Trikaal Vaani Logo
Trikaal Vaani
calculator-guide

12 लग्न: स्वभाव, करियर और विवाह की गाइड

Rohiit Gupta· Chief Vedic Architect20 min read

Trikaal Sandesh — Direct Answer

लग्न जन्म के क्षण पूर्वी क्षितिज पर उदय हो रही राशि है, और बारह राशियाँ बारह अलग लग्न बनाती हैं। हर लग्न का एक स्वामी ग्रह (लग्नेश) होता है, और वही स्वभाव, करियर तथा विवाह की दिशा का पहला संकेत देता है। यह गाइड 12 लग्नों का सार और विस्तृत पन्नों के रास्ते देती है।

Deep Dive Analysis

12 लग्न क्या हैं — सीधा जवाब

लग्न जन्म के क्षण पूर्वी क्षितिज पर उदय हो रही राशि है, और बारह राशियाँ बारह अलग लग्न बनाती हैं। हर लग्न का एक स्वामी ग्रह (लग्नेश) होता है, और वही स्वभाव, करियर तथा विवाह की दिशा का पहला संकेत देता है। यह गाइड 12 लग्नों का सार और विस्तृत पन्नों के रास्ते देती है।[1]

यह पन्ना हर लग्न का अलग-अलग विस्तार नहीं दोहराता। यहाँ बारहों लग्न एक नज़र में मिलते हैं, और जिनका विस्तृत पन्ना छप चुका है उनके लिंक सही जगह पर दिए गए हैं। लग्न निकालने की गणना के लिए मेरा लग्न क्या है वाला पन्ना देखें।

लग्न क्या है और जन्म के क्षण से कैसे बनता है

पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, इसलिए हर लगभग दो घंटे में एक नई राशि पूर्वी क्षितिज पर उदित होती है। जन्म के ठीक क्षण जो राशि वहाँ थी, वही आपका लग्न है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र राशियों के उदय को ही लग्न कहता है और फल का विचार उसी से तथा ग्रहों के योग-वियोग से करने को कहता है।[1]

इसका सीधा अर्थ यह है कि जन्म का समय कुछ मिनट बदलने पर भी लग्न बदल सकता है, ख़ासकर राशि की सीमा के पास। इसी कारण जन्म समय की शुद्धता लग्न की पहली शर्त है। लग्न की हर राशि लगभग दो घंटे चलती है, पर स्थान और ऋतु के अनुसार यह अवधि घटती-बढ़ती है।

अपना लग्न कैसे पता करें

लग्न के लिए तीन जानकारियाँ चाहिए: जन्म की तारीख़, जन्म का ठीक समय और जन्म का स्थान। इन तीनों से निरयण पद्धति में लाहिरी अयनांश के साथ गणना होती है। सबसे सरल रास्ता Trikaal Vaani का मुफ़्त लग्न कैलकुलेटर है, जो आपकी लग्न राशि और अंश दोनों बता देता है।

अगर आप गणना की पूरी विधि पढ़ना चाहते हैं तो मेरा लग्न क्या है देखें; अंग्रेज़ी में वही विषय How to Find Your Lagna पर है। पूरी जन्म कुंडली चाहिए तो मुफ़्त जन्म कुंडली कैलकुलेटर इस्तेमाल करें। यहाँ विधि दोहराने के बजाय सीधे लग्नों के स्वभाव पर चलते हैं।

लग्न और राशि में अंतर

राशि वह है जिसमें जन्म के समय चंद्रमा था, और लग्न वह है जो उसी क्षण पूर्वी क्षितिज पर उदित थी। चंद्रमा लगभग ढाई दिन में राशि बदलता है, जबकि लग्न लगभग दो घंटे में, इसलिए एक ही राशि के दो लोगों के लग्न अलग हो सकते हैं। राशि मन और भावनात्मक प्रवृत्ति का संकेत देती है, लग्न देह, व्यक्तित्व और जीवन की दिशा का।

अपनी चंद्र राशि जाँचनी हो तो मुफ़्त राशि कैलकुलेटर और नाम से राशि कैसे जानें देखें। भ्रम हो तो पहले लग्न तय करें, फिर चंद्र राशि पढ़ें। दोनों का मेल पूरी कुंडली की तस्वीर बनाता है, पर भाव गिनने की शुरुआत लग्न से ही होती है।

लग्न से कौन-सा भाव और क्या देखा जाता है

लग्न वाला घर कुंडली का पहला भाव कहलाता है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार देह, रूप, ज्ञान, वर्ण, बलाबल, सुख-दुःख और स्वभाव लग्न भाव से देखे जाते हैं।[2] इसलिए किसी की कुंडली पढ़ते समय सबसे पहले लग्न, लग्नेश और लग्न में बैठे या उसे देखने वाले ग्रहों को देखा जाता है।

लग्न के बाद दूसरा भाव धन-परिवार का, तीसरा पराक्रम का और आगे सातवाँ भाव विवाह का तथा दसवाँ कर्म का बनता है। बारहों भावों का पूरा परिचय कुंडली के 12 भाव पर मिलता है, और ग्रहों का परिचय कुंडली के 9 ग्रह पर। लग्न बदलते ही हर ग्रह का भाव-स्वामित्व बदल जाता है, इसी से बारह अलग व्यक्तित्व बनते हैं।

चर, स्थिर और द्विस्वभाव — लग्न के तीन स्वभाव

बृहत् पराशर होरा शास्त्र राशियों को चर, स्थिर और द्विस्वभाव वर्गों में बाँटता है और मेष से गिनती शुरू करके शीर्ष आदि अंगों का क्रम बताता है।[3] चर राशियाँ मेष, कर्क, तुला और मकर हैं; स्थिर वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ हैं; द्विस्वभाव मिथुन, कन्या, धनु और मीन हैं।

व्यवहार में चर लग्न शुरुआत करने वाले, स्थिर लग्न टिके रहने वाले और द्विस्वभाव लग्न दो पक्ष देखकर बीच का रास्ता खोजने वाले माने जाते हैं। यह सामान्य प्रवृत्ति है, नियम नहीं; अंतिम तस्वीर लग्नेश की स्थिति और दशा से बनती है। इसलिए स्वभाव पढ़ते समय इस तीन-भाग वर्गीकरण को केवल पहली झलक समझें।

चार तत्व और 12 लग्न का नक्शा

बारह लग्न चार तत्वों में बँटे हैं: अग्नि में मेष, सिंह और धनु; पृथ्वी में वृषभ, कन्या और मकर; वायु में मिथुन, तुला और कुम्भ; जल में कर्क, वृश्चिक और मीन। इस गाइड के Samuh भी इसी तत्व-क्रम से बने हैं, ताकि आप अपने लग्न का तत्व पहचानकर सीधे उसका पन्ना खोल सकें।

तत्व का अर्थ यह नहीं कि कोई लग्न केवल एक ही गुण का है। अग्नि तत्व पहल और ऊर्जा की ओर, पृथ्वी तत्व स्थिरता और व्यावहारिकता की ओर, वायु तत्व संवाद और विचार की ओर तथा जल तत्व भावना और संवेदनशीलता की ओर झुकाव दिखाता है। यह झुकाव लग्नेश के बल से घटता-बढ़ता है, इसलिए लग्न बल भी जाँचना ज़रूरी है।

लग्नेश क्या है और क्यों इतना महत्त्वपूर्ण

लग्न राशि का स्वामी ग्रह लग्नेश कहलाता है। मेष का मंगल, वृषभ का शुक्र, मिथुन का बुध, कर्क का चंद्र और सिंह का सूर्य है; बाक़ी लग्नों के स्वामी आगे हर लग्न के खंड में दिए हैं। कुंडली में यह ग्रह जहाँ बैठता है, वहाँ से व्यक्ति की ऊर्जा उसी भाव के विषयों की ओर बहती है।

बृहत् पराशर होरा शास्त्र कहता है कि पाप-युक्त लग्नेश छठे, आठवें या बारहवें में देहसुख घटाता है, जबकि केंद्र या त्रिकोण में रहकर देहसुख देता है।[23] यहीं सीमा भी है: शास्त्र का वही अध्याय शुभ दृष्टि और बल को निर्णायक मानता है, इसलिए किसी एक स्थिति को अकेले डरने का आधार न बनाएँ। विस्तृत भाव-वार फल के लिए लग्नेश क्या है पढ़ें।

लग्न की बुनियाद समूह — लग्न और लग्नेश

यह Samuh पूरे हब की जड़ है, क्योंकि हर लग्न का पन्ना इसी समझ पर टिका है कि लग्न क्या है और उसका स्वामी कुंडली में कहाँ बैठा है। इस समूह का मुख्य पन्ना लग्नेश क्या है — 12 भावों में लग्नेश का फल है। उसमें लग्नेश के पहले भाव से बारहवें भाव तक के फल क्रम से समझाए गए हैं, हर फल के साथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र का संदर्भ और उसकी सीमा भी दी गई है।

पढ़ने का सही क्रम यह है कि पहले अपना लग्न तय करें, फिर कैलकुलेटर से देखें कि लग्नेश किस भाव में है, और तब उस भाव का खंड खोलें। यह पन्ना घबराहट बढ़ाने के लिए नहीं बना; इसमें हर कठिन स्थिति के साथ उसका भंग और व्यावहारिक संतुलन भी लिखा है। अगर आपको जानना है कि लग्नेश की मज़बूती कैसे आँकें, तो लग्न बल कैसे पता करें इसी से जुड़ा अगला कदम है।

योगकारक ग्रह क्या होता है

योगकारक वह ग्रह है जो एक साथ केंद्र और त्रिकोण का स्वामी हो या उनमें स्थित हो। बृहत् पराशर होरा शास्त्र कहता है कि कोण और केंद्र दोनों का स्वामी, या उनमें स्थित ग्रह विशेष रूप से योगकारक है।[16] इसीलिए हर लग्न के लिए योगकारक ग्रह अलग होता है, और कुछ लग्नों में कोई ग्रह एकसाथ दोनों का स्वामी नहीं बन पाता।

वृषभ में शनि (9वें और 10वें का स्वामी), कर्क में मंगल (5वें और 10वें का स्वामी) और सिंह में मंगल (4थे और 9वें का स्वामी) इसी श्रेणी में आते हैं। यह नाम अपने आप सफलता की गारंटी नहीं है; ग्रह का बल, दृष्टि और दशा देखनी पड़ती है। व्यापक परिचय के लिए कुंडली में शुभ-अशुभ योग पढ़ें।

केंद्र और त्रिकोण — लग्न के शुभ स्थान

पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव केंद्र हैं; पहला, पाँचवाँ और नवाँ भाव त्रिकोण। लग्न दोनों श्रेणियों में आता है, इसलिए बृहत् पराशर होरा शास्त्र उसे विशेष शुभ कहता है और पंचम तथा नवम को विशेष धन-स्थान।[15] यही कारण है कि लग्नेश को सबसे सुरक्षित स्वामी माना जाता है।

आधार यह है कि केंद्र-त्रिकोण का संबंध कुंडली को सहारा देता है, पर इसका अर्थ सुविधा की गारंटी नहीं। सहारा तभी फल बनता है जब ग्रह बलवान हो और दशा में सक्रिय हो। इसी कारण किसी भी लग्न का फल पढ़ते समय ग्रह बल की जाँच साथ चलनी चाहिए, केवल भाव-स्वामित्व की सूची नहीं।

मारक और त्रिक भावों के स्वामी — डर नहीं, समझ

जब किसी लग्न के लिए कोई ग्रह दूसरे और सातवें भाव का स्वामी बनता है तो उसे मारक संज्ञा मिलती है, और छठे, आठवें, बारहवें के स्वामियों को त्रिक स्वामी कहा जाता है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र में मारक-लक्षण वाले ग्रह बताए गए हैं, पर यह जीवन-अवधि की भविष्यवाणी नहीं, केवल उस ग्रह की दशा में स्वास्थ्य और संबंधों पर अतिरिक्त सावधानी का संकेत है।

यह संज्ञा तभी भारी होती है जब ग्रह निर्बल, पीड़ित और दशा में सक्रिय हो; बलवान और शुभ दृष्ट होने पर वही ग्रह सामान्य फल देता है। इसलिए जहाँ आगे "मारक" शब्द आए, उसे चेतावनी की घंटी नहीं, जाँच की सूची की तरह पढ़ें। अपनी कुंडली में कमज़ोरी जाँचनी हो तो कमज़ोर ग्रह कैसे पहचानें देखें।

हर लग्न के लिए ग्रह अलग क्यों बदल जाते हैं

एक ही ग्रह अलग लग्नों में अलग भावों का स्वामी बनता है, इसलिए उसका स्वभाव कुंडली-दर-कुंडली बदल जाता है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र का लग्न-वार अध्याय इसी आधार पर हर लग्न के शुभ, पाप और मारक ग्रह गिनाता है, और यह गिनती केंद्र तथा त्रिकोण के स्वामित्व के नियमों से निकलती है।[25] उदाहरण के लिए शनि वृषभ में योगकारक है, जबकि मेष में उसे पाप-फल वाला कहा गया है।

इसीलिए "शनि अच्छा है या बुरा" जैसा कोई सार्वभौमिक उत्तर नहीं होता। उत्तर लग्न पर निर्भर है, और उसके बाद ग्रह की राशि, भाव, दृष्टि और दशा पर। अगले खंडों में हर लग्न का यही भाव-स्वामित्व सरल रूप में रखा गया है।

अग्नि तत्व समूह — मेष और सिंह लग्न

अग्नि तत्व में मेष, सिंह और धनु आते हैं। इस Samuh के दो पन्ने अब उपलब्ध हैं: मेष लग्न के जातक: स्वभाव, करियर, विवाह और सिंह लग्न के जातक: स्वभाव, करियर, विवाह। दोनों में लग्न राशि का स्वामी, लग्नेश की स्थिति, शुभ-पाप ग्रहों का भाव-स्वामित्व, करियर के क्षेत्र, विवाह में सप्तम भाव की भूमिका और संतुलित उपाय क्रम से समझाए गए हैं।

मेष का पन्ना मंगल की ऊर्जा, शुक्र के मारक-स्वामित्व की सीमा और सूर्य के पंचमेश होने का अर्थ खोलता है। सिंह का पन्ना सूर्य की लग्नेशता, मंगल के योगकारक होने और शनि के छठे-सातवें स्वामित्व को समझाता है। हर दावे के साथ उसका शास्त्र-संदर्भ और भंग लिखा है, ताकि पढ़ने वाले को डर की जगह दिशा मिले। धनु लग्न का विस्तृत पन्ना अभी बन रहा है।

मेष लग्न — संक्षिप्त परिचय

मेष राशि मंगल की अग्नि-तत्व वाली राशि है, इसलिए मेष लग्न का स्वामी मंगल है।[4] मंगल यहाँ पहले और आठवें भाव का स्वामी बनता है। शुक्र दूसरे और सातवें का, बुध तीसरे और छठे का, चंद्र चौथे का, सूर्य पाँचवें का, गुरु नवें और बारहवें का तथा शनि दसवें और ग्यारहवें का स्वामी बनता है।

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के मेष लग्न वाले प्रसंग में शनि, बुध और शुक्र को पाप-फल वाला और गुरु तथा सूर्य को शुभ कहा गया है।[17] शुक्र को मारक-लक्षण वाला भी बताया गया है,[18] पर यह सावधानी की सूचना है; बलवान और शुभ दृष्ट शुक्र में यह सीमा काफ़ी हल्की हो जाती है। विस्तृत व्याख्या मेष लग्न के पन्ने में है।

मेष लग्न का करियर और विवाह

मेष लग्न में दसवें भाव का स्वामी शनि है और पाँचवें का सूर्य, इसलिए करियर में अनुशासन के साथ पहल करने वाले क्षेत्र (प्रबंधन, तकनीक, प्रशासन, खिलाड़ी जैसी भूमिकाएँ) अक्सर सुसंगत बैठते हैं। यह सामान्य संकेत है; वास्तविक क्षेत्र दशमेश की स्थिति, नवांश और चल रही दशा से तय होता है, जिसे करियर का कुंडली विश्लेषण में विस्तार से देखा जा सकता है।

विवाह में सप्तम भाव शुक्र का है, जो दूसरे का भी स्वामी है। इस दोहरे स्वामित्व के कारण संबंधों में सुख की संभावना और ज़िम्मेदारी की परीक्षा दोनों दिखती हैं। मंगल की प्रबलता ग़ुस्से में बदल सकती है, इसलिए संवाद पर ध्यान रखें। पूर्ण निर्णय हमेशा कुंडली में विवाह योग और दशा देखकर ही लें।

सिंह लग्न — संक्षिप्त परिचय

सिंह राशि सूर्य की राशि है, इसलिए सिंह लग्न का स्वामी सूर्य है।[8] चंद्र बारहवें भाव का स्वामी है। बुध दूसरे और ग्यारहवें का, शुक्र तीसरे और दसवें का, मंगल चौथे और नवें का, गुरु पाँचवें और आठवें का तथा शनि छठे और सातवें का स्वामी बनता है।

मंगल यहाँ चौथे (केंद्र) और नवें (त्रिकोण) का स्वामी होने से योगकारक है, और बृहत् पराशर होरा शास्त्र के सिंह लग्न वाले प्रसंग में मंगल, गुरु और सूर्य को शुभ कहा गया है।[22] इसकी सीमा यह है कि मंगल निर्बल या पीड़ित हो तो योगकारकता का लाभ कम दिखता है। सूर्य को लग्नेश होने से सीधा बल मिलता है, पर अहंकार और अधिकार-बोध का संतुलन रखना पड़ता है। विस्तार सिंह लग्न के पन्ने में है।

सिंह लग्न का करियर और विवाह

सिंह लग्न में दसवें भाव का स्वामी शुक्र है और तीसरे का भी, इसलिए सार्वजनिक भूमिका, रचनात्मकता, संचार और नेतृत्व वाले क्षेत्र स्वाभाविक मेल रखते हैं। लग्नेश सूर्य के बल से व्यक्ति अधिकार की भूमिका लेने की प्रवृत्ति दिखाता है; यह प्रवृत्ति नौकरी, राजनीति, प्रशासन या स्वयं के काम में अलग-अलग ढंग से खुल सकती है।

विवाह में सप्तम भाव का स्वामी शनि है, जो छठे का भी स्वामी है। इससे संबंधों में धैर्य और परिपक्वता की माँग रहती है, और अक्सर देर से या ज़िम्मेदारी के साथ विवाह के संकेत मिलते हैं। यह निश्चित फल नहीं, केवल एक प्रवृत्ति है; शनि के बल, दृष्टि और दशा के आधार पर ही निर्णय लें। गुण मिलान के लिए कुंडली मिलान गाइड देखें।

पृथ्वी तत्व समूह — वृषभ लग्न

पृथ्वी तत्व में वृषभ, कन्या और मकर आते हैं। इस Samuh का उपलब्ध पन्ना वृषभ लग्न के जातक: स्वभाव, करियर, विवाह है। इसमें शुक्र की लग्नेशता, शनि के नवम-दशम (योगकारक) स्वामित्व, बुध के दूसरे-पाँचवें भाव, मंगल के सातवें-बारहवें स्वामित्व और गुरु के आठवें-ग्यारहवें स्वामित्व को क्रम से समझाया गया है।

वृषभ का पन्ना यह भी दिखाता है कि स्थिर पृथ्वी लग्न में धन, परिवार और टिकाऊ संपत्ति का विषय कैसे उभरता है, करियर में स्थिरता और सेवा-व्यापार वाले क्षेत्र कैसे मेल रखते हैं, और विवाह में सप्तमेश मंगल की भूमिका क्यों सावधानी माँगती है। शास्त्र-संदर्भ, भंग और उपाय हर खंड में दिए हैं। कन्या और मकर लग्न के पन्ने बन रहे हैं; तब तक कन्या और मकर के रत्न-पन्ने उपलब्ध हैं।

वृषभ लग्न — स्वभाव, करियर, विवाह

वृषभ राशि शुक्र की है, इसलिए वृषभ लग्न का स्वामी शुक्र है।[5] शुक्र यहाँ पहले और छठे भाव का स्वामी बनता है। बुध दूसरे और पाँचवें का, चंद्र तीसरे का, सूर्य चौथे का, मंगल सातवें और बारहवें का, गुरु आठवें और ग्यारहवें का तथा शनि नवें और दसवें का स्वामी है।

शनि यहाँ केंद्र (10वाँ) और त्रिकोण (9वाँ) दोनों का स्वामी होने से योगकारक है, और बृहत् पराशर होरा शास्त्र वृषभ लग्न में शनि और सूर्य को शुभ तथा शनि को राजयोग-कारक कहता है।[19] इसकी सीमा बल की है: कमज़ोर या पीड़ित शनि में वही फल देर और संघर्ष से मिलता है। वृषभ लग्न का स्थिर स्वभाव करियर में टिकाऊपन देता है; विवाह में सप्तमेश मंगल की स्थिति ही संतुलन तय करती है। विस्तार वृषभ लग्न के पन्ने में है।

वायु तत्व समूह — मिथुन लग्न

वायु तत्व में मिथुन, तुला और कुम्भ आते हैं। इस Samuh का उपलब्ध पन्ना मिथुन लग्न के जातक: स्वभाव, करियर, विवाह है। इसमें बुध की दोहरी लग्नेशता (लग्न और चतुर्थ), चंद्र के धन-भाव स्वामित्व, शुक्र के पाँचवें-बारहवें स्वामित्व, गुरु के सप्तम-दशम (केंद्र-अधिपति दोष की चर्चा सहित) और शनि के आठवें-नवें स्वामित्व का क्रम से विवेचन है।

मिथुन द्विस्वभाव वायु लग्न है, इसलिए पन्ने में संवाद, लेखन, व्यापार, तकनीक और शिक्षा जैसे क्षेत्रों की चर्चा के साथ यह भी बताया गया है कि चंचलता को निर्णय में कैसे स्थिर करें। विवाह के खंड में सप्तमेश गुरु का महत्त्व और उसकी सीमाएँ दी गई हैं। तुला और कुम्भ लग्न के पन्ने बन रहे हैं; तब तक तुला और कुम्भ के रत्न-पन्ने देखे जा सकते हैं।

मिथुन लग्न — स्वभाव, करियर, विवाह

मिथुन राशि बुध की है, इसलिए मिथुन लग्न का स्वामी बुध है।[6] बुध यहाँ पहले और चौथे भाव का स्वामी है, यानी लग्न और केंद्र दोनों का। चंद्र दूसरे का, सूर्य तीसरे का, शुक्र पाँचवें और बारहवें का, मंगल छठे और ग्यारहवें का, गुरु सातवें और दसवें का तथा शनि आठवें और नवें का स्वामी बनता है।

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के मिथुन लग्न वाले प्रसंग में चंद्रमा को मारक-लक्षण वाला और साहचर्य से फल देने वाला कहा गया है।[20] इसे डर की तरह नहीं, बल्कि दूसरे भाव (धन-वाणी) के स्वामी चंद्र की स्थिति जाँचने की सूचना की तरह पढ़ें; बलवान चंद्र में यह सीमा घट जाती है। मिथुन में बुध के बल से बुद्धि, संवाद और व्यापार की प्रवृत्ति मिलती है। विस्तार मिथुन लग्न के पन्ने में है।

जल तत्व समूह — कर्क लग्न

जल तत्व में कर्क, वृश्चिक और मीन आते हैं। इस Samuh का उपलब्ध पन्ना कर्क लग्न: स्वभाव, करियर, विवाह और उपाय है। इसमें चंद्र की लग्नेशता, मंगल के पंचम-दशम योगकारक स्वामित्व, शुक्र के चौथे-ग्यारहवें, बुध के तीसरे-बारहवें, गुरु के छठे-नवें और शनि के सातवें-आठवें स्वामित्व को क्रम से समझाया गया है।

कर्क चर जल लग्न है, इसलिए पन्ने में भावनात्मक सुरक्षा, घर-परिवार से जुड़ाव, देखभाल और सेवा वाले करियर, तथा विवाह में सप्तमेश शनि की भूमिका पर विस्तार से लिखा गया है। हर कठिन संकेत के साथ उसका संतुलन और साधारण उपाय भी दिए हैं। वृश्चिक और मीन लग्न के पन्ने बन रहे हैं; उपलब्ध वृश्चिक और मीन रत्न-पन्ने तब तक देखे जा सकते हैं। कर्क के राजयोग को कर्क राशि राजयोग पर भी पढ़ सकते हैं।

कर्क लग्न — स्वभाव, करियर, विवाह

कर्क राशि चंद्रमा की जल-तत्व वाली राशि है, इसलिए कर्क लग्न का स्वामी चंद्र है।[7] चंद्र केवल पहले भाव का स्वामी है। सूर्य दूसरे का, बुध तीसरे और बारहवें का, शुक्र चौथे और ग्यारहवें का, मंगल पाँचवें और दसवें का, गुरु छठे और नवें का तथा शनि सातवें और आठवें का स्वामी बनता है।

मंगल यहाँ पंचम (त्रिकोण) और दशम (केंद्र) का स्वामी होने से योगकारक है, और बृहत् पराशर होरा शास्त्र कर्क लग्न में मंगल को साक्षात् योग और शुभ फल देने वाला कहता है।[21] इसकी सीमा यह है कि मंगल निर्बल या पीड़ित हो तो योगकारक होते हुए भी फल कम दिखता है। कर्क का जल स्वभाव भावुकता और देखभाल देता है, पर सीमाएँ तय करना सीखना भी ज़रूरी है। विस्तार कर्क लग्न के पन्ने में है।

कन्या लग्न — बुनियादी तथ्य

कन्या राशि का अधिपति बुध है, इसलिए कन्या लग्न का लग्नेश बुध है।[9] यह पृथ्वी तत्व और द्विस्वभाव लग्न है। यहाँ केवल ये बुनियादी तथ्य दिए जा रहे हैं; कन्या लग्न का विस्तृत स्वभाव-करियर-विवाह पन्ना अभी बन रहा है और तैयार होने पर इस हब में जुड़ जाएगा।

तब तक कन्या लग्न के रत्न और ग्रह-स्थिति पर कन्या लग्न के लिए सबसे अच्छे रत्न पन्ना पढ़ा जा सकता है। रत्न पहनने का निर्णय हमेशा कुंडली के पूरे विश्लेषण के बाद ही लें, क्योंकि केवल लग्न देखकर रत्न चुनना अधूरा तरीक़ा है।

तुला लग्न — बुनियादी तथ्य

तुला राशि का अधिपति शुक्र है, इसलिए तुला लग्न का लग्नेश शुक्र है।[10] यह वायु तत्व और चर लग्न है। इस लग्न का विस्तृत पन्ना अभी बन रहा है, इसलिए यहाँ केवल मूल तथ्य दिए गए हैं।

लग्नेश शुक्र का बल जाँचने के लिए मुफ़्त ग्रह बल कैलकुलेटर इस्तेमाल करें। इस लग्न पर रत्न-संबंधी जानकारी के लिए तुला लग्न के लिए सबसे अच्छे रत्न पन्ना उपलब्ध है; रत्न का निर्णय कुंडली के पूरे विश्लेषण के बाद ही लें।

वृश्चिक लग्न — बुनियादी तथ्य

वृश्चिक राशि का अधिपति मंगल है, इसलिए वृश्चिक लग्न का लग्नेश मंगल है।[11] यह जल तत्व और स्थिर लग्न है। विस्तृत स्वभाव-करियर-विवाह पन्ना अभी बन रहा है और तैयार होने पर जल तत्व Samuh में जुड़ेगा।

इस बीच वृश्चिक लग्न के लिए सबसे अच्छे रत्न पन्ना देखा जा सकता है। मंगल ऊर्जा का ग्रह है, इसलिए उसका बल और भाव-स्थिति देखकर ही कोई उपाय या रत्न तय करें; कुंडली के पूरे विश्लेषण के बिना कोई निर्णय अधूरा रहेगा।

धनु लग्न — बुनियादी तथ्य

धनु राशि का स्वामी गुरु है, इसलिए धनु लग्न का लग्नेश गुरु है।[11] यह अग्नि तत्व और द्विस्वभाव लग्न है। धनु लग्न अग्नि Samuh का हिस्सा है, पर इसका विस्तृत पन्ना अभी बन रहा है; तैयार होते ही यह हब में जोड़ा जाएगा।

तब तक धनु लग्न के लिए सबसे अच्छे रत्न पन्ना पढ़ें। लग्नेश गुरु का बल मापने के लिए मुफ़्त लग्न बल कैलकुलेटर उपयोगी है, और किसी भी उपाय से पहले कुंडली का समग्र विश्लेषण ज़रूरी है।

मकर लग्न — बुनियादी तथ्य

मकर राशि का अधिपति शनि है, इसलिए मकर लग्न का लग्नेश शनि है।[12] यह पृथ्वी तत्व और चर लग्न है। विस्तृत पन्ना अभी बन रहा है, इसलिए यहाँ केवल बुनियादी तथ्य दिए गए हैं।

लग्नेश शनि की भाव-स्थिति और बल जाँचना इस लग्न का पहला कदम है। आगे पढ़ने के लिए मकर लग्न के लिए सबसे अच्छे रत्न पन्ना उपलब्ध है। रत्न पहनने से पहले कुंडली के पूरे विश्लेषण पर ज़ोर दें, क्योंकि शनि से जुड़े निर्णय जल्दबाज़ी के नहीं होते।

कुम्भ लग्न — बुनियादी तथ्य

कुम्भ राशि का स्वामी शनि है, इसलिए कुम्भ लग्न का लग्नेश शनि है।[13] यह वायु तत्व और स्थिर लग्न है। विस्तृत पन्ना बन रहा है और तैयार होने पर वायु तत्व Samuh में जुड़ेगा।

तब तक कुम्भ लग्न के लिए सबसे अच्छे रत्न पन्ना देखा जा सकता है। मकर और कुम्भ दोनों का लग्नेश शनि है, पर चर पृथ्वी और स्थिर वायु का अंतर इन दोनों के स्वभाव को अलग रखता है, इसलिए दोनों को एक जैसा न मानें।

मीन लग्न — बुनियादी तथ्य

मीन राशि का अधिपति गुरु है, इसलिए मीन लग्न का लग्नेश गुरु है।[14] यह जल तत्व और द्विस्वभाव लग्न है। विस्तृत पन्ना अभी बन रहा है और जल तत्व Samuh में बाद में जुड़ेगा।

तब तक मीन लग्न के लिए सबसे अच्छे रत्न पन्ना पढ़ा जा सकता है। गुरु लग्नेश होने पर उसका बल, भाव और दशा देखना ज़रूरी है; रत्न या उपाय का फ़ैसला कुंडली के पूरे विश्लेषण के बाद ही करें।

12 लग्न और करियर — कुंडली में कैसे पढ़ें

किसी भी लग्न में करियर दसवें भाव, दशमेश, दशम में बैठे ग्रहों और लग्नेश के संबंध से पढ़ा जाता है। लग्न के आधार पर केवल सामान्य झुकाव मिलता है; कोई लग्न स्वयं निश्चित पेशा नहीं देता। मेष में दशमेश शनि, वृषभ में शनि, मिथुन में गुरु, कर्क में मंगल और सिंह में शुक्र है, इसलिए पाँचों में करियर की भाषा अलग बनती है।

व्यवहार में पहले दशमेश का बल और स्थान देखें, फिर नवांश और दशा। पूरा तरीक़ा करियर कुंडली विश्लेषण में है। धन के पक्ष के लिए कुंडली में धन योग पढ़ें, ताकि करियर और आय दोनों की तस्वीर साथ बने।

12 लग्न और विवाह — सप्तम भाव और सप्तमेश

विवाह में सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र (पुरुष की कुंडली में कारक) या गुरु (स्त्री की कुंडली में कारक) और दशा देखी जाती है। लग्न बदलते ही सप्तमेश बदल जाता है: मेष में शुक्र, वृषभ में मंगल, मिथुन में गुरु, कर्क में शनि और सिंह में शनि। इसी कारण विवाह के सामान्य संकेत हर लग्न में अलग होते हैं।

किसी भी लग्न में सप्तमेश पर कठोर निष्कर्ष न निकालें; वह शुभ दृष्ट और बलवान हो तो वही स्वामित्व स्थिर संबंध देता है। कुंडली से विवाह-पक्ष का समग्र आकलन कुंडली में विवाह योग में है और मिलान के लिए कुंडली मिलान देखें। विवाह का समय जानने के लिए शादी कब होगी कैलकुलेटर भी उपलब्ध है।

लग्न बल और ग्रह बल — लग्न कितना मज़बूत है

लग्न का फल लग्न और लग्नेश के बल पर टिका है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र का कथन है कि अकेला बलवान लग्नेश केंद्र में हो तो सब अरिष्ट नष्ट करता है।[24] यह भंग का नियम है: कुंडली में कोई कठिन योग दिखे तो भी बलवान लग्नेश की स्थिति उसे बहुत हल्का कर देती है।

बल जाँचने के लिए लग्न बल क्या है पन्ना पढ़ें और मुफ़्त लग्न बल कैलकुलेटर चलाएँ। ग्रहों के बल का व्यापक आकलन कुंडली की मज़बूती और कुंडली शक्ति कैलकुलेटर पर है। अंग्रेज़ी पाठकों के लिए Lagna Bal Calculator Guide भी उपलब्ध है।

दशा के साथ लग्न का फल

लग्न स्थायी ढाँचा है, पर समय का निर्णय दशा करती है। जिस ग्रह की दशा चल रही हो, उसका भाव-स्वामित्व और बल उसी समय के विषयों को सामने लाता है। इसलिए एक ही लग्न के दो लोग भी अलग दशाओं में अलग अनुभव करते हैं; लग्न सामान्य प्रवृत्ति बताता है और दशा बताती है कि वह कब सक्रिय होगी।

अपनी चल रही दशा देखने के लिए मुफ़्त दशा कैलकुलेटर इस्तेमाल करें। नक्षत्र से दशा का आरंभ समझने के लिए जन्म नक्षत्र कैसे पता करें पढ़ें। दशा के समय से कैरियर-खिड़की देखना हो तो दशा टाइमिंग करियर विंडो एक अगला पन्ना है।

लग्न के आधार पर रत्न और उपाय — सही क्रम

लग्न के आधार पर रत्न चुनना तभी सही है जब लग्नेश, योगकारक और भाव-स्वामियों का बल देखा जा चुका हो। केवल "इस लग्न का यह रत्न" वाली सूची अधूरी है, क्योंकि निर्बल ग्रह को रत्न से बल मिल भी सकता है और पीड़ित ग्रह के रत्न से समस्या बढ़ भी सकती है। इसी कारण रत्न का निर्णय हमेशा कुंडली के पूरे विश्लेषण के बाद ही होना चाहिए।

रत्न के नियम रत्न पहनने के व्यावहारिक नियम में हैं और अपने लग्न के रत्न-पन्ने ऊपर हर लग्न के खंड में दिए गए हैं। उपाय की पहली जाँच के लिए मुफ़्त उपाय कैलकुलेटर देखें। हर उपाय में यह पाँच बातें साफ़ रखें: क्या करना है, किस दिन, कितनी बार, कितने दिन, और किस सीमा तक।

लग्न पढ़ने की आम गलतियाँ

सबसे आम गलती चंद्र राशि को लग्न मान लेना है, जिससे पूरी कुंडली का भाव-क्रम बदल जाता है। दूसरी गलती जन्म समय अनुमान से लेना है, जिससे लग्न बदल सकता है। तीसरी गलती सूची से रत्न चुन लेना और चौथी "मारक" शब्द पढ़कर भयभीत हो जाना है, जबकि इस शब्द की अपनी शर्तें और सीमाएँ हैं।

पाँचवीं गलती एक ही लग्न की सामान्य बात को अपने ऊपर पूरी तरह लागू कर देना है। एक लग्न के लाखों लोग होते हैं और हर किसी की दशा, ग्रह-बल और नवांश अलग है। कुंडली कितनी सही बनती है, यह समझने के लिए मुफ़्त कुंडली कितनी सही होती है पढ़ें, और पूरी कुंडली पढ़ने की शुरुआत के लिए कुंडली कैसे देखें।

अपने लग्न की जांच के बाद अगला कदम

पहले मुफ़्त लग्न कैलकुलेटर से अपना लग्न पक्का करें। फिर इस गाइड से अपने लग्न का खंड खोलें और जिन लग्नों का विस्तृत पन्ना उपलब्ध है उसे पढ़ें। उसके बाद लग्नेश की स्थिति के लिए लग्नेश वाला पन्ना और बल के लिए लग्न बल कैलकुलेटर देखें।

अंत में अपनी पूरी कुंडली खोलकर देखें कि लग्न, चंद्र राशि और चल रही दशा मिलकर क्या तस्वीर बनाती हैं। अपनी कुंडली देखने के लिए मेरी जन्म कुंडली और लग्न चार्ट पढ़ने की गाइड उपयोगी हैं। कुंडली के चार्ट का स्वरूप समझने के लिए उत्तर और दक्षिण भारतीय चार्ट भी पढ़ें।

12 लग्न गाइड का सार

लग्न जन्म के क्षण उदित राशि है; उसका स्वामी लग्नेश है; और हर लग्न में ग्रहों का भाव-स्वामित्व बदलने से स्वभाव, करियर और विवाह की प्रवृत्ति बदलती है। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क और सिंह के विस्तृत पन्ने उपलब्ध हैं और बाक़ी सात लग्नों के बन रहे हैं।

जो भी पढ़ें, याद रखें कि लग्न एक ढाँचा है, फ़ैसला नहीं। बल, दृष्टि और दशा मिलकर फल तय करते हैं, इसलिए भय की जगह जाँच और उपाय की ओर बढ़ें। मुफ़्त लग्न कैलकुलेटर से शुरुआत करके अपने लग्न का पन्ना पढ़ें और अगर व्यक्तिगत कुंडली-विश्लेषण चाहिए तो मुफ़्त जन्म कुंडली बनाकर आगे बढ़ें।

Apna Personalized Analysis Lein

Yeh article general framework hai. Aapke specific chart ke according detailed analysis ke liye:

शब्दावली · Glossary

लग्न
जन्म के क्षण पूर्वी क्षितिज पर उदित राशि; यही पहला भाव बनती है जिससे बाक़ी भाव गिने जाते हैं।
लग्नेश
लग्न राशि का स्वामी ग्रह; कुंडली में उसकी स्थिति और बल पूरे व्यक्तित्व की दिशा का संकेत देते हैं।
योगकारक
केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी या उनमें स्थित ग्रह, जो उस लग्न के लिए विशेष शुभ फल की संभावना रखता है।
मारक
दूसरे और सातवें भाव के स्वामी जैसे ग्रह जिन्हें अपनी दशा में अतिरिक्त सावधानी का संकेत माना जाता है, फल बल पर निर्भर।
केंद्र और त्रिकोण
पहला, चौथा, सातवाँ, दसवाँ भाव केंद्र हैं और पहला, पाँचवाँ, नवाँ त्रिकोण; ये कुंडली के सहारे के स्थान माने जाते हैं।
द्विस्वभाव राशि
मिथुन, कन्या, धनु और मीन; ऐसी राशियाँ जिनमें चर और स्थिर दोनों के गुण मिश्रित माने जाते हैं।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

इस लेख के हर नियम का मूल स्रोत — ग्रंथ, अध्याय और श्लोक संख्या के साथ।

  1. [1]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    राशीनामुदयो लग्नं तद्वशादेव जन्मिनाम् । ग्रहयोगवियोगाभ्यां फलं चिन्त्यं शुभाशुभम्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 3 — ग्रहगुणस्वरूप अध्याय · श्लोक 6

    राशियों का उदय ही लग्न है; फल उसी से तथा ग्रहों के योग-वियोग से विचारा जाता है।

    The rising of a sign is the lagna; results are judged from it along with planetary conjunctions and separations.

  2. [2]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    देहं रूपं च ज्ञानं च वर्णं चैव बलाबलम् । सुखं दुःखं स्वभावञ्च लग्नभावान्निरीक्षयेत्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 11 — भावविवेक अध्याय · श्लोक 2

    देह, रूप, ज्ञान, वर्ण, बलाबल, सुख-दुःख और स्वभाव लग्न भाव से देखे जाते हैं।

    Body, form, knowledge, complexion, strength, happiness, sorrow and nature are judged from the lagna house.

  3. [3]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    चरनौ द्वौ तथा मेषात् ज्ञेयाः शीर्षादयः क्रमात् । चरस्थिरद्विस्वभावाः क्रूराक्रूरौ नरस्त्रियौ
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 5

    राशियाँ चर, स्थिर और द्विस्वभाव हैं और मेष से सिर आदि अंगों के क्रम में गिनी जाती हैं।

    The signs are movable, fixed and dual, and are counted from Mesha as limbs beginning with the head.

  4. [4]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    पूर्ववासी नृपज्ञातिः शैलचारी रजोगुणी । पृष्ठोदयी पावकी च मेषराशिः कुजाधिपः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 7

    मेष राशि मंगल-अधिपति, अग्नि-तत्व और रजोगुणी है।

    Mesha is ruled by Mars, fiery and rajasic.

  5. [5]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    श्वेतः शुक्राधिपो दीर्घश्चतुष्पाच्छर्वरीबली । याम्येट् ग्राम्यो वणिग्भूमिरजः पृष्ठोदयो वृषः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 8

    वृष राशि का अधिपति शुक्र है।

    Vrishabha is ruled by Venus.

  6. [6]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    समगात्रो हरिद्विर्णो मिथुनाख्यो बुधाधिपः । पाटलो वनचारी च ब्राह्मणो निशि वीर्यवान्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 10

    मिथुन राशि का अधिपति बुध है।

    Mithuna is ruled by Mercury.

  7. [7]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    बहुपादचरः स्थौल्यतनुः सत्त्वगुणी जली । पृष्ठोदयी कर्कराशिर्मृगाङ्काऽधिपतिः स्मृतः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 11

    कर्क राशि का अधिपति चंद्रमा है और यह जल-तत्व की राशि है।

    Karka is ruled by the Moon and is a watery sign.

  8. [8]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    सिंहः सूर्याधिपः सत्त्वी चतुष्पात् क्षत्रियो वनी । शीर्षोदयी बृहद्।ह्गात्रःपाण्डुः पूर्वेड् द्युवीर्यवान्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 12

    सिंह राशि का अधिपति सूर्य है।

    Simha is ruled by the Sun.

  9. [9]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    सा सस्यदहना वैश्या चित्रवर्णा प्रभञ्जिनी । कुमारी तमसा युक्ता बालभावा बुधाधिपा
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 14

    कन्या राशि का अधिपति बुध है।

    Kanya is ruled by Mercury.

  10. [10]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    शुक्राऽधिपोऽथ स्वल्पाङ्गो बहुपाद्।ह्ब्राह्मणो बिली । सौम्यस्थो दिनवीर्याढ्यः पिशङ्गो जलभूवहः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 16

    तुला राशि का अधिपति शुक्र है।

    Tula is ruled by Venus.

  11. [11]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    रोमस्वाढ्योऽतितीक्ष्णाग्रो वृश्चिकश्च कुजाधिपः । पृष्ठोदयी त्वथ धनुर्गुरुस्वामी च सात्त्विकः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 17

    वृश्चिक का अधिपति मंगल और धनु का स्वामी गुरु है।

    Vrishchika is ruled by Mars and Dhanu has Jupiter as its lord.

  12. [12]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    पूर्वस्थो वसुधाचारी तेजस्वी ब्रह्मणा कृतः । मन्दाधिपस्तमी भौमी याम्येट् च निशि वीर्यवान्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 19

    मकर राशि का अधिपति शनि है।

    Makara is ruled by Saturn.

  13. [13]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    शूद्रः पश्चिमदेशस्य स्वामी दैवाकरिः स्मृतः । मीनौ पुच्छास्यसंलग्नौ मीनराशिर्दिवाबली
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 22

    कुम्भ राशि का स्वामी शनि है।

    Kumbha has Saturn as its lord.

  14. [14]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    सुराचार्याधिपश्चेति राशीनां गदिता गुणाः । त्रिंशद्।ह्भागात्मकानां च स्थूलसूक्ष्मफलाय च
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूप अध्याय · श्लोक 24

    मीन राशि का अधिपति देवगुरु बृहस्पति है।

    Meena has the preceptor of the gods, Jupiter, as its lord.

  15. [15]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    लग्नं केन्द्रत्रिकोणत्वाद् विशेषेण शुभप्रदम् । पञ्चमं नवमं चैव विशेषधनमुच्यते
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 3

    लग्न केंद्र और त्रिकोण दोनों होने से विशेष शुभ है; पंचम और नवम विशेष धन-स्थान हैं।

    Lagna is especially auspicious as both kendra and trikona; the 5th and 9th are special wealth houses.

  16. [16]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    कोणेशत्वे यदैकस्य केन्द्रेशत्वं च जायते । केन्द्रे कोणे स्थितो वाऽसौ विशेषाद्योगकारकः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 13

    कोण और केंद्र दोनों का स्वामी, या उनमें स्थित ग्रह विशेष रूप से योगकारक है।

    A planet owning both a trikona and a kendra, or placed in them, is especially yogakaraka.

  17. [17]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    मन्दसौम्यसिताः पापाः शुभौ गुरुदिवाकरौ । न शुभं योगमत्रेण प्रभवेच्छनिजीवयोः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 20

    मेष लग्न में शनि, बुध, शुक्र पाप-फल वाले तथा गुरु और सूर्य शुभ कहे गए हैं।

    For Mesha lagna, Saturn, Mercury and Venus are malefic, Jupiter and the Sun benefic.

  18. [18]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    पारतन्त्र्येण जीवस्य पापकर्मापि निश्चितम् । शुक्रः साक्षान्निहन्ता स्यान्मारकत्वेन लक्षितः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 21

    मेष लग्न में शुक्र को मारक-लक्षण वाला कहा गया है।

    For Mesha lagna, Venus is marked as a maraka.

  19. [19]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    जीवशुक्रेन्दवः पापाः शुभौ शनिदिवाकरौ । राजयोगकरः सौरिर्बुधस्त्वल्पशुभप्रदः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 23

    वृषभ लग्न में शनि और सूर्य शुभ हैं और शनि राजयोग-कारक है।

    For Vrishabha lagna, Saturn and the Sun are benefic and Saturn gives rajayoga.

  20. [20]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    शशी मुखनिहन्ताऽसौ साहचर्याच्च पाकदः । द्वन्द्वलग्नोद्।ह्भवस्यैवं फलान्यूह्यानि पंडितैः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 26

    मिथुन लग्न में चंद्रमा मारक-लक्षण वाला है और साहचर्य से फल देता है।

    For Mithuna lagna, the Moon is marked as a maraka and gives results through association.

  21. [21]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    भार्गवेन्दुसुतौ पापौ भूसुतेज्येन्दवः शुभाः । पूर्णयोगकरः साक्षान्मंगलो मंगलप्रदः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 27

    कर्क लग्न में मंगल स्वयं योगकारक और शुभ फल देने वाला कहा गया है।

    For Karka lagna, Mars is the direct giver of yoga and auspiciousness.

  22. [22]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    सौम्यशुक्रार्कजाः पापाः कुजेज्यार्काः शुभावहाः । प्रभवेद्योगमात्रेण न शुभं गुरुशुक्रयोः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 29

    सिंह लग्न में मंगल, गुरु और सूर्य शुभ फल देने वाले कहे गए हैं।

    For Simha lagna, Mars, Jupiter and the Sun are auspicious.

  23. [23]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    सपापो देहपोऽष्टारिव्ययगो देहसौख्यहृत् । केन्द्रे कोणे स्थितोऽङ्गेशः सदा देहसुखं दिशेत्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 12 — तनुभावफल अध्याय · श्लोक 1

    पाप-युक्त लग्नेश छठे, आठवें या बारहवें में देहसुख घटाता है; केंद्र या त्रिकोण में सदा देहसुख देता है।

    The lagna lord with malefics in the 8th, 6th or 12th reduces bodily comfort; in a kendra or trikona it always grants it.

  24. [24]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    एक एव विलग्नेशः केन्द्रसंस्थो बलान्वितः । अरिष्टं निखिलं हन्ति पिनाकी त्रिपुरं यथा
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 10 — अरिष्टभंग अध्याय · श्लोक 4

    अकेला बलवान लग्नेश केंद्र में हो तो सब अरिष्ट नष्ट करता है।

    A single strong lagna lord in a kendra destroys all afflictions.

  25. [25]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    केन्द्राधिपतयः सौम्या ना दिशन्ति शुभं फलम् । क्रूरा नैवाऽशुभं कुर्युः शुभदाश्च त्रिकोणपाः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 — योगकारक अध्याय · श्लोक 2

    केंद्र के स्वामी शुभ ग्रह पूर्ण शुभ फल नहीं देते, क्रूर ग्रह अशुभ नहीं करते, और त्रिकोण के स्वामी शुभ फल देते हैं।

    Benefic lords of kendras do not give full good results; malefics do not give bad ones; lords of trikonas give auspicious results.

हर सन्दर्भ त्रिकाल वाणी ग्रंथ-पुस्तकालय या प्रतिष्ठित मुक्त स्रोत से मिलाया गया · व्याख्या: Rohiit Gupta, Chief Vedic Architect

Frequently Asked Questions

इस हब के सभी पेज

यह भी देखें · See also

श्रेणी: calculator-guide · lagna