का फल सूर्य की स्थिति पर टिकता है। बलवान सूर्य पहचान देता है, कमज़ोर सूर्य अनदेखा होने का एहसास देता है, और उसका उत्तर बहस नहीं बल्कि नियमित मेहनत और सुबह जल्दी उठना है। बॉस और ट्रांसफर के समय के लिए जॉब ट्रांसफर की दशा देखें।
धन्या योगिनी और गुरु: 3 वर्ष
धन्या का अर्थ भाग्यशाली है और वह गुरु से जुड़ी है, काल तीन वर्ष।[5] गुरु ज्ञान, शिक्षक, संतान, धन और सही सलाह का कारक है। धन्या में कई लोग पढ़ाई, सलाह-कार्य, विवाह या परिवार बढ़ाने की ओर बढ़ते हैं, क्योंकि गुरु जिसे छूता है उसे फैलाता है। सावधानी यह है कि विस्तार सोच-समझकर हो, क्योंकि जल्दबाज़ी में किया बड़ा वादा निभाना कठिन हो जाता है। गुरु मज़बूत हो तो ये तीन वर्ष उदार रहते हैं, कमज़ोर हो तो विनम्रता और बड़ों की सलाह उत्तर है। गुरु और राहु के मेल के लिए गुरु चांडाल योग क्या है पढ़ें।
भ्रामरी योगिनी और मंगल: 4 वर्ष
भ्रामरी भौंरे से बना शब्द है और गति का संकेत देता है, वह मंगल से जुड़ी है, काल चार वर्ष।[5] मंगल ऊर्जा, साहस, भूमि, भाई और संघर्ष का कारक है। भ्रामरी के वर्षों में यात्रा, घर बदलना या आगे बढ़कर कुछ करने का दबाव अक्सर दिखता है, और फल इस पर टिकता है कि मंगल कैसा बैठा है। बलवान मंगल लगन और साफ़ जीत देता है, बेचैन मंगल जल्दबाज़ी देता है, इसलिए कागज़ दो बार जाँचिए और घर में बहस से बचिए। ऊर्जा को कसरत या तय समय-सीमा वाले काम में लगाइए। विस्तार के लिए मंगल महादशा: ऊर्जा और क्रोध पढ़ें।
भद्रिका योगिनी और बुध: 5 वर्ष
भद्रिका भद्र यानी शुभ से बना शब्द है और बुध से जुड़ी है, काल पाँच वर्ष।[6] बुध वाणी, व्यापार, हिसाब, सीखने और मित्रों का कारक है। भद्रिका का दौर विद्यार्थियों, लेखकों, व्यापारियों और संवाद से कमाने वालों के लिए अनुकूल रहता है, क्योंकि बुध साफ़ सोच और तेज़ सीखने को इनाम देता है। सावधानी यह है कि अधिक सोचने और बिखरे ध्यान से बचें, एक मुख्य लक्ष्य चुनकर उसे पूरा करें। बुध कमज़ोर हो तो अनुबंध पर हस्ताक्षर से पहले हर पंक्ति पढ़िए। करियर के लिए दशा का समय करियर के लिए दशा समय में देखें।
उल्का योगिनी और शनि: 6 वर्ष
उल्का का अर्थ टूटता तारा या जलती लकड़ी है और वह शनि से जुड़ी है, काल छह वर्ष।[6] शनि कर्तव्य, समय, अनुशासन, सेवा और देरी का कारक है। उल्का के वर्ष धैर्य और स्थिर मेहनत माँगते हैं, और धीरे-धीरे बनाने वालों को फल देते हैं। शनि कमज़ोर या पीड़ित हो तो दौर भारी लग सकता है, पर वह भारीपन सज़ा नहीं, व्यवस्थित होने का बुलावा है, और साप्ताहिक नियमित दिनचर्या उसे काफ़ी हल्का करती है। छोटा उपाय आगे दिया है। शनि की चाल के लिए साढ़ेसाती कैलकुलेटर और कमज़ोर ग्रह जाँचने के लिए कुंडली में कमज़ोर ग्रह कैसे पता करें देखें।
सिद्धा योगिनी और शुक्र: 7 वर्ष
सिद्धा का अर्थ सिद्ध या पूर्ण है और वह शुक्र से जुड़ी है, काल सात वर्ष।[6] शुक्र प्रेम, विवाह, सुख-सुविधा, कला और धन का कारक है। सिद्धा का दौर अक्सर वह समय होता है जब रिश्ते गहरे होते हैं, घर सजता है या कोई कला आय बन जाती है। सावधानी फ़िज़ूलखर्ची और आराम में बह जाने की है, इसलिए मासिक सीमा तय कीजिए और कोई रचनात्मक आदत ज़िंदा रखिए। बलवान शुक्र सामंजस्य और लाभ देता है, कमज़ोर शुक्र में जीवनसाथी से बोली पर ध्यान रखें। विवाह योग के लिए कुंडली में विवाह योग पढ़ें।
संकटा योगिनी और राहु: 8 वर्ष
संकटा का अर्थ कठिनाई है और वह राहु से जुड़ी है, सबसे लंबा काल आठ वर्ष।[6] नाम कठोर लगता है, पर नाम फैसला नहीं होता। राहु महत्वाकांक्षा, विदेश, तकनीक और अचानक बदलाव का कारक है, इसलिए संकटा में जोखिम, स्थान परिवर्तन और अनूठे अवसर भी आते हैं। रास्ता स्पष्टता से निकलता है, क्योंकि राहु जल्दबाज़ी में भ्रमित करता है और जाँच-परख करने वाले को फल देता है। रिकॉर्ड रखिए, शॉर्टकट से बचिए और बड़े कदम से पहले सलाह लीजिए। पाँच पंक्तियों वाला उपाय आगे है। ग्रह को विस्तार से राहु महादशा कितने साल की होती है और राहु की महादशा के उपाय में पढ़ें।
योगिनी दशा चरण दर चरण कैसे निकालें
बृहत् पराशर होरा शास्त्र नियम एक श्लोक में देता है: जन्म नक्षत्र में तीन जोड़िए, आठ से भाग दीजिए और शेष को एक से आगे मंगला आदि क्रम में गिनिए।[7] पहले अपना चंद्र नक्षत्र और उसकी संख्या जानिए, जहाँ अश्विनी 1 और रेवती 27 है, इसके लिए मुफ्त नक्षत्र कैलकुलेटर काम आएगा। संख्या में 3 जोड़कर 8 से भाग दीजिए। शेष 1 हो तो मंगला, 2 पिंगला, 3 धन्या, 4 भ्रामरी, 5 भद्रिका, 6 उल्का और 7 सिद्धा। शेष शून्य हो तो गिनती आठवें पर रुकती है, यानी संकटा। हर दशा के वर्ष उसी क्रम में 1 से 8 हैं।[8]
सभी 27 नक्षत्रों की योगिनी प्रारंभ-तालिका
नियम हर नक्षत्र पर लगाने से सरल प्रारंभ-तालिका बनती है। आर्द्रा, चित्रा और श्रवण मंगला से शुरू होते हैं। पुनर्वसु, स्वाति और धनिष्ठा पिंगला से। पुष्य, विशाखा और शतभिषा धन्या से। अश्विनी, आश्लेषा, अनुराधा और पूर्वाभाद्रपद भ्रामरी से। भरणी, मघा, ज्येष्ठा और उत्तराभाद्रपद भद्रिका से। कृत्तिका, पूर्वाफाल्गुनी, मूल और रेवती उल्का से। रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा सिद्धा से। मृगशिरा, हस्त और उत्तराषाढ़ा संकटा से शुरू होते हैं। सत्ताईस नक्षत्र समझने के लिए 27 नक्षत्र के नाम, स्वामी और राशि पढ़ें।
हल उदाहरण: वृषभ 15 अंश पर चंद्रमा, रोहिणी
मान लीजिए चंद्रमा निरयन वृषभ के 15 अंश पर है। यह रोहिणी में पड़ता है, जो चौथा नक्षत्र है और जिसे रोहिणी नक्षत्र का स्वभाव और करियर में पढ़ा जा सकता है। 4 में 3 जोड़ने पर 7 आता है। 7 को 8 से भाग देने पर शेष 7 रहता है, इसलिए पहली योगिनी सिद्धा है, यानी शुक्र का सात वर्ष का काल।[7] रोहिणी राशिचक्र में 40 अंश से 53 अंश 20 कला तक है। 45 अंश पर चंद्रमा 5 अंश तय कर चुका है, तो 8 अंश 20 कला बाकी हैं। यह नक्षत्र का 62.5 प्रतिशत है, जिसे हम अगले भाग में भोग्य के लिए लेंगे।
रोहिणी उदाहरण की आयु-अनुसार समयरेखा
सिद्धा का भोग्य 7 वर्ष गुणा 0.625 है, यानी 4.375 वर्ष, लगभग 4 वर्ष 4.5 माह। यानी जातक जीवन सिद्धा में शुरू करता है और लगभग 4.4 वर्ष की आयु पर संकटा में जाता है, जो 8 वर्ष चलकर लगभग 12.4 वर्ष तक रहती है। फिर मंगला 13.4 तक, पिंगला 15.4 तक, धन्या 18.4 तक, भ्रामरी 22.4 तक, भद्रिका 27.4 तक, उल्का 33.4 तक, पूरी सिद्धा 40.4 तक और फिर संकटा 48.4 तक चलती है। इसी रोहिणी चंद्र का विंशोत्तरी हिसाब देखना हो तो प्रत्यंतर दशा कैसे निकालें में नौ स्वामियों के साथ मिलाइए।
हल उदाहरण: मृगशिरा और शून्य शेष
मृगशिरा पाँचवाँ नक्षत्र है। इसमें 3 जोड़ने पर 8 आता है और 8 को 8 से भाग देने पर कुछ नहीं बचता। नियम शेष को एक से गिनता है, इसलिए शून्य शेष का अर्थ है कि पूरी आठ की गिनती पूरी हुई और दशा आठवीं योगिनी संकटा है, आठ वर्ष की।[7] हस्त और उत्तराषाढ़ा भी इसी तरह चलते हैं। इन तीन नक्षत्रों में जन्मे व्यक्ति जीवन की शुरुआत राहु से जुड़ी दशा में करते हैं, और यह सामान्य बात है, चेतावनी नहीं। भोग्य फिर भी चंद्रमा की जगह पर टिकता है, और मृगशिरा के अंत के पास चंद्रमा हो तो पहली दशा बहुत छोटी रह जाती है। ऐसी कुंडली मुफ्त दशा कैलकुलेटर में जाँचें।
पहली दशा का भोग्य कैसे निकालें
ग्रंथ कहता है कि नक्षत्र का बीता हुआ भाग और आगे का भाग देखकर दशा साधी जाए।[8] सरल चरणों में: देखिए चंद्रमा नक्षत्र के कितने अंश पार कर चुका है, उसे 13 अंश 20 कला में से घटाइए, बचे हुए को 13 अंश 20 कला से भाग दीजिए और पहली योगिनी के वर्षों से गुणा कीजिए। परिणाम वर्षों में भोग्य है, और दशमलव भाग को 12 से गुणा करने पर माह मिलते हैं। नक्षत्र की शुरुआत में चंद्रमा हो तो लगभग पूरी दशा बची रहती है, अंत में हो तो लगभग कुछ नहीं। यही विधि विंशोत्तरी की भोग्य गणना में भी काम आती है।
योगिनी दशा विंशोत्तरी से कैसे अलग है
दोनों पद्धतियाँ चंद्र नक्षत्र से शुरू होती हैं, पर समानता यहीं खत्म होती है। विंशोत्तरी में नौ स्वामी और 120 वर्ष हैं, और ग्रंथ उसे मुख्य दशा कहता है।[2] योगिनी में आठ स्वामी और 36 वर्ष हैं, और वर्ष 1 से 8 तक बढ़ते हैं।[8] विंशोत्तरी में केतु है, योगिनी में नहीं।[6] दो घड़ियाँ अलग रफ़्तार से चलती हैं, इसलिए एक ही जन्म की दो समयरेखाएँ बनती हैं, और दोनों में कोई गलती नहीं है। मुख्य समयरेखा विंशोत्तरी को रखिए और योगिनी को दूसरी नज़र की तरह गोचर के साथ पढ़िए। विंशोत्तरी की पूरी विधि विंशोत्तरी और प्रत्यंतर दशा और नक्षत्र की जाँच जन्म नक्षत्र की पहचान में है।
दूसरी दशा-पद्धति कब काम आती है
दूसरी पद्धति तब काम आती है जब मुख्य दशा मिली-जुली तस्वीर दे। यदि लंबी विंशोत्तरी दशा में कोई साफ़ घटना नहीं दिखती पर योगिनी बदल रही है, तो छोटी घड़ी अक्सर उस वर्ष का मिज़ाज समझा देती है। यह तब भी काम आती है जब दो बड़ी घटनाएँ पास-पास हों, क्योंकि योगिनी का परिवर्तन चरण-बदल का संकेत हो सकता है। सावधानी यह कि हर पद्धति तब तक न बदलें जब तक कोई अपनी इच्छा से मेल न खा जाए। मुख्य पद्धति चुनिए, योगिनी से समय की पुष्टि कीजिए और जहाँ दोनों मिलें वहाँ भरोसा बढ़ाइए। संपत्ति का समय मकान खरीदने की दशा और कर्ज़ का समय कर्ज-मुक्ति की दशा में देखें।
बिना डर के योगिनी दशा पढ़ना
हर दशा एक ग्रह का नाम है और हर ग्रह का बलवान और कमज़ोर पक्ष होता है, इसलिए कोई योगिनी अकेली अच्छी या बुरी नहीं होती। सबसे पहले जन्म कुंडली में उस ग्रह की राशि, भाव, बल और दृष्टियाँ देखिए। अच्छी स्थिति वाला ग्रह कठिन नाम वाली दशा में भी अपना श्रेष्ठ फल देता है। कमज़ोर ग्रह को सहारा चाहिए, और सहारा व्यावहारिक होता है, जैसे दिनचर्या, आराम, ईमानदार काम और एक छोटा उपाय। त्रिकाल वाणी का सिद्धांत यही है कि कठिन दशा हमेशा अपनी सीमा और अपने उपाय के साथ पढ़ी जाती है। ग्रह का बल कुंडली में षड्बल और ग्रह बल और भावों की भूमिका कुंडली के 12 भाव में देखें।
उल्का और संकटा: कठिन दौर और राहत
शनि की उल्का और राहु की संकटा वे दो दशाएँ हैं जिनसे लोग सबसे अधिक घबराते हैं, और 36 वर्ष के चक्र में दोनों मिलकर 14 वर्ष की हैं। घबराने की ज़रूरत नहीं। शनि अनुशासन को इनाम देता है और राहु जाँच-परख को, इसलिए दोनों तब नरम पड़ते हैं जब आप तय दिनचर्या रखें, जोखिम वाली योजना के लिए उधार न लें और हर वादे का हिसाब रखें। असर कुंडली पर भी टिकता है, क्योंकि बलवान शनि या अच्छी जगह बैठा राहु इन्हीं दशाओं में वास्तविक लाभ देता है। यदि शनि की साढ़ेसाती भी चल रही हो तो साढ़ेसाती कैलकुलेटर भी देखें और दोनों घड़ियाँ साथ रखें।
उल्का (शनि) काल के लिए सरल उपाय
पाँच पंक्तियों वाला उपाय। क्या करें: घर के शांत कोने में सरसों के तेल का एक दीया जलाइए और पाँच मिनट मौन बैठिए। कब: शनिवार की शाम सूर्यास्त के बाद। कितने का: तेल और बाती पर लगभग 10 से 20 रुपये। कितने दिन: 11 शनिवार, फिर रुक जाइए। आपके लिए क्यों: शनि स्थिर आदत माँगता है और साप्ताहिक छोटा कर्म वही आदत बनाता है जो इस दशा को चाहिए, ख़ासकर तब जब आपकी कुंडली में शनि कमज़ोर हो। सावधानी: दीया पर्दों और बच्चों से दूर रखें और इसे पूरा करने के लिए उधार या भूखे रहना न करें। और विकल्प मुफ्त उपाय कैलकुलेटर में हैं।
संकटा (राहु) काल के लिए सरल उपाय
फिर पाँच पंक्तियों में। क्या करें: साल के अपने तीन सबसे बड़े लक्ष्य लिखिए और हर लक्ष्य से पहले जाँचने योग्य एक तथ्य लिखिए। कब: शनिवार की सुबह, हर हफ़्ते एक ही समय। कितने का: कुछ नहीं, बस एक कॉपी। कितने दिन: 8 शनिवार, फिर कॉपी की समीक्षा। आपके लिए क्यों: राहु जल्दबाज़ी से भ्रमित करता है, और तथ्यों की साप्ताहिक जाँच आपके अपने मामलों में उस असर को काटती है। कैसे: हर पंक्ति ज़ोर से पढ़िए और जो जाँच न सके उसे काट दीजिए। सावधानी: बड़ी खरीद या हस्ताक्षर दूसरी राय के बिना एक ही दिन में न करें। राहु पर और पढ़ने के लिए राहु महादशा में शनि अंतर्दशा देखें।
जन्म समय और चंद्रमा: मिनट क्यों मायने रखते हैं
चंद्रमा एक दिन में लगभग 13 अंश चलता है, जो एक नक्षत्र की 13 अंश 20 कला के क़रीब है। इसलिए गलत जन्म तारीख़ नक्षत्र बदल सकती है, और कुछ घंटों की चूक तब मायने रखती है जब चंद्रमा किसी सीमा के पास हो। एक घंटे की चूक चंद्रमा को लगभग आधा अंश खिसकाती है, जिससे पहली दशा का भोग्य छोटी योगिनी में कुछ हफ़्ते और संकटा जैसी लंबी योगिनी में कुछ महीने बदलता है। समय अनिश्चित हो तो नज़दीकी सीमा नोट करके दोनों ओर जाँचिए। समय की शुद्धता के लिए जन्म समय की शुद्धता और लग्न के लिए मेरा लग्न क्या है पढ़ें।
योगिनी दशा निकालते समय आम गलतियाँ
सबसे आम गलती 3 जोड़ना भूलकर सीधे नक्षत्र संख्या को भाग देना है। दूसरी गलती शेष को शून्य से गिनना है, जिससे पूरी सूची एक खिसक जाती है। तीसरी गलती निरयन की जगह सायन चंद्रमा लेना है, जो नक्षत्र को एक या दो नक्षत्र तक खिसका सकता है, क्योंकि दोनों राशिचक्रों में अब लगभग 24 अंश का अंतर है। चौथी गलती शून्य शेष को योगिनी न मानना है, जबकि वह संकटा है। पाँचवीं गलती पहली दशा के पूरे वर्ष लेना और भोग्य भूल जाना है। गणना दो बार कीजिए और चंद्रमा को मुफ्त जन्म कुंडली कैलकुलेटर में मिलाइए।
ऑनलाइन योगिनी दशा कैलकुलेटर कितना सटीक है
ऑनलाइन कैलकुलेटर उतना ही अच्छा है जितनी उसकी चंद्र स्थिति और उसका नियम। अच्छा टूल चंद्रमा के लिए स्विस एफेमेरिस, निरयन के लिए लाहिरी अयनांश और श्लोक वाला नियम लेता है: 3 जोड़ें, 8 से भाग दें, भोग्य लगाएँ। किसी भी टूल से तीन सवाल पूछिए। क्या वह चंद्र नक्षत्र और उसके अंश दिखाता है। क्या वह भोग्य वर्ष-माह में देता है। क्या वह हर दशा की शुरू और अंतिम तारीख़ बताता है। इन तीन सवालों से त्रिकाल वाणी का दशा कैलकुलेटर या कोई भी और टूल परखिए, और हिसाब इस पेज से हाथ से जाँचिए। लग्न का बल लग्न बल कैसे पता करें में देखें।
करियर, विवाह और धन के समय के लिए योगिनी दशा
चल रही दशा के ग्रह को प्रश्न से जोड़िए। करियर के लिए सूर्य, शनि और बुध की दशाएँ देखिए और उन्हें दशम भाव के साथ पढ़िए। विवाह के लिए शुक्र और गुरु की दशाएँ देखिए, सप्तम भाव के साथ पढ़िए और मिलान के लिए कुंडली मिलान कीजिए। धन के लिए गुरु, शुक्र और बुध की दशाएँ दूसरे और ग्यारहवें भाव के साथ देखिए। परीक्षा के लिए परीक्षा सफलता का सबसे अच्छा वर्ष और दशा बताता है कि दशा और गोचर कैसे जोड़ें, और नौकरी की रुकावट के लिए नौकरी में रुकावट के उपाय पढ़ें।
मुफ्त कैलकुलेटर या मानवीय रीडिंग
कैलकुलेटर तारीख़ें तेज़ी से देता है और मानवीय रीडिंग संदर्भ देती है। कैलकुलेटर यह नहीं बता सकता कि शनि आपका योगकारक है या कमज़ोर ग्रह, और वह गोचर, दृष्टि और आपकी अपनी स्थिति नहीं तौल सकता। त्रिकाल वाणी में रीडिंग रोहित गुप्ता (Rohiit Gupta), चीफ़ वैदिक आर्किटेक्ट, लिखते हैं, जिनके पास पराशरी पद्धति का 16 वर्ष से अधिक का अभ्यास है और जो स्विस एफेमेरिस से गणना करते हैं। पहले मुफ्त टूल से शुरू कीजिए, फिर धन या करियर का प्रश्न हो तो कार्मिक पृष्ठभूमि रीडिंग या धन रीडिंग में गहराई से देखिए।
योगिनी दशा पर आगे पढ़ें
आगे बढ़ने के लिए प्रत्यंतर दशा कैसे निकालें से शुरू कीजिए, जो इस विषय का स्तंभ पेज है, फिर राहु महादशा कितने साल की होती है पढ़िए। नक्षत्र को अकेले समझना हो तो पुष्य नक्षत्र और अनुराधा नक्षत्र उदाहरण के रूप में देखें। अपनी तारीख़ें निकालने के लिए मुफ्त दशा कैलकुलेटर और मुफ्त नक्षत्र कैलकुलेटर खोलिए।
Apna Personalized Analysis Lein
Yeh article general framework hai. Aapke specific chart ke according detailed analysis ke liye:
शब्दावली · Glossary
- योगिनी दशा
- आठ दशाओं वाली पद्धति जिसमें हर दशा एक ग्रह से जुड़ी है और काल 1 से 8 वर्ष है, कुल चक्र 36 वर्ष का।
- नक्षत्र
- राशिचक्र के 27 तारा-विभागों में से एक, हर एक 13 अंश 20 कला का, जिससे दशा का स्वामी निकलता है।
- दशा भोग्य
- जन्म के समय पहली दशा का बचा हुआ भाग, जो नक्षत्र में चंद्रमा की स्थिति से निकलता है।
- संकटा
- आठवीं योगिनी, राहु से जुड़ी, जिसका काल आठ वर्ष है। शब्द का अर्थ कठिनाई है।
- विंशोत्तरी दशा
- नौ स्वामियों और 120 वर्ष वाली दशा-पद्धति जो पराशरी ज्योतिष में मुख्य समयरेखा मानी जाती है।
- अयनांश
- सायन और निरयन राशिचक्र के बीच का कोणीय अंतर, जो चंद्र नक्षत्र निकालने से पहले लगाया जाता है।
ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources
इस लेख के हर नियम का मूल स्रोत — ग्रंथ, अध्याय और श्लोक संख्या के साथ।
पञ्चस्वरदशा विप्र विज्ञेया योगिनीदशा । दशा पैण्डी तथांशी च नैसर्गिकदशा तथा
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 10योगिनी दशा को पैण्डी, अंशी और नैसर्गिक आदि दशाओं के साथ दशा-भेदों में गिना गया है।
The yogini dasha is named among the dasha systems, together with the Paindi, Amshi and natural dashas.
विंशोत्तरशतं पूर्णमायुः पूर्वमुदाहृतम्।ह् । कलै विंशोत्तरी तस्माद्।ह् दशा मुख्या द्विजोत्तम
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 14पूर्ण आयु 120 वर्ष पहले बताई गई है, इसलिए विंशोत्तरी दशा मुख्य दशा है।
The full life of 120 years was stated earlier, and therefore the Vimshottari dasha is the principal dasha.
पूर्वमेव मया प्रोक्ता वर्णदाख्या दशा द्विज । इदानीं शम्भुना प्रोक्ता कथ्यते योगिनी दशा
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 195वर्णद दशा पहले कही जा चुकी है, अब शम्भु द्वारा कही गई योगिनी दशा बताई जाती है।
The Varnada dasha was told earlier, and now the yogini dasha, spoken by Shambhu, is explained.
मङ्गला पिङ्गला धन्या भ्रामरी भद्रिका तथा । उल्का सिद्धा संकटा च योगिन्योऽष्टौ प्रकीर्तिताः
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 196आठ योगिनियाँ हैं: मंगला, पिंगला, धन्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा और संकटा।
The eight yoginis are Mangala, Pingala, Dhanya, Bhramari, Bhadrika, Ulka, Siddha and Sankata.
मङ्गलातोऽभवच्चन्द्रः पिङ्गलातो दिवाकरः । धन्यातो देवपूज्योऽभूद्।ह् भ्रामरीतोऽभवत्।ह् कुजः
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 197मंगला से चन्द्र, पिंगला से सूर्य, धन्या से गुरु और भ्रामरी से मंगल हुए।
The Moon comes from Mangala, the Sun from Pingala, Jupiter from Dhanya and Mars from Bhramari.
भर्दिकातो बुधो जातस्तथोल्कातः शनैश्चरः । सिद्धातो भार्गवि जातः संकटातस्तमोऽभवद्।ह्
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 198भद्रिका से बुध, उल्का से शनि, सिद्धा से शुक्र और संकटा से राहु हुए।
Mercury comes from Bhadrika, Saturn from Ulka, Venus from Siddha and Rahu from Sankata.
जन्मर्क्ष च त्रिभिर्युक्तं वसुभिर्भागमाहरेत्।ह् । एकादिशेषे विज्ञेया योगिन्योः मङ्गलादिकाः
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 199जन्म नक्षत्र में तीन जोड़कर आठ से भाग दें, शेष एक से मंगला आदि योगिनी जानें।
Add three to the birth nakshatra, divide by eight, and read the remainder from one as Mangala and the rest in order.
एकाद्येकोत्तरा ज्ञेयाः क्रमादासां दशासमाः । नक्षत्रयातभोगाभ्यां भुक्तं भोग्यं च साधयेत्।ह्
— बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 200योगिनियों के वर्ष एक से एक-एक बढ़ते हैं, और नक्षत्र के बीते तथा शेष भाग से भोग्य निकाला जाता है।
The years rise from one by one each, and the elapsed and remaining parts of the nakshatra give the balance.
हर सन्दर्भ त्रिकाल वाणी ग्रंथ-पुस्तकालय या प्रतिष्ठित मुक्त स्रोत से मिलाया गया · व्याख्या: Rohiit Gupta, Chief Vedic Architect
Frequently Asked Questions
योगिनी दशा क्या है?
योगिनी दशा बृहत् पराशर होरा शास्त्र की दशा-पद्धति है जिसमें मंगला, पिंगला, धन्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा और संकटा नाम की आठ दशाएँ हैं। हर दशा एक ग्रह से जुड़ी है और पूरा चक्र 36 वर्ष का है।
योगिनी दशा का चक्र कितने साल का होता है?
चक्र 36 वर्ष का है। आठ दशाओं के काल 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 और 8 वर्ष हैं और इनका योग 36 आता है। संकटा के बाद क्रम फिर मंगला से पढ़ा जाता है।
योगिनी दशा कैसे निकालें?
अपने चंद्र नक्षत्र की संख्या 1 से 27 में जानें, उसमें 3 जोड़ें और 8 से भाग दें। शेष 1 हो तो मंगला, 2 पिंगला, 3 धन्या, 4 भ्रामरी, 5 भद्रिका, 6 उल्का और 7 सिद्धा। शेष शून्य हो तो संकटा से शुरुआत होती है। फिर नक्षत्र के बचे भाग से पहली दशा का भोग्य निकालें।
कौन सी योगिनी किस ग्रह की है?
मंगला चंद्रमा की, पिंगला सूर्य की, धन्या गुरु की, भ्रामरी मंगल की, भद्रिका बुध की, उल्का शनि की, सिद्धा शुक्र की और संकटा राहु की है। इस पद्धति में केतु नहीं है।
क्या बृहत् पराशर होरा शास्त्र में योगिनी दशा है?
हाँ। अध्याय 46 योगिनी दशा को दशा-भेदों में गिनता है, आठ योगिनियों और उनके ग्रहों के नाम देता है और नक्षत्र में 3 जोड़ने का नियम तथा 1 से 8 वर्ष बताता है। श्लोक संख्या इस पेज के ग्रंथ सन्दर्भ बॉक्स में दी है।
किन नक्षत्रों में संकटा दशा से शुरुआत होती है?
मृगशिरा, हस्त और उत्तराषाढ़ा में संकटा से शुरुआत होती है। इन तीनों में नक्षत्र संख्या में 3 जोड़ने पर संख्या 8 से पूरी बँट जाती है और शेष शून्य रहता है, इसलिए आठवीं योगिनी आती है।
क्या संकटा योगिनी की दशा खतरनाक है?
नहीं। संकटा राहु से जुड़ी है और 8 वर्ष चलती है, पर फल आपकी कुंडली में राहु की स्थिति पर टिकता है। राहु जाँच-परख को इनाम देता है, इसलिए रिकॉर्ड रखिए, बड़े कदम से पहले सलाह लीजिए और साप्ताहिक सरल दिनचर्या रखिए। कई लोगों को इसी दौर में विदेश, तकनीक या नए अवसर मिलते हैं।
योगिनी दशा बेहतर है या विंशोत्तरी दशा?
विंशोत्तरी मुख्य पद्धति है, जिसमें नौ स्वामी और 120 वर्ष हैं। योगिनी आठ स्वामी और 36 वर्ष वाली दूसरी नज़र है। पहले विंशोत्तरी देखिए और योगिनी से समय की पुष्टि कीजिए जहाँ दोनों मिलें।
क्या योगिनी दशा के लिए सटीक जन्म समय चाहिए?
इसके लिए चंद्रमा की स्थिति चाहिए और चंद्रमा एक दिन में लगभग 13 अंश चलता है। थोड़ी चूक अक्सर पहली दशा का भोग्य ही बदलती है, पर नक्षत्र की सीमा के पास का चंद्रमा पहली योगिनी बदल सकता है, इसलिए जन्म समय जितना सटीक हो उतना बताइए।
क्या योगिनी दशा मुफ्त निकाल सकते हैं?
हाँ। त्रिकाल वाणी के मुफ्त दशा कैलकुलेटर से चंद्र नक्षत्र और दशा की तारीख़ें देखिए, फिर इस पेज के नियम से हिसाब जाँचिए: 3 जोड़ें, 8 से भाग दें, भोग्य लगाएँ।
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