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नक्षत्र लिस्ट: 27 नक्षत्र, स्वामी, राशि

Rohiit Gupta· Chief Vedic Architect15 min read

Trikaal Sandesh — Direct Answer

वैदिक ज्योतिष में 27 नक्षत्र हैं, हर एक निरयन राशिचक्र का 13°20′ का हिस्सा है। अश्विनी से रेवती तक की इस नक्षत्र लिस्ट में विंशोत्तरी के नौ स्वामी केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध तीन बार दोहराए जाते हैं। अभिजित अठाईसवां है, जो केवल मुहूर्त में गिना जाता है।

Deep Dive Analysis

नक्षत्र लिस्ट एक नज़र में: 27 नक्षत्र और उनके स्वामी

नक्षत्र लिस्ट खोजने वाला पाठक अक्सर तीन चीज़ें चाहता है: पूरे 27 नाम क्रम से, हर नाम के आगे उसका स्वामी ग्रह, और यह कि वह नक्षत्र किस राशि में पड़ता है। इस पेज में तीनों एक ही जगह मिलेंगे, और साथ में देवता तथा प्रतीक भी, ताकि नाम केवल एक शब्द न रहकर पहचान बन जाए। आपका जन्म नक्षत्र वही है जिसमें जन्म के क्षण चंद्रमा स्थित था, इसलिए सबसे पहले मुफ़्त नक्षत्र कैलकुलेटर से अपना नक्षत्र निकाल लें और फिर इस सूची में उसे ढूँढें। कैलकुलेटर कैसे काम करता है, यह जन्म नक्षत्र कैसे पता करें गाइड में समझाया गया है। नक्षत्र की पूरी पृष्ठभूमि के लिए नक्षत्र गाइड भी साथ रखें।

27 नक्षत्र के नाम क्रम से

क्रम हमेशा मेष के आरंभ से गिना जाता है। पहले नौ हैं अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य और आश्लेषा। अगले नौ हैं मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा। अंतिम नौ हैं मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती। इन्हें नौ-नौ के तीन समूह में याद रखना आसान है, क्योंकि यही तीन समूह आगे स्वामी ग्रहों के चक्र में भी दिखेंगे। हर समूह के बाद गिनती फिर केतु से शुरू होती है, और इसी नियम से अश्विनी, मघा और मूल एक ही स्वामी के नक्षत्र बन जाते हैं।

नक्षत्र और राशि: 13°20′ बनाम 30° का हिसाब

राशि 30° की होती है और नक्षत्र 13°20′ का। 360° को 27 से भाग दें तो यही माप आता है। इसलिए 12 राशियों में कुल सवा दो नक्षत्र आते हैं, यानी हर राशि में नौ चरण। कोई नक्षत्र अपनी राशि में पूरा बैठ सकता है, जैसे रोहिणी पूरी तरह वृष में है, और कोई दो राशियों में बँट सकता है, जैसे कृत्तिका जिसका पहला चरण मेष में और बाकी तीन वृष में हैं। जो पाठक नक्षत्र और राशि में उलझते हैं, उनके लिए सीधा नियम यह है कि चंद्रमा की राशि आपकी चंद्र राशि बताती है और उसी चंद्रमा का नक्षत्र आपका जन्म नक्षत्र। राशि अलग से देखनी हो तो राशि कैलकुलेटर काम आता है।

नक्षत्र के स्वामी: विंशोत्तरी क्रम और 120 वर्ष

नक्षत्र के स्वामी का मतलब यहाँ विंशोत्तरी दशा का स्वामी ग्रह है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र बताता है कि कृत्तिका से आरंभ करके दशाधिपति तीन बार दोहराए जाते हैं।[4] क्रम है सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र। चूँकि सूची अश्विनी से चलती है, इसलिए अश्विनी का स्वामी केतु निकलता है, फिर भरणी शुक्र, कृत्तिका सूर्य और इसी तरह आगे। दशा वर्ष हैं केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19 और बुध 17, जिनका जोड़ 120 होता है। उसी अध्याय में पूर्ण आयु का आधार 120 वर्ष बताया गया है और इसी कारण विंशोत्तरी को मुख्य दशा कहा गया है।[5] दशा की पूरी चाल दशा कैलकुलेटर और महादशा समझें पेज पर देखी जा सकती है।

नक्षत्र के देवता: बृहत् संहिता और मुहूर्त चिंतामणि की सूची

स्वामी ग्रह दशा तय करता है, जबकि देवता नक्षत्र का स्वभाव और उपासना की दिशा बताते हैं। बृहत् संहिता में नक्षत्र देवताओं की सूची दी गई है जो अश्विनी कुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चंद्र, रुद्र, अदिति, बृहस्पति, सर्प और पितरों से शुरू होकर मित्र तक पहुँचती है।[1] अगले श्लोक में इंद्र, निरृति, जल, विश्वेदेव, ब्रह्मा, विष्णु, वसु, वरुण, अजएकपाद, अहिर्बुध्न्य और पूषा आते हैं।[2] मुहूर्त चिंतामणि में भी देवताओं का यही क्रम अश्विनी से रेवती तक मिलता है।[3] इस पेज के आगे हर नक्षत्र के खंड में आप यही देवता उसके नाम के साथ पढ़ेंगे। देवता का नाम पढ़कर डरने या कुछ भी मान लेने की ज़रूरत नहीं है, यह केवल पहचान और भावना का संकेत है।

1. अश्विनी नक्षत्र: स्वामी केतु, मेष 0° से 13°20′

अश्विनी पहला नक्षत्र है और पूरा निरयन मेष में पड़ता है, 0°00′ से 13°20′ तक। इसका स्वामी केतु है, देवता अश्विनी कुमार हैं और प्रतीक घोड़े का सिर है। चारों चरण मेष में हैं, इसलिए इस नक्षत्र में चंद्रमा वाले व्यक्ति की चंद्र राशि हमेशा मेष ही रहती है। जन्म अगर इसी नक्षत्र में हुआ तो पहली दशा केतु की चलती है, जिसके कुल सात वर्ष हैं और जिसका शेष भाग जन्म के क्षण पर निर्भर करता है। गिनती का आरंभ बिंदु होने के कारण अश्विनी को नई शुरुआत का नक्षत्र कहा जाता है। चंद्र राशि पक्की करने के लिए राशि कैलकुलेटर भी देखें।

2. भरणी नक्षत्र: स्वामी शुक्र, मेष 13°20′ से 26°40′

भरणी दूसरा नक्षत्र है और यह भी पूरी तरह मेष राशि में है, 13°20′ से 26°40′ तक। इसका स्वामी शुक्र है और देवता यम हैं। प्रतीक योनि है, जो धारण और सृजन की भावना को दर्शाती है। शुक्र की दशा बीस वर्ष की सबसे लंबी दशाओं में गिनी जाती है, इसलिए भरणी में जन्मे व्यक्ति के जीवन का आरंभिक लंबा हिस्सा शुक्र के विषयों, यानी संबंध, कला और सुख साधनों से रंगा रह सकता है। मंगल की राशि में शुक्र का नक्षत्र होना इसे दिलचस्प बनाता है, और यह जोड़ कुंडली के अन्य योगों के साथ ही पढ़ना ठीक रहता है। दशाओं के सामान्य अर्थ के लिए महादशा समझें पढ़ना उपयोगी रहेगा।

3. कृत्तिका नक्षत्र: स्वामी सूर्य, मेष 26°40′ से वृष 10°

कृत्तिका तीसरा नक्षत्र है और दो राशियों में बँटा है। इसका पहला चरण मेष में और शेष तीन चरण वृष में आते हैं, यानी 26°40′ मेष से 10°00′ वृष तक। स्वामी सूर्य है, देवता अग्नि हैं और प्रतीक छुरी या ज्वाला माना जाता है। विंशोत्तरी की गिनती में दशा क्रम का आधार इसी नक्षत्र से लिया जाता है, जैसा ऊपर पराशर के पाठ में देखा गया। इसलिए कृत्तिका में चंद्रमा हो तो सूर्य दशा छह वर्ष की होती है। चरण के हिसाब से चंद्र राशि मेष या वृष हो सकती है, इसलिए यहाँ चरण जानना सचमुच काम का है। जन्म कुंडली में इसका स्थान जन्म कुंडली कैलकुलेटर पर साफ़ दिखता है।

4. रोहिणी नक्षत्र: स्वामी चंद्र, वृष 10° से 23°20′

रोहिणी चौथा नक्षत्र है और पूरा वृष राशि में स्थित है, 10°00′ से 23°20′ तक। स्वामी चंद्रमा है, देवता ब्रह्मा हैं और प्रतीक गाड़ी या शकट है। यहाँ चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृष में होता है, इसलिए इस नक्षत्र को चंद्रमा का प्रिय घर कहा जाता है। चंद्र दशा दस वर्ष की है। स्वभाव, करियर और विवाह पर विस्तृत पन्ना अलग से लिखा गया है, उसे आप रोहिणी नक्षत्र का अर्थ और स्वभाव में पढ़ सकते हैं। नवजात शिशु के संदर्भ में रोहिणी नक्षत्र में संतान जन्म देखें।

5. मृगशिरा नक्षत्र: स्वामी मंगल, वृष 23°20′ से मिथुन 6°40′

मृगशिरा पाँचवां नक्षत्र है और वृष तथा मिथुन के बीच फैला है। पहले दो चरण वृष में और अंतिम दो मिथुन में आते हैं, इसलिए सीमा 23°20′ वृष से 6°40′ मिथुन तक है। स्वामी मंगल है, देवता सोम यानी चंद्र हैं और प्रतीक हिरण का सिर है। मंगल की दशा सात वर्ष की होती है। देवता चंद्र और स्वामी मंगल का यह मेल इस नक्षत्र में खोज और बेचैनी दोनों का भाव देता है, जिसे हिरण की सजग चाल के प्रतीक से समझा जाता है। चंद्र राशि दो में से एक आएगी, इसलिए चरण से ही अंतिम निर्णय होता है।

6. आर्द्रा नक्षत्र: स्वामी राहु, मिथुन 6°40′ से 20°

आर्द्रा छठा नक्षत्र है और पूरा मिथुन राशि में है, 6°40′ से 20°00′ तक। इसका स्वामी राहु है, देवता रुद्र हैं और प्रतीक आँसू की बूँद या हीरा माना जाता है। राहु की दशा अठारह वर्ष की है, जो शुक्र और शनि के बाद तीसरी सबसे लंबी है। इसलिए आर्द्रा में जन्मे बच्चे की शुरुआती दशा लंबी चल सकती है और उसमें पढ़ाई, तकनीक या बाहर के विषय उभर सकते हैं। रुद्र को गरजते बादल और शुद्धि के रूप में देखा जाता है, इसलिए नाम सुनकर घबराने की जगह इसका परिवर्तनकारी अर्थ समझना बेहतर है।

7. पुनर्वसु नक्षत्र: स्वामी गुरु, मिथुन 20° से कर्क 3°20′

पुनर्वसु सातवां नक्षत्र है। इसके तीन चरण मिथुन में और अंतिम चरण कर्क में पड़ता है, यानी 20°00′ मिथुन से 3°20′ कर्क तक। स्वामी गुरु है, देवता अदिति हैं और प्रतीक तरकश है। गुरु की दशा सोलह वर्ष चलती है। पुनर्वसु का शाब्दिक अर्थ है बार-बार वसु, यानी लौटकर फिर पाना, इसलिए इसे दोबारा उठ खड़े होने का नक्षत्र कहा जाता है। मिथुन से कर्क में जाने के कारण चौथा चरण कर्क चंद्र राशि देता है, जबकि बाकी तीन चरणों में चंद्र राशि मिथुन रहती है।

8. पुष्य नक्षत्र: स्वामी शनि, कर्क 3°20′ से 16°40′

पुष्य आठवां नक्षत्र है और पूरा कर्क में है, 3°20′ से 16°40′ तक। स्वामी शनि है, देवता बृहस्पति हैं और प्रतीक गाय का थन या कमल माना जाता है। शनि की दशा उन्नीस वर्ष की है। स्वामी शनि और देवता गुरु का यह मेल इसे अनुशासन तथा पोषण का नक्षत्र बनाता है, और कर्क में चंद्र की स्वराशि इसमें और कोमलता जोड़ती है। पूरा विवेचन पुष्य नक्षत्र का अर्थ, स्वभाव, करियर पेज पर है, जबकि यहाँ केवल पहचान की जानकारी दी जा रही है।

9. आश्लेषा नक्षत्र: स्वामी बुध, कर्क 16°40′ से 30°

आश्लेषा नौवां नक्षत्र है और कर्क राशि का अंतिम हिस्सा है, 16°40′ से 30°00′ तक। इसका स्वामी बुध है, देवता सर्प यानी नाग हैं और प्रतीक कुंडली मारा हुआ सर्प है। बुध की दशा सत्रह वर्ष की होती है। यह पहले समूह का अंतिम नक्षत्र है, इसलिए इसके बाद सिंह राशि और मघा के साथ पूरा चक्र नए सिरे से केतु पर लौटता है। आश्लेषा को लेकर फैली डरावनी बातों पर पेज के अंत में एक अलग खंड है, जहाँ तथ्य और भ्रम अलग-अलग रखे गए हैं।

10. मघा नक्षत्र: स्वामी केतु, सिंह 0° से 13°20′

मघा दसवां नक्षत्र है और पूरी तरह सिंह राशि में है, 0°00′ से 13°20′ तक। स्वामी केतु है, देवता पितर हैं और प्रतीक राजसिंहासन है। अश्विनी के बाद यह दूसरा केतु नक्षत्र है, इसलिए यहाँ भी जन्म की पहली दशा केतु की सात वर्ष वाली होती है और उसका शेष भाग चंद्रमा की सटीक डिग्री से निकलता है। पितर देवता होने से इस नक्षत्र को वंश, परंपरा और पूर्वजों के प्रति सम्मान से जोड़ा जाता है। सिंह राशि का स्वामी सूर्य है, इसलिए नेतृत्व का भाव भी यहाँ स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। गंडमूल की बारीकियाँ अलग से पढ़नी हों तो मूल नक्षत्र गाइड खोलें।

11. पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र: स्वामी शुक्र, सिंह 13°20′ से 26°40′

पूर्वा फाल्गुनी ग्यारहवां नक्षत्र है और पूरा सिंह राशि में है, 13°20′ से 26°40′ तक। इसका स्वामी शुक्र है, देवता भग हैं और प्रतीक झूले या पलंग के अगले पाए माना जाता है। भग को सौभाग्य और भोग का देवता कहा जाता है। शुक्र की बीस वर्ष की दशा यहाँ भी लागू होती है, जैसे भरणी और पूर्वाषाढ़ा में। नाम में पूर्वा का अर्थ है पहला, यानी फाल्गुनी की जोड़ी का आगे वाला हिस्सा, और उसके ठीक बाद उत्तरा फाल्गुनी आती है जो उसी प्रतीक का पिछला भाग है।

12. उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र: स्वामी सूर्य, सिंह 26°40′ से कन्या 10°

उत्तरा फाल्गुनी बारहवां नक्षत्र है। इसका पहला चरण सिंह में और बाकी तीन कन्या में आते हैं, इसलिए सीमा 26°40′ सिंह से 10°00′ कन्या तक है। स्वामी सूर्य है, देवता अर्यमा हैं और प्रतीक पलंग के पिछले पाए हैं। अर्यमा मैत्री, अतिथि सत्कार और विवाह संबंधों के देवता माने जाते हैं। यह उन नक्षत्रों में है जिन्हें स्थिर कार्यों के लिए चुना जाता है, जिसका संदर्भ आगे मुहूर्त वाले खंड में दिया गया है। सूर्य की दशा केवल छह वर्ष की है, इसलिए यहाँ जन्म पर आरंभिक दशा छोटी भी निकल सकती है।

13. हस्त नक्षत्र: स्वामी चंद्र, कन्या 10° से 23°20′

हस्त तेरहवां नक्षत्र है और पूरी तरह कन्या राशि में है, 10°00′ से 23°20′ तक। स्वामी चंद्रमा है, देवता सविता यानी सूर्य का प्रेरक रूप हैं और प्रतीक खुला हाथ है। चंद्र का नक्षत्र होने से इसकी दशा दस वर्ष की रहती है, ठीक रोहिणी और श्रवण की तरह। कन्या का स्वामी बुध है, इसलिए यहाँ कौशल, हाथ की कारीगरी और व्यवस्थित काम की चर्चा होती है। हस्त का नाम ही बताता है कि इसका प्रतीक हाथ है, इसलिए पहचान के लिहाज़ से यह सबसे सरल नक्षत्रों में से एक है।

14. चित्रा नक्षत्र: स्वामी मंगल, कन्या 23°20′ से तुला 6°40′

चित्रा चौदहवां नक्षत्र है और कन्या तथा तुला में आधा-आधा बँटा है। पहले दो चरण कन्या में और अंतिम दो तुला में हैं, यानी सीमा 23°20′ कन्या से 6°40′ तुला तक। स्वामी मंगल है, देवता त्वष्टा हैं जिन्हें शिल्प का देवता माना जाता है, और प्रतीक चमकता रत्न या मोती है। मंगल की सात वर्ष की दशा यहाँ चलती है। सुंदर रचना और डिज़ाइन से इसका नाता पुराना है, क्योंकि त्वष्टा का काम ही निर्माण है। चंद्र राशि चरण के हिसाब से कन्या या तुला निकलेगी।

15. स्वाति नक्षत्र: स्वामी राहु, तुला 6°40′ से 20°

स्वाति पंद्रहवां नक्षत्र है और पूरा तुला में है, 6°40′ से 20°00′ तक। इसका स्वामी राहु है, देवता वायु हैं और प्रतीक हवा में लहराता कोमल पौधा है। राहु की अठारह वर्ष की दशा यहाँ भी लागू होती है, जैसा आर्द्रा में देखा गया। वायु देवता होने से स्वतंत्रता और गतिशीलता का भाव जुड़ता है, और तुला का स्वामी शुक्र संतुलन तथा व्यापार की दिशा देता है। चारों चरण तुला में हैं, इसलिए स्वाति में चंद्रमा रखने वाले हर व्यक्ति की चंद्र राशि तुला ही होती है।

16. विशाखा नक्षत्र: स्वामी गुरु, तुला 20° से वृश्चिक 3°20′

विशाखा सोलहवां नक्षत्र है। तीन चरण तुला में और अंतिम चरण वृश्चिक में आता है, यानी 20°00′ तुला से 3°20′ वृश्चिक तक। स्वामी गुरु है, देवता इंद्राग्नि हैं, यानी इंद्र और अग्नि की संयुक्त शक्ति, और प्रतीक तोरण या कुम्हार का चाक माना जाता है। गुरु की दशा सोलह वर्ष की है, ठीक पुनर्वसु की तरह। बृहत् संहिता की सूची में इंद्र और अग्नि का संयुक्त नाम इसी स्थान पर आता है। लक्ष्य के प्रति एकाग्रता इस नक्षत्र की पहचान के रूप में बताई जाती है।

17. अनुराधा नक्षत्र: स्वामी शनि, वृश्चिक 3°20′ से 16°40′

अनुराधा सत्रहवां नक्षत्र है और पूरी तरह वृश्चिक राशि में है, 3°20′ से 16°40′ तक। स्वामी शनि है, देवता मित्र हैं और प्रतीक कमल है। शनि की उन्नीस वर्ष की दशा यहाँ भी आती है, जैसा पुष्य में देखा। मित्र देवता होने से सहयोग और निष्ठा का भाव जुड़ता है। वृश्चिक का स्वामी मंगल है, जबकि नक्षत्र स्वामी शनि, यानी दोनों में अनुशासन और गहराई का मेल बनता है। विस्तृत पढ़ाई के लिए अनुराधा नक्षत्र का अर्थ, स्वभाव, करियर पेज उपलब्ध है।

18. ज्येष्ठा नक्षत्र: स्वामी बुध, वृश्चिक 16°40′ से 30°

ज्येष्ठा अठारहवां नक्षत्र है और वृश्चिक राशि का अंतिम हिस्सा है, 16°40′ से 30°00′ तक। स्वामी बुध है, देवता इंद्र हैं और प्रतीक कुंडल या छतरी है। बुध की सत्रह वर्ष की दशा आश्लेषा की तरह यहाँ भी रहती है। यह दूसरे समूह का अंतिम नक्षत्र है और इसके तुरंत बाद धनु में मूल आता है। ज्येष्ठा तथा मूल की सीमा पर राशि भी बदलती है और स्वामी भी, इसलिए इसे पारंपरिक रूप से गंडमूल की सीमा रेखा माना जाता है, जिसकी बात जन्म मूल नक्षत्र कैसे जानें में विस्तार से हुई है।

19. मूल नक्षत्र: स्वामी केतु, धनु 0° से 13°20′

मूल उन्नीसवां नक्षत्र है और पूरा धनु राशि में है, 0°00′ से 13°20′ तक। स्वामी केतु है, देवता निरृति हैं और प्रतीक जड़ों का गुच्छा है। केतु का यह तीसरा और अंतिम नक्षत्र है, इसलिए यहाँ भी जन्म की पहली दशा सात वर्ष के केतु की होती है। नाम का अर्थ ही जड़ है, इसलिए इसे किसी चीज़ की तह तक जाने वाला नक्षत्र कहा जाता है। मूल में जन्म होने पर परंपरा में शांति पाठ की चर्चा होती है, पर उसे बिना घबराहट के समझाने वाली पूरी जानकारी हमारे अलग गाइड में है और उसे मूल नक्षत्र गाइड पर पढ़ना बेहतर है।

20. पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र: स्वामी शुक्र, धनु 13°20′ से 26°40′

पूर्वाषाढ़ा बीसवां नक्षत्र है और पूरी तरह धनु में है, 13°20′ से 26°40′ तक। इसका स्वामी शुक्र है, देवता अपः यानी जल हैं और प्रतीक सूप या हाथी दाँत माना जाता है। शुक्र की बीस वर्ष की दशा तीसरी बार यहाँ दिखती है। जल देवता होने से इसमें सतत धारा और अजेय भाव की बात होती है, जबकि धनु का स्वामी गुरु इसके साथ ज्ञान और विस्तार की दिशा जोड़ता है। अगला नक्षत्र उत्तराषाढ़ा इसी प्रतीक का दूसरा आधा हिस्सा है, इसलिए दोनों को साथ पढ़ना सुविधाजनक रहता है।

21. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र: स्वामी सूर्य, धनु 26°40′ से मकर 10°

उत्तराषाढ़ा इक्कीसवां नक्षत्र है। पहला चरण धनु में और शेष तीन चरण मकर में आते हैं, यानी 26°40′ धनु से 10°00′ मकर तक। स्वामी सूर्य है, देवता विश्वेदेव हैं और प्रतीक हाथी दाँत या पलंग का पाया है। सूर्य की छह वर्ष की दशा यहाँ तीसरी बार आती है। मुहूर्त चिंतामणि जिन नक्षत्रों को ध्रुव यानी स्थिर कहती है, उनमें तीनों उत्तरा नक्षत्र आते हैं और यह उनमें से एक है।[6] इसके चौथे चरण से शुरू होने वाला छोटा अंश अभिजित से जुड़ता है, जिसकी चर्चा आगे अलग खंड में है।

22. श्रवण नक्षत्र: स्वामी चंद्र, मकर 10° से 23°20′

श्रवण बाईसवां नक्षत्र है और पूरा मकर राशि में है, 10°00′ से 23°20′ तक। स्वामी चंद्रमा है, देवता विष्णु हैं और प्रतीक कान या तीन पदचिह्न माना जाता है। चंद्र की दस वर्ष की दशा यहाँ तीसरी बार आती है। नाम का मतलब है सुनना, इसलिए सीखने और ध्यान से सुनने से इसकी पहचान जुड़ी है। मकर का स्वामी शनि है, इसलिए चंद्र जैसे कोमल नक्षत्र पर अनुशासन की छाप रहती है। बृहत् संहिता की सूची में ब्रह्मा के बाद हरि का नाम इसी स्थान पर आता है।

23. धनिष्ठा नक्षत्र: स्वामी मंगल, मकर 23°20′ से कुंभ 6°40′

धनिष्ठा तेईसवां नक्षत्र है और मकर तथा कुंभ में बराबर बँटा है। पहले दो चरण मकर में और अंतिम दो कुंभ में हैं, यानी 23°20′ मकर से 6°40′ कुंभ तक। स्वामी मंगल है, देवता आठ वसु हैं और प्रतीक ढोल या मृदंग है। मंगल की सात वर्ष की दशा यहाँ तीसरी बार दोहराई जाती है। वसु धन और समृद्धि के देवगण माने जाते हैं, इसलिए धनिष्ठा का नाम धन से जुड़ा है। यहाँ भी चरण देखकर ही यह निश्चित होता है कि चंद्र राशि मकर रहेगी या कुंभ।

24. शतभिषा नक्षत्र: स्वामी राहु, कुंभ 6°40′ से 20°

शतभिषा चौबीसवां नक्षत्र है और पूरा कुंभ राशि में है, 6°40′ से 20°00′ तक। स्वामी राहु है, देवता वरुण हैं और प्रतीक सौ तारों का घेरा या खाली वृत्त माना जाता है। राहु की अठारह वर्ष की दशा यहाँ तीसरी और अंतिम बार आती है। वरुण जल और विधान के देवता हैं, इसलिए इस नक्षत्र में औषधि, गोपनीयता और शोध की भावना बताई जाती है। कुंभ का स्वामी शनि है, इसलिए गंभीर अध्ययन से इसका स्वाभाविक संबंध समझा जाता है। चारों चरण कुंभ में हैं और चंद्र राशि कुंभ ही निकलती है।

25. पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र: स्वामी गुरु, कुंभ 20° से मीन 3°20′

पूर्वा भाद्रपद पच्चीसवां नक्षत्र है। इसके तीन चरण कुंभ में और अंतिम चरण मीन में पड़ता है, यानी 20°00′ कुंभ से 3°20′ मीन तक। स्वामी गुरु है, देवता अज एकपाद हैं और प्रतीक तलवार या पलंग के अगले पाए हैं। गुरु की सोलह वर्ष की दशा यहाँ तीसरी बार आती है। बृहत् संहिता की सूची में अजपाद का नाम इस नक्षत्र के स्थान पर दर्ज है। उत्तरा भाद्रपद इसी जोड़ी का दूसरा सदस्य है, और दोनों को साथ पढ़ने से फाल्गुनी तथा आषाढ़ा वाली जोड़ियों का पैटर्न पूरा समझ में आता है।

26. उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र: स्वामी शनि, मीन 3°20′ से 16°40′

उत्तरा भाद्रपद छब्बीसवां नक्षत्र है और पूरा मीन राशि में है, 3°20′ से 16°40′ तक। स्वामी शनि है, देवता अहिर्बुध्न्य हैं और प्रतीक पलंग के पिछले पाए या जुड़वां आकृति है। शनि की उन्नीस वर्ष की दशा यहाँ तीसरी बार आती है। मीन का स्वामी गुरु है और नक्षत्र स्वामी शनि, इसलिए ज्ञान और धैर्य का मेल यहाँ बनता है। इस नक्षत्र का पूरा विश्लेषण उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र का अर्थ और स्वभाव में पढ़ा जा सकता है।

27. रेवती नक्षत्र: स्वामी बुध, मीन 16°40′ से 30°

रेवती सत्ताईसवां और अंतिम नक्षत्र है तथा मीन राशि का अंत है, 16°40′ से 30°00′ तक। इसका स्वामी बुध है, देवता पूषा हैं जो मार्ग और पशुओं के रक्षक माने जाते हैं, और प्रतीक मछली या ढोलक है। बुध की सत्रह वर्ष की दशा यहाँ तीसरी बार आती है। रेवती के बाद गिनती फिर अश्विनी पर लौटती है और राशिचक्र का वृत्त पूरा होता है। इसी वजह से आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती तीनों राशि के अंत पर बैठे हैं और बुध के नक्षत्र हैं, जबकि अश्विनी, मघा और मूल तीनों राशि के आरंभ पर केतु के नक्षत्र हैं। अपनी आगे की दशाएँ देखनी हों तो दशा कैलकुलेटर चलाएँ।

अभिजित: 28वां नक्षत्र जो केवल मुहूर्त में गिना जाता है

अभिजित मुख्य 27 की सूची में नहीं आता। इसकी गिनती उत्तराषाढ़ा के अंतिम चरण की शुरुआत से श्रवण के आरंभिक अंश तक, लगभग 276°40′ से 280°53′20″ यानी मकर के आरंभ में की जाती है। इसका देवता ब्रह्मा माना जाता है। बृहत् संहिता की 28 नामों वाली सूची में विश्वेदेव और हरि के बीच ब्रह्मा का नाम आता है, और यही स्थान अभिजित का है।[2] चूँकि इसकी अपनी विंशोत्तरी दशा नहीं होती, इसलिए जन्म नक्षत्र या दशा गणना में अभिजित का उपयोग नहीं होता। इसका प्रयोग केवल शुभ कार्य के मुहूर्त में किया जाता है, जिसकी सहायता शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर लेती है।

अपना नक्षत्र और चरण कैसे पढ़ें

अपना नक्षत्र पढ़ने के तीन कदम हैं। पहला, जन्म के सही समय और स्थान से निरयन चंद्र की डिग्री निकालें। दूसरा, उस डिग्री को ऊपर की सूची की सीमाओं से मिलाएँ, जैसे 15° वृष का मतलब रोहिणी। तीसरा, नक्षत्र के भीतर 3°20′ के चार हिस्से करके चरण निकालें। चरण का सीधा लाभ यह है कि वह नवांश और नाम का पहला अक्षर तय करता है। सही जन्म समय न होने पर चंद्र की डिग्री आगे-पीछे हो सकती है, इसलिए समय की अशुद्धि होने पर पहले जन्म कुंडली कैलकुलेटर चलाकर देखें। चरण-दर-चरण कुंडली पढ़ने का तरीका कुंडली कैसे देखें में है।

दशा शेष किस नक्षत्र से तय होता है

जन्म के समय कौन सी दशा चल रही थी और कितनी बाकी है, यह केवल जन्म नक्षत्र तथा उसके भीतर चंद्र की स्थिति से निकलता है। मान लीजिए चंद्रमा रोहिणी में उसके मध्य बिंदु पर है। तब रोहिणी का आधा भाग बीत चुका है और चंद्र की दस वर्ष की दशा में लगभग पाँच वर्ष शेष रहेंगे। यह उदाहरण है, किसी वास्तविक कुंडली का परिणाम नहीं। यही सिद्धांत हर नक्षत्र पर लागू होता है, बस स्वामी बदलता है और दशा वर्ष बदलते हैं। ऊपर की सूची में अपना स्वामी देखकर तय कर लें कि शुरुआती दशा कौन सी थी, और आगे की क्रमिक दशाएँ मुफ़्त दशा कैलकुलेटर पर देखें।

विवाह मिलान में नक्षत्र: तारा बल का उपयोग

नक्षत्र का एक सीधा व्यावहारिक उपयोग विवाह मिलान में आता है। जन्म नक्षत्र से गिनती करने पर नौ तारा बनते हैं: जन्म, संपत, विपत, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र और परम मित्र। मिलान में एक व्यक्ति के नक्षत्र से दूसरे का नक्षत्र कौन सी तारा में पड़ता है, यह देखा जाता है। किसी तारा का नाम कठोर सुनाई दे तो भी निर्णय केवल उसी पर नहीं होता, क्योंकि पूरे 36 गुण, भकूट और ग्रह स्थिति साथ में तौली जाती हैं। इस पूरे हिसाब की चर्चा 36 गुण मिलान को समझें और कुंडली मिलान गाइड में की गई है, जबकि सीधे मिलान के लिए कुंडली मिलान पेज है।

नाम का अक्षर और नक्षत्र का संबंध

हर नक्षत्र के चार चरणों के लिए चार अक्षर या ध्वनियाँ तय हैं, इसलिए नक्षत्र जानने के बाद नवजात के नाम का पहला अक्षर चुनना आसान हो जाता है। जैसे अश्विनी का पहला चरण अलग ध्वनि देता है और दूसरा अलग। यह सूची बहुत लंबी है और एक भी अक्षर की चूक नामकरण को बिगाड़ सकती है, इसलिए अक्षर तालिका हमने अलग पेज पर विस्तार से रखी है। नक्षत्र अनुसार नाम अक्षर पर पूरी तालिका मिलेगी और नाम अक्षर कैलकुलेटर सीधे आपके नक्षत्र से अक्षर बता देता है।

मुहूर्त में नक्षत्र का उपयोग: स्थिर कार्यों के लिए ध्रुव नक्षत्र

मुहूर्त में नक्षत्र का काम कार्य के प्रकार से मेल बिठाना है। मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार तीनों उत्तरा और रोहिणी ध्रुव यानी स्थिर नक्षत्र हैं, और इनमें बीज बोने, गृह निर्माण, शांति कर्म और बगीचा लगाने जैसे स्थिर कार्य सिद्ध होते हैं।[6] दूसरी ओर, चल या तीक्ष्ण स्वभाव वाले कार्य अन्य श्रेणियों में बाँटे जाते हैं। यह वर्गीकरण केवल नक्षत्र का हिस्सा है, पूरे मुहूर्त में तिथि, वार, योग और लग्न भी देखे जाते हैं। इसलिए केवल नक्षत्र पर निर्णय टाल देना या पक्का कर देना दोनों ही अधूरा होता है। व्यावहारिक रूप से मार्गदर्शन शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर गाइड देता है।

आम भ्रम बनाम तथ्य: नक्षत्र के बारे में

पहला भ्रम है कि कुछ नक्षत्र जन्म से ही अशुभ होते हैं। तथ्य यह है कि हर नक्षत्र की दशा, स्वामी की स्थिति और अन्य योगों के अनुसार फल अलग मिलता है, और जहाँ परंपरा शांति बताती है वहाँ सरल उपाय भी बताती है। दूसरा भ्रम है कि नक्षत्र और राशि एक ही हैं। तथ्य यह है कि नक्षत्र 13°20′ का है और राशि 30° की। तीसरा भ्रम है कि दो लोगों का एक नक्षत्र होने पर एक जैसा जीवन होगा। जबकि चरण, लग्न और ग्रह स्थिति बदलते ही कुंडली अलग हो जाती है। चौथा भ्रम है कि अभिजित भी जन्म नक्षत्र हो सकता है, जो ऊपर के खंड में स्पष्ट किया जा चुका है।

अपना नक्षत्र मुफ़्त जानें

सूची पढ़ लेने के बाद अगला काम अपना नक्षत्र पक्का करना है। जन्म तारीख, समय और स्थान डालते ही मुफ़्त नक्षत्र कैलकुलेटर आपका जन्म नक्षत्र, चरण, स्वामी ग्रह और चंद्र राशि बताता है। चंद्र की गणना स्विस एफेमेरिस की सटीकता पर आधारित है। अगर पूरी कुंडली भी देखनी हो तो जन्म कुंडली कैलकुलेटर और लग्न कैलकुलेटर साथ चलाएँ। गाइड चंद्र महादशा में चंद्र की दशा का असर समझाया गया है, और विस्तृत सेवाओं के लिए प्राइसिंग पेज देखें।

निष्कर्ष: नक्षत्र लिस्ट को कैसे उपयोग में लाएँ

यह नक्षत्र लिस्ट आपको नाम, स्वामी, देवता, प्रतीक और राशि सीमा एक साथ देती है, ताकि कुंडली पढ़ते समय बार-बार खोजना न पड़े। याद रखने का आसान तरीका है नौ-नौ का समूह और केतु से बुध तक का स्वामी चक्र। अपना नक्षत्र और चरण निकालिए, फिर उसके स्वामी से शुरुआती दशा, तारा से मिलान और ध्रुव श्रेणी से मुहूर्त की दिशा समझिए। विषय को गहराई से पढ़ने के लिए नक्षत्र गाइड और ग्रह परिचय उपयोगी हैं। कुंडली का रहस्य जानने के लिए कुंडली कैसे काम करती है भी पढ़ सकते हैं, और स्वप्न संकेतों की जिज्ञासा हो तो स्वप्न फल पर जाएँ।

Apna Personalized Analysis Lein

Yeh article general framework hai. Aapke specific chart ke according detailed analysis ke liye:

शब्दावली · Glossary

नक्षत्र
निरयन राशिचक्र के 27 बराबर 13°20′ वाले हिस्सों में से एक, जिसमें चंद्रमा किसी भी क्षण स्थित होता है।
चरण
नक्षत्र का चौथाई भाग, यानी 3°20′, जिससे नवांश और नाम का अक्षर तय होता है।
विंशोत्तरी दशा
120 वर्ष की ग्रह दशा पद्धति, जिसमें जन्म नक्षत्र का स्वामी पहली दशा का स्वामी बनता है।
अभिजित
उत्तराषाढ़ा और श्रवण के बीच का छोटा अंश, जिसे अठाईसवां नक्षत्र मानकर केवल मुहूर्त में गिना जाता है।
तारा बल
जन्म नक्षत्र से गिने गए नौ तारा में से कौन सी तारा बन रही है, इसका मिलान और मुहूर्त में उपयोग।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

इस लेख के हर नियम का मूल स्रोत — ग्रंथ, अध्याय और श्लोक संख्या के साथ।

  1. [1]↑बृहत् संहिताबृहत्संहिता · Varahamihira
    अश्वियमदहनकमलजशशिशूलभृददितिजीवफणिपितरः। योन्यर्यमदिनकृत्त्वष्टृपवनशक्राग्निमित्राश् च॥
    — बृहत् संहिता, अध्याय 97 — नक्षत्र देवता अध्याय · श्लोक 4

    नक्षत्रों के अधिपति देवताओं की सूची अश्विनी कुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चंद्र, रुद्र, अदिति, जीव, सर्प और पितरों से शुरू होकर आगे बढ़ती है।

    Lists the presiding deities of the nakshatras in order, beginning with the Ashvins, Yama, Agni, Brahma, Moon, Rudra, Aditi, Jiva, Phani and the Pitaras.

  2. [2]↑बृहत् संहिताबृहत्संहिता · Varahamihira
    शक्रो निरृतिस् तोयं विश्वे ब्रह्मा हरिर् वसुर् वरुणः। अजपादो अहिर्बुध्न्यः पूषा चेतीश्वरा भानाम्॥
    — बृहत् संहिता, अध्याय 97 — नक्षत्र देवता अध्याय · श्लोक 5

    सूची आगे इंद्र, निरृति, जल, विश्वेदेव, ब्रह्मा, हरि, वसु, वरुण, अजपाद, अहिर्बुध्न्य और पूषा के नामों से पूरी होती है।

    Continues the list of nakshatra deities with Indra, Nirriti, Toya, Vishve, Brahma, Hari, Vasu, Varuna, Ajapada, Ahirbudhnya and Pusha.

  3. [3]↑मुहूर्त चिंतामणिमुहूर्तचिन्तामणि · Rama Daivajna
    नासत्यान्तकमवह्निधातृशशभृद्रुद्रादितीज्योरगा ऋक्षेशाः पितरो भगोऽर्यमरवित्वष्ट्राशुगाश्च क्रमात् । शक्राग्नी खलु मित्रशक्रनिर्ऋतिश्रोतोयपेशास्तथा गोविन्दो वसुतोयपाजचरणाहुर्बुध्यपूषाभिधाः ॥ १ ॥
    — मुहूर्त चिंतामणि, अध्याय 2 — नक्षत्र प्रकरण · श्लोक 1

    अश्विनी से आगे क्रम से नक्षत्र देवताओं के नाम दिए गए हैं, नासत्य और अंतक से लेकर पूषा तक।

    Gives the deities of the nakshatras in order from Ashvini onward, from Nasatya and Antaka to Pusha.

  4. [4]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    कृत्तिकातः समारभ्य त्रिरावृत्य दशाधिपाः । आचंकुरागुशबुकेशुपूर्वा विहगाः क्रमात्।ह्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 — विंशोत्तरी दशा अध्याय · श्लोक 12

    दशाधिपति कृत्तिका से आरंभ होकर तीन बार दोहराए जाते हैं।

    States that the dasha lords start from Krittika and are repeated three times.

  5. [5]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    विंशोत्तरशतं पूर्णमायुः पूर्वमुदाहृतम्।ह् । कलै विंशोत्तरी तस्माद्।ह् दशा मुख्या द्विजोत्तम
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 — विंशोत्तरी दशा अध्याय · श्लोक 14

    पूर्ण आयु 120 वर्ष कही गई है और इसी कारण विंशोत्तरी को मुख्य दशा बताया गया है।

    Mentions the full life span as 120 years and therefore the Vimshottari dasha as the principal dasha.

  6. [6]↑मुहूर्त चिंतामणिमुहूर्तचिन्तामणि · Rama Daivajna
    उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रुवं स्थिरम् । तत्र स्थिरं बीजगेहशांत्यारामादि सिद्धये ॥ २ ॥
    — मुहूर्त चिंतामणि, अध्याय 2 — नक्षत्र प्रकरण · श्लोक 2

    तीनों उत्तरा नक्षत्र और रोहिणी ध्रुव यानी स्थिर हैं, जिनमें बीज, गृह, शांति और उद्यान जैसे स्थिर कार्य सिद्ध होते हैं।

    Names the three Uttara nakshatras and Rohini as dhruva, steady, suited to seeds, houses, shanti and gardens.

हर सन्दर्भ त्रिकाल वाणी ग्रंथ-पुस्तकालय या प्रतिष्ठित मुक्त स्रोत से मिलाया गया · व्याख्या: Rohiit Gupta, Chief Vedic Architect

Frequently Asked Questions

नक्षत्र लिस्ट में कुल कितने नक्षत्र हैं?

मुख्य नक्षत्र लिस्ट में 27 नक्षत्र हैं, अश्विनी से रेवती तक। अभिजित को अठाईसवां माना जाता है, पर वह केवल मुहूर्त में गिना जाता है और जन्म नक्षत्र या दशा में नहीं आता।

27 नक्षत्र के नाम क्या हैं?

अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती।

नक्षत्र के स्वामी ग्रह कौन से हैं?

विंशोत्तरी में केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध नौ स्वामी हैं। अश्विनी से यह क्रम तीन बार दोहराता है, इसलिए हर स्वामी के तीन नक्षत्र होते हैं।

नक्षत्र और राशि में क्या अंतर है?

राशि 30° की होती है और नक्षत्र 13°20′ का। एक राशि में नौ चरण आते हैं, यानी सवा दो नक्षत्र। कुछ नक्षत्र दो राशियों में बँट जाते हैं, इसलिए चरण से ही चंद्र राशि पक्की होती है।

नक्षत्र का चरण कैसे पता करें?

नक्षत्र के 13°20′ को चार बराबर हिस्सों में बाँटने पर हर चरण 3°20′ का बनता है। चंद्रमा की डिग्री जिस हिस्से में हो वही चरण है। [मुफ़्त नक्षत्र कैलकुलेटर](/calculators/free-nakshatra-calculator) यह अपने आप निकाल देता है।

कौन से नक्षत्र दो राशियों में आते हैं?

कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा और पूर्वा भाद्रपद दो राशियों में बँटे हैं। बाकी अठारह एक ही राशि में पूरे आते हैं।

जन्म नक्षत्र से कौन सी दशा शुरू होती है?

जन्म नक्षत्र का स्वामी ही शुरुआती विंशोत्तरी दशा का स्वामी होता है। अश्विनी, मघा और मूल में केतु, भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा में शुक्र, और इसी तरह आगे। शेष अवधि चंद्र की डिग्री से निकलती है।

अभिजित नक्षत्र क्या है और क्या उसका स्वामी ग्रह होता है?

अभिजित उत्तराषाढ़ा के अंतिम भाग और श्रवण की शुरुआत के बीच का छोटा अंश है, जिसका देवता ब्रह्मा माना जाता है। इसकी अपनी विंशोत्तरी दशा नहीं होती, इसलिए इसका उपयोग मुहूर्त में ही होता है।

नक्षत्र के अनुसार बच्चे का नाम किस अक्षर से रखें?

अक्षर नक्षत्र के चरण पर निर्भर करता है। पूरी तालिका [नक्षत्र अनुसार नाम अक्षर](/blog/lucky-baby-name-letter-by-nakshatra-hindi) पेज पर है और [नाम अक्षर कैलकुलेटर](/calculators/free-baby-name-by-nakshatra) सीधे बता देता है।

क्या मूल नक्षत्र में जन्म अशुभ होता है?

मूल, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मघा, अश्विनी और रेवती को परंपरा में विशेष ध्यान वाला माना जाता है, पर फल पूरी कुंडली से तय होता है। शांति का सरल तरीका भी उसी परंपरा में है। विस्तार के लिए [मूल नक्षत्र गाइड](/blog/janm-mool-nakshatra-kaise-jaane) पढ़ें।

यह भी देखें · See also

श्रेणी: nakshatra