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कन्या राशि का विवाह किस दिशा में होगा

Rohiit Gupta· Chief Vedic Architect15 min read

Trikaal Sandesh — Direct Answer

कन्या राशि का विवाह किस दिशा में होगा, यह केवल राशि से तय नहीं होता। फलदीपिका के अनुसार सप्तम भाव में बैठे ग्रह, सप्तमेश और शुक्र की राशि दिशा बताती है। मेष, सिंह, धनु पूर्व, वृषभ, कन्या, मकर दक्षिण, मिथुन, तुला, कुंभ पश्चिम और कर्क, वृश्चिक, मीन उत्तर की राशियाँ हैं।

Deep Dive Analysis

कन्या राशि का विवाह किस दिशा में होगा: सीधा जवाब

कन्या राशि वालों के विवाह की दिशा का कोई एक जवाब सब पर लागू नहीं होता, क्योंकि दिशा राशि से नहीं बल्कि कुंडली के सप्तम भाव से निकलती है। फलदीपिका के अनुसार सातवें भाव में बैठे ग्रह, सप्तमेश और शुक्र की राशि से जीवनसाथी की दिशा पढ़ी जाती है[1]। अगर केवल चंद्र राशि कन्या को आधार मानें तो सप्तम भाव मीन बनता है, जिसका संकेत उत्तर दिशा है। यह शुरुआती संकेत है, अंतिम उत्तर नहीं। विवाह के समय की पूरी विधि शादी कब होगी: कुंडली से विवाह का समय में है और इसी राशि का विस्तृत विश्लेषण कन्या राशि की शादी कब होगी में मिलेगा। अपना व्यक्तिगत नतीजा शादी कब होगी कैलकुलेटर से निकालें।

यह पेज क्या बताता है और क्या नहीं

यह पेज एक सीमित सवाल का उत्तर देता है: जीवनसाथी किस दिशा के संकेत से जुड़ा है। यह शहर, राज्य, जाति, नाम या अक्षर नहीं बताता, क्योंकि शास्त्र का श्लोक इतनी बारीकी तक नहीं जाता। लेख रोहित गुप्ता, मुख्य वैदिक आर्किटेक्ट ने पाराशरी पद्धति पर लिखा है और गोचर की तारीखें स्विस एफेमेरिस पर आधारित हैं। दिशा के साथ समय और मिलान भी समझना हो तो कुंडली में विवाह योग और कुंडली मिलान साथ में पढ़ें। सवाल अगर सीधे आपकी कुंडली का है तो विवाह के लिए ऑनलाइन ज्योतिषी वाला पेज रास्ता बताता है।

फलदीपिका का श्लोक 10.12 क्या कहता है

फलदीपिका के कलत्र भाव अध्याय का बारहवाँ श्लोक सीधे दिशा की बात करता है। उसका आशय है कि सप्तम भाव में स्थित ग्रह, सप्तम भाव का स्वामी और शुक्र, इन तीनों की राशि जातक की पत्नी की दिशा बताती है[1]। श्लोक का दूसरा आधा हिस्सा समय की बात करता है कि शुक्र या सप्तमेश जब लग्नेश के नवांश वाली राशि के त्रिकोण में आते हैं, तब विवाह का योग बनता है। यानी एक ही श्लोक दिशा और समय दोनों का सूत्र देता है। ध्यान रखें कि श्लोक में दिशा का अर्थ राशि की दिशा है, कोई नक्शे वाला कोण या किलोमीटर नहीं।

तीन संकेतक: सप्तम भाव का ग्रह, सप्तमेश और शुक्र

पहला संकेतक वह ग्रह है जो जन्म कुंडली के सप्तम भाव में बैठा हो। अगर वहाँ कोई ग्रह नहीं है तो यह संकेतक खाली रहता है और बाकी दो पर निर्भर रहना पड़ता है। दूसरा संकेतक सप्तमेश है, यानी सातवें भाव की राशि का स्वामी, और उसकी राशि जहाँ भी बैठी हो वही दिशा देती है। तीसरा संकेतक शुक्र है, जो पुरुष कुंडली में जीवनसाथी का कारक माना जाता है। तीनों की राशियाँ नीचे की तालिका से दिशा में बदलती हैं। अपना लग्न जानने के लिए लग्न कैलकुलेटर और भावों को समझने के लिए कुंडली के 12 भाव देखें। पूरी कुंडली पढ़ने का क्रम कुंडली कैसे देखें में दिया है।

राशि से दिशा की तालिका: चार दिशाओं में बारह राशियाँ

बारह राशियाँ चार दिशाओं में बँटी हैं और यह बँटवारा बृहत् पराशर होरा के राशिस्वरूप अध्याय में राशि के वर्णन के साथ आता है। मेष, सिंह और धनु पूर्व से जुड़ी हैं। वृषभ, कन्या और मकर दक्षिण से जुड़ी हैं। मिथुन, तुला और कुंभ पश्चिम से जुड़ी हैं। कर्क, वृश्चिक और मीन उत्तर से जुड़ी हैं। हर राशि का अलग श्लोक नीचे के खंडों में दिखाया गया है। कर्क के श्लोक में दिशा का शब्द नहीं आता, इसलिए उसे परंपरा से उत्तर माना गया है और यह बात आगे साफ लिखी है। अपनी राशि पहले राशि कैलकुलेटर से पक्की कर लें।

पूर्व दिशा की राशियाँ: मेष, सिंह और धनु

मेष राशि के वर्णन में उसे पूर्व में रहने वाली कहा गया है[2]। सिंह के श्लोक में उसे पूर्व दिशा का स्वामी कहा गया है[3]। धनु के लिए श्लोक की पहली पंक्ति में पूर्व में स्थित होने की बात है[4]। इसलिए अगर आपके सप्तम भाव का ग्रह, सप्तमेश या शुक्र इन तीन में से किसी राशि में है तो संकेत पूर्व का बनता है। पूर्व का मतलब व्यवहार में जन्मस्थान से उगते सूरज की ओर का इलाका माना जाता है, पर श्लोक शहर का नाम नहीं देता। इन राशियों में अग्नि तत्व साझा है, और ग्रहों का बल देखने के लिए कुंडली कैसे देखें का क्रम काम आता है।

दक्षिण दिशा की राशियाँ: वृषभ, कन्या और मकर

वृषभ के श्लोक में उसे दक्षिण दिशा का स्वामी कहा गया है[5]। कन्या के श्लोक में उसे दक्षिण की ओर चलने वाली राशि लिखा है[6]। मकर का वर्णन धनु वाले श्लोक की दूसरी पंक्ति में आता है और उसमें भी दक्षिण का शब्द है[4]। इन तीनों राशियों में पृथ्वी तत्व साझा है। इसलिए सप्तम का ग्रह, सप्तमेश या शुक्र अगर इनमें से किसी राशि में हो तो संकेत दक्षिण का बनता है। ध्यान रहे कि कन्या राशि स्वयं दक्षिण की राशि है, पर कन्या राशि वाले का जीवनसाथी इसी कारण दक्षिण का नहीं हो जाता, क्योंकि गिनती सप्तम भाव से होती है।

पश्चिम दिशा की राशियाँ: मिथुन, तुला और कुंभ

मिथुन के श्लोक में उसे पश्चिम और वायु तत्व से जुड़ा बताया गया है[7]। तुला के लिए श्लोक सीधे उसे पश्चिम का कहता है[8]। कुंभ के बारे में श्लोक उसे पश्चिम देश का स्वामी बताता है[9]। इन तीनों में वायु तत्व साझा है। सप्तम का ग्रह, सप्तमेश या शुक्र अगर मिथुन, तुला या कुंभ में हो तो संकेत पश्चिम का माना जाता है। मिलान की बात आए तो पश्चिम के संकेत में भी कुंडली मिलान उतना ही जरूरी है, क्योंकि दिशा केवल पहला फिल्टर है और गुण मिलान उसके बाद का।

उत्तर दिशा की राशियाँ: कर्क, वृश्चिक और मीन

वृश्चिक का वर्णन करने वाले श्लोक में सौम्य दिशा में स्थित होने का शब्द है, और सौम्य का अर्थ उत्तर दिशा है[10]। मीन के श्लोक में भी यही शब्द मिलता है[11]। कर्क के श्लोक में कोई दिशा नहीं लिखी, इसलिए उसे जल तत्व वाली राशि होने के नाते परंपरा से उत्तर में गिना जाता है और यह श्लोक का सीधा कथन नहीं है। तीनों राशियाँ जल तत्व की हैं। कन्या के लिए सप्तम भाव मीन है, इसलिए सबसे पहला संकेत इसी समूह यानी उत्तर का बनता है, जिसे अगले खंड में खोला गया है।

कन्या के लिए सप्तम भाव मीन: उत्तर का पहला संकेत

कन्या को चंद्र राशि मानकर गिनें तो पहला भाव कन्या, सातवाँ भाव मीन आता है। मीन उत्तर वाली राशि है, इसलिए चंद्र कुंडली के हिसाब से जीवनसाथी का पहला संकेत उत्तर की ओर जाता है[11]। यह इसलिए सिर्फ शुरुआती संकेत है कि फलदीपिका का सूत्र जन्म कुंडली के सप्तम भाव पर चलता है, जबकि चंद्र राशि गोचर देखने का आधार है[14]। अगर आपका लग्न भी कन्या है तो दोनों कुंडलियों का सप्तम एक ही बनता है और संकेत मजबूत होता है। अगर लग्न अलग है तो लग्न कुंडली का सप्तम निर्णायक रहेगा। राशि का स्वभाव कन्या राशि: स्वभाव, स्वामी ग्रह और विशेषताएँ में पढ़ें और अपनी राशि नाम से राशि वाले पेज से भी जाँच सकते हैं।

सप्तमेश गुरु: मीन और धनु, यानी उत्तर और पूर्व

कन्या के लिए सप्तम भाव मीन है और उसका स्वामी गुरु है। गुरु की अपनी दो राशियाँ हैं, मीन और धनु। इसलिए सप्तमेश की स्थिति के हिसाब से संकेत उत्तर या पूर्व दोनों ओर जा सकता है, पर असली दिशा वही होगी जिस राशि में गुरु जन्म कुंडली में बैठा है। मान लें गुरु धनु में है तो पूर्व का संकेत मिलेगा, मीन में है तो उत्तर का, और कर्क में है तो परंपरा से उत्तर का। इस सूत्र में सप्तमेश उसी राशि की दिशा देता है जहाँ वह स्थित है, अपनी मूल राशि की नहीं[1]। गुरु की दशा का स्वभाव गुरु महादशा पेज में समझाया गया है।

शुक्र की राशि: तीसरा संकेतक कैसे पढ़ें

शुक्र का संकेत सबसे आसान है, क्योंकि उसकी राशि जन्म कुंडली में सीधे दिख जाती है। अगर शुक्र मेष, सिंह या धनु में है तो पूर्व, वृषभ, कन्या या मकर में है तो दक्षिण, मिथुन, तुला या कुंभ में है तो पश्चिम, और कर्क, वृश्चिक या मीन में है तो उत्तर का संकेत मिलता है[1]। शुक्र का अस्त होना या वक्री होना दिशा की गिनती नहीं बदलता, पर उसकी ताकत घटाकर संकेत को हल्का कर देता है। शुक्र की दशा में विवाह के योग कैसे बनते हैं, यह शुक्र अंतर्दशा और विवाह योग में है। जन्म विवरण से ग्रहों की राशि जन्म कुंडली कैलकुलेटर से निकलती है।

तीनों संकेत अलग दिशा दिखाएँ तो क्या करें

कई कुंडलियों में तीनों संकेतक अलग दिशाओं में निकलते हैं। फलदीपिका का श्लोक ऐसी स्थिति में कोई क्रम तय नहीं करता, वह तीनों का नाम एक साथ लेता है[1]। व्यवहार में ज्योतिषी देखते हैं कि कौन सा संकेतक अपने घर या उच्च राशि में बलवान है और कौन अस्त, नीच या पाप ग्रह से पीड़ित है। मान लें सप्तम का ग्रह पश्चिम में है पर सप्तमेश और शुक्र दोनों उत्तर में हैं, तब उत्तर का पलड़ा भारी माना जाता है। अगर तीनों बराबर तौलें तो एक दिशा के बजाय दो दिशाएँ खुली रखें। यह निर्णय कुंडली देखकर ही होता है, इसलिए अपनी स्थिति सप्तम भाव कमजोर होने के कारण से भी मिलाएँ।

अगर सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो तो दिशा कैसे निकले

बहुत सी कुंडलियों में सातवें घर में कोई ग्रह नहीं बैठा होता और इससे घबराने की कोई बात नहीं है। उस हालत में तीन में से दो संकेतक बचते हैं, सप्तमेश और शुक्र, और इन्हीं दोनों की राशि से दिशा पढ़ी जाती है[1]। अगर दोनों एक ही दिशा में पड़ें तो संकेत साफ और मजबूत माना जाता है। अगर दोनों अलग पड़ें तो दोनों दिशाएँ संभावित रखी जाती हैं और बल देखकर तौल की जाती है। खाली सप्तम भाव को विवाह में रुकावट समझना भी गलत है, क्योंकि फल भाव के स्वामी की स्थिति से तय होता है। रुकावट वाले योगों की सूची कुंडली में विवाह योग में दी गई है।

दिशा किससे नापें: जन्मस्थान, घर या वर्तमान शहर

फलदीपिका का श्लोक दिशा तो बताता है पर यह नहीं बताता कि नापना कहाँ से है[1]। व्यवहार में जन्मस्थान को आधार माना जाता है, क्योंकि कुंडली उसी स्थान और समय की बनती है। अगर आप जन्म के शहर से दूर रहते हैं तो पहले जन्मस्थान से दिशा देखें और फिर यह मिलान करें कि वर्तमान निवास से वह दिशा कितनी अलग पड़ती है। नापने का सरल तरीका यह है कि नक्शे पर जन्मस्थान से चारों दिशाओं में चार हिस्से बना लें और संकेत वाले हिस्से के शहर और कस्बे अलग लिख लें। दूरी यहाँ मायने नहीं रखती, इसलिए पड़ोसी मोहल्ला भी उसी दिशा में गिना जा सकता है।

चार दिशाएँ ही क्यों: उत्तर-पूर्व जैसे कोने का सवाल

लोग अक्सर पूछते हैं कि उत्तर-पूर्व या दक्षिण-पश्चिम जैसी दिशा क्यों नहीं मिलती। कारण यह है कि राशियों का बँटवारा चार मुख्य दिशाओं में है और बृहत् पराशर के राशि वर्णन में भी पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर ही आते हैं, जहाँ उत्तर के लिए सौम्य शब्द मिलता है। कोने की दिशा तब निकलती है जब दो संकेतक अलग मुख्य दिशाएँ दिखाएँ, जैसे एक पूर्व और दूसरा उत्तर। तब मोटे तौर पर उत्तर-पूर्व का इलाका बनता है, पर वह एक मिलाजुला पढ़ना है, श्लोक का सीधा कथन नहीं। इस मिलाजुले संकेत को पक्की भविष्यवाणी की तरह न लें। उसे केवल यह मानें कि दोनों ओर रिश्ते आने की संभावना खुली है।

स्त्री की कुंडली में जीवनसाथी की दिशा कैसे पढ़ें

फलदीपिका का श्लोक पुरुष जातक की पत्नी की दिशा की बात करता है[1]। स्त्री की कुंडली में परंपरा यही तर्क पति पर लागू करती है, यानी सप्तम भाव का ग्रह, सप्तमेश और राशि की दिशा देखी जाती है। फर्क इतना रहता है कि कारक ग्रह के रूप में शुक्र की जगह गुरु को देखने की रीति भी चलती है, और यह रीति परंपरा की है, इस श्लोक की नहीं। कन्या राशि की कन्याओं के लिए भी चंद्र कुंडली में मीन का सप्तम उत्तर की ओर संकेत देता है, पर निर्णय लग्न कुंडली से ही होगा। विवाह के समय को शादी कब होगी में देखें।

प्रेम विवाह में दिशा का सवाल

जब पसंद पहले से तय हो तो दिशा का सवाल उलटा हो जाता है। तब व्यक्ति पूछता है कि जो साथी चुना है वह कुंडली की दिशा से मेल खाता है या नहीं। यहाँ दिशा को वीटो की तरह न रखें, क्योंकि श्लोक संकेत देता है और किसी रिश्ते को रद्द करने का अधिकार नहीं देता। ज्यादा काम की बात यह देखना है कि सप्तम भाव और पंचम भाव का संबंध कैसा है और दोनों कुंडलियाँ कैसे मिलती हैं। इसके लिए प्रेम विवाह और कुंडली मिलान पढ़ें और रास्ते का सवाल प्रेम विवाह या अरेंज मैरिज में देखें। निःशुल्क जाँच प्रेम या अरेंज मैरिज कैलकुलेटर पर उपलब्ध है।

दिशा का मतलब विदेश नहीं होता

कई लोग उत्तर या पश्चिम का संकेत देखकर मान लेते हैं कि जीवनसाथी विदेश का होगा। यह जोड़ गलत है, क्योंकि राशि की दिशा केवल जन्मस्थान के सापेक्ष इलाका बताती है, देश नहीं। विदेश या दूसरे प्रदेश के रिश्ते का सवाल अलग योगों से देखा जाता है, जिनकी चर्चा विदेशी जीवनसाथी और विवाह और फॉरेन स्पाउस प्रेडिक्शन में है। अगर आप सीधी जाँच चाहते हैं तो फॉरेन स्पाउस कैलकुलेटर देखें। तब तक दिशा के संकेत को केवल इलाके का संकेत मानें और शादी तय करने से पहले परिवार और पृष्ठभूमि का मिलान जरूर करें।

मांगलिक स्थिति और दिशा को अलग रखें

दिशा और मंगल दोष दो अलग सवाल हैं और एक का उत्तर दूसरे को नहीं बदलता। मंगल सप्तम में हो तो भी दिशा का हिसाब वही रहेगा जो ऊपर बताया गया, यानी उस घर में बैठे ग्रह की राशि से। मंगल की स्थिति केवल यह तय करती है कि मिलान में किन बातों का ध्यान रखना है, और इस पर विस्तार से मंगल दोष सप्तम भाव में और मांगलिक और गैर-मांगलिक विवाह में लिखा है। आंशिक स्थिति समझने के लिए आंशिक मांगलिक दोष पढ़ें। निःशुल्क जाँच मांगलिक दोष कैलकुलेटर पर करें।

विवाह कब होगा: फलदीपिका का समय सूत्र

दिशा के बाद दूसरा सवाल समय का है और फलदीपिका उसका भी सूत्र देती है। श्लोक 13 कहता है कि सप्तम भाव में बैठे ग्रह, सप्तम को देखने वाले ग्रह या सप्तमेश की दशा आने पर जब लग्नेश गोचर में सप्तम भाव में पहुँचता है, तब जीवनसाथी का लाभ होता है[12]। इसका मतलब है कि पहले दशा का दरवाजा खुलना चाहिए और फिर गोचर का ताला। केवल एक से बात नहीं बनती। दशा निकालने की विधि विंशोत्तरी दशा कैसे निकालें और प्रत्यंतर दशा कैसे निकालें में दी गई है। अपनी दशा दशा कैलकुलेटर से निकालें।

गुरु का ग्यारहवें भाव कर्क में गोचर: 31 अक्टूबर 2026 तक

गोचर का हिसाब चंद्र राशि से होता है, इसलिए कन्या राशि वालों के लिए कर्क ग्यारहवाँ भाव है[14]। फलदीपिका के अनुसार गुरु दूसरे, पाँचवें, सातवें और नौवें भाव में शुभ फल देता है और ग्यारहवाँ भाव सभी ग्रहों के लिए अनुकूल गिना गया है[15]। गुरु 31 अक्टूबर 2026 तक कर्क में है, इसलिए इस अवधि को रिश्ते की बातचीत शुरू करने के लिए अनुकूल पृष्ठभूमि माना जा सकता है। पर यह केवल पृष्ठभूमि है, क्योंकि विवाह तभी बनता है जब दशा भी साथ दे। गुरु के पूरे वर्ष के चक्र के लिए गुरु गोचर 2027 और आपकी राशि के लिए कन्या राशि गुरु गोचर पढ़ें।

गुरु का सिंह में जाना और कर्क में वापसी

गुरु 31 अक्टूबर 2026 को सिंह में जाता है, जो कन्या के लिए बारहवाँ भाव है। 13 दिसंबर 2026 से गुरु वक्री होता है और 25 जनवरी 2027 को वापस कर्क में लौट आता है। इस पूरे चरण में बात आगे बढ़ाने के बजाय परिवार की तैयारी और जानकारी जुटाने पर ध्यान रखना ठीक रहता है। कर्क में गुरु 13 अप्रैल 2027 को मार्गी होता है और 26 जून 2027 तक वहीं रहता है। फलदीपिका का श्लोक 14 गुरु को सप्तमेश के नवांश के त्रिकोण में आने पर करग्रहण यानी विवाह का सूचक कहता है[13]। इसलिए जनवरी से जून 2027 की खिड़की के लिए अपना नवांश जाँचना जरूरी है। ये तारीखें Swiss Ephemeris (लाहिरी) से ली गई हैं।

शनि का सातवें भाव मीन में गोचर: 3 जून 2027 तक

कन्या राशि से मीन सातवाँ भाव है और शनि अभी वक्री अवस्था में मीन में है। वह 11 दिसंबर 2026 को मार्गी होता है और 3 जून 2027 को मेष में प्रवेश करता है। फलदीपिका के श्लोक में शनि के सातवें भाव के फल में स्त्री के रोग, यात्रा और भय का उल्लेख है[16]। इसे डर की तरह नहीं बल्कि सावधानी की सूचना की तरह पढ़ें, यानी जल्दबाजी, स्वास्थ्य की जाँच और यात्रा की योजना पर ध्यान रखने की बात। सातवें भाव पर शनि का होना विलंब भी करा सकता है और टिकाऊ रिश्ता भी बना सकता है। विस्तार के लिए शनि गोचर 2027 और शनि गोचर की तारीखें देखें। सरल सहारा यह है कि शनिवार शाम को दीपक जलाने का नियम उपाय 2 में दिया है और उसमें न कोई बड़ा खर्च है न कोई डर।

शनि का आठवें भाव मेष में प्रवेश: 3 जून 2027 से

3 जून 2027 से शनि मेष में आता है, जो कन्या के लिए आठवाँ भाव है। फलदीपिका के श्लोक में आठवें भाव के शनि के साथ हानि और रोग की सूचना है[16], इसलिए इस दौर में बड़ी खरीदारी या जल्दबाजी वाले निर्णय टालना समझदारी है। शनि 9 अगस्त 2027 को वक्री होकर 20 अक्टूबर 2027 को मीन में लौट आता है और 24 दिसंबर 2027 को मार्गी होता है। वह फिर 23 फरवरी 2028 को मेष में जाता है। इस चाल का रिश्तों पर असर मेष में शनि नीच 2027 और शनि गोचर 2027 का पूरा मार्गदर्शन में समझाया गया है। इसकी सीमा यह है कि 26 जून 2027 तक गुरु कर्क में ग्यारहवें भाव से साथ देता है, और शनिवार का दीपक जैसा हल्का नियम उपाय 2 में बताया है।

राहु-केतु का 5 दिसंबर 2026 का बदलाव

राहु 5 दिसंबर 2026 को मकर में जाता है और केतु कर्क में, और यह स्थिति 24 जून 2028 तक चलती है। कन्या राशि से मकर पाँचवाँ और कर्क ग्यारहवाँ भाव है। पाँचवाँ भाव प्रेम और संतान का घर है और ग्यारहवाँ भाव इच्छा की पूर्ति का। इसलिए इस दौर में पसंद और परिवार के बीच तालमेल बिठाना मुख्य काम रहता है। दिशा के संकेत पर राहु-केतु का सीधा असर नहीं बदलता, वे केवल समय के रंग को प्रभावित करते हैं। इसका विस्तृत विश्लेषण राहु-केतु गोचर 2027 और राहु-केतु गोचर 2026 का प्यार और रिश्तों पर असर में पढ़ें।

2026-27 की संभावित खिड़कियाँ: कब बात आगे बढ़ती है

चारों ग्रहों को साथ रखें तो चार चरण दिखते हैं। अभी से 31 अक्टूबर 2026 तक गुरु कर्क में ग्यारहवें भाव में है और शनि सातवें भाव में वक्री है। 31 अक्टूबर 2026 से 25 जनवरी 2027 तक गुरु सिंह में बारहवें भाव में है, इसलिए यह तैयारी का चरण माना जा सकता है। 25 जनवरी से 3 जून 2027 तक गुरु कर्क में लौट चुका है और शनि मीन में है, जिसमें शनि 11 दिसंबर 2026 से मार्गी है। 3 जून से 26 जून 2027 तक गुरु कर्क में है और शनि मेष में पहुँच गया है। इनमें से कोई भी चरण अपने आप विवाह नहीं कराता, क्योंकि पहले दशा का साथ चाहिए। इसलिए अपनी दशा के साथ मिलाकर ही खिड़की चुनें।

विवाह मुहूर्त कैसे देखें: तारीख तय करने से पहले

दिशा और समय तय होने के बाद तारीख का सवाल आता है। मुहूर्त की तारीख दिशा या राशि से नहीं बल्कि पंचांग से तय होती है, इसलिए इन्हें अलग रखें। नवंबर 2026 के लिए नवंबर 2026 विवाह मुहूर्त, दिसंबर के लिए दिसंबर 2026 विवाह मुहूर्त, जनवरी के लिए जनवरी 2027 विवाह मुहूर्त और फरवरी के लिए फरवरी 2027 विवाह मुहूर्त देखें। पूरे साल की सूची विवाह मुहूर्त 2027 पर है और तारीख चुनने का तरीका विवाह मुहूर्त 2027 कैसे चुनें में है। अपने लिए तारीख शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर से निकालें।

उपाय 1: गुरुवार को पीले फूल, सप्तमेश गुरु के लिए

क्या करना है: घर के मंदिर में पीले फूल चढ़ाएँ और एक मिनट शांत बैठकर गुरु का ध्यान करें। कब: गुरुवार सुबह सूर्योदय के बाद। कितने का: दस से बीस रुपये के फूल। कितने दिन: लगातार ग्यारह गुरुवार। आपके लिए क्यों: कन्या चंद्र राशि के लिए सातवें भाव मीन का स्वामी गुरु है, और यह उपाय उसी घर के कारक से रिश्ता बनाए रखने का सरल तरीका है। यह कोई गारंटी नहीं बल्कि नियम और ध्यान की आदत है, और शादी की बातचीत के साथ चलने वाला सहायक कदम है। अपने लिए विशिष्ट उपाय उपाय कैलकुलेटर से देखें।

उपाय 2: शनिवार शाम का दीपक, सातवें भाव के शनि के लिए

क्या करना है: घर के बाहर या तुलसी के पास सरसों के तेल का एक दीया जलाएँ। कब: शनिवार शाम सूर्यास्त के समय। कितने का: लगभग दस रुपये का तेल और बाती। कितने दिन: नौ शनिवार। आपके लिए क्यों: कन्या चंद्र राशि से शनि 3 जून 2027 तक सातवें भाव में है, और यह घर जीवनसाथी का है, इसलिए शनि के लिए एक छोटा शांत नियम रखना उपयोगी है। यह दीपक सावधानी का हिस्सा है, डर का इलाज नहीं। उम्र, काम और परिवार की स्थिति के हिसाब से यह नियम आसानी से निभ जाए, यही इसकी कसौटी है। शनि की दशा समझने के लिए शनि महादशा पढ़ें।

उपाय की सीमा: रत्न पहला कदम नहीं

दिशा पढ़ने के बाद अक्सर लोग सीधे रत्न की ओर भागते हैं, जो सही तरीका नहीं है। रत्न महँगा होता है और गलत रत्न का नुकसान असली होता है, इसलिए उसे पहला कदम न बनाएँ। पहले ऊपर बताए छोटे नियम निभाएँ, कुंडली की जाँच कराएँ और फिर अगर रत्न का सवाल रह जाए तो उसकी उपयुक्तता जाँचें। निःशुल्क जाँच के लिए रत्न उपयुक्तता कैलकुलेटर है। साथ ही रोज घंटों के पाठ जैसा कोई भारी नियम न लें, क्योंकि जो निभाया न जा सके वह उपाय नहीं बोझ है। यह लेख आपकी कुंडली की जगह नहीं लेता, केवल पढ़ने का तरीका बताता है।

मिथक और सच: कन्या राशि, दिशा और विवाह

पहला मिथक है कि कन्या राशि दक्षिण की राशि है, इसलिए जीवनसाथी दक्षिण का ही होगा। सच यह है कि गिनती सप्तम भाव से होती है, राशि से नहीं[1]। दूसरा मिथक है कि दिशा मिल गई तो मिलान की जरूरत नहीं। सच यह है कि दिशा केवल पहला संकेत है और गुण और मंगल का मिलान अलग काम है, जिसे 36 गुण मिलान में समझाया गया है। तीसरा मिथक है कि मंगल दोष है तो दिशा बदल जाएगी। सच यह है कि दोनों अलग सवाल हैं, जैसा क्या मंगल दोष असली है में बताया है। चौथा मिथक है कि श्लोक शहर बताता है। श्लोक केवल राशि की दिशा बताता है।

आज क्या करें: तीन कदम और अपनी दिशा निकालें

पहला कदम है जन्म विवरण से अपनी कुंडली बनाना और लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र की राशि लिख लेना। दूसरा कदम है ऊपर की तालिका से तीनों की दिशा निकालना और जहाँ दो मिलें वही मुख्य संकेत मानना। तीसरा कदम है अपनी दशा और 2027 की गोचर खिड़की को साथ रखकर समय का अनुमान लगाना। कुंडली के नतीजों में शंका हो तो नाम से कुंडली मिलान और जन्म तारीख से कुंडली मिलान भी देखें। पूरी विश्लेषण-योजना के लिए विवाह पेज पर जाएँ और अपनी शादी का समय निःशुल्क जाँचें।

Apna Personalized Analysis Lein

Yeh article general framework hai. Aapke specific chart ke according detailed analysis ke liye:

शब्दावली · Glossary

सप्तम भाव
कुंडली का सातवाँ घर, जो जीवनसाथी, विवाह और साझेदारी का भाव है।
सप्तमेश
सातवें भाव की राशि का स्वामी ग्रह, जिसकी स्थिति विवाह के समय और दिशा का संकेत देती है।
ऋक्ष
राशि का संस्कृत नाम। श्लोक में किसी ग्रह का ऋक्ष वह राशि है जिसमें वह बैठा है।
चंद्र राशि
जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में था। गोचर का फल इसी से गिना जाता है।
गोचर
ग्रहों की आज की चाल, जिसे जन्म की चंद्र राशि से गिनकर समय का फल देखा जाता है।
नवांश
राशि का नौवाँ हिस्सा। विवाह की गहराई और समय नवांश कुंडली से परखे जाते हैं।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

इस लेख के हर नियम का मूल स्रोत — ग्रंथ, अध्याय और श्लोक संख्या के साथ।

  1. [1]↑फलदीपिकाफलदीपिका · Mantreshwara
    कामस्थकामाधिपभार्गवानामृक्षं दिशं शंसति तस्य पत्न्याः । शुक्रोऽस्तपो वा तनुनाथभांशकत्रिकोणमायाति तदा विवाहः ॥१२॥
    — फलदीपिका, अध्याय 10 — कलत्रभावो नाम दशमोऽध्यायः · श्लोक 12

    सप्तम भाव में स्थित ग्रह, सप्तमेश और शुक्र की राशि जातक की पत्नी की दिशा बताती है। शुक्र या सप्तमेश के लग्नेश के नवांश की राशि के त्रिकोण में आने पर विवाह का योग बनता है।

    The sign of the planet in the 7th house, of the 7th lord and of Venus shows the direction of the native wife. Venus or the 7th lord reaching a trine of the lagna lord navamsha sign brings marriage.

  2. [2]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    पूर्ववासी नृपज्ञातिः शैलचारी रजोगुणी । पृष्ठोदयी पावकी च मेषराशिः कुजाधिपः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 7

    मेष राशि का वर्णन पूर्व में रहने वाली राशि के रूप में है।

    Aries is described as the sign that dwells in the east.

  3. [3]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    सिंहः सूर्याधिपः सत्त्वी चतुष्पात् क्षत्रियो वनी । शीर्षोदयी बृहद्।ह्गात्रःपाण्डुः पूर्वेड् द्युवीर्यवान्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 12

    सिंह राशि का वर्णन पूर्व दिशा के स्वामी के रूप में है।

    Leo is described as lord of the east direction.

  4. [4]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    पूर्वस्थो वसुधाचारी तेजस्वी ब्रह्मणा कृतः । मन्दाधिपस्तमी भौमी याम्येट् च निशि वीर्यवान्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 19

    धनु राशि पूर्व में स्थित और मकर राशि दक्षिण दिशा की स्वामी बताई गई है।

    Sagittarius is described as eastern and Capricorn as lord of the south direction.

  5. [5]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    श्वेतः शुक्राधिपो दीर्घश्चतुष्पाच्छर्वरीबली । याम्येट् ग्राम्यो वणिग्भूमिरजः पृष्ठोदयो वृषः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 8

    वृषभ राशि का वर्णन दक्षिण दिशा के स्वामी के रूप में है।

    Taurus is described as lord of the south direction.

  6. [6]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    पार्वतीयाथ कन्याख्या राशिर्दिनबलान्विता । शीर्षोदया च मध्याङ्गा द्विपाद्याम्यचरा च सा
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 13

    कन्या राशि का वर्णन दक्षिण की ओर चलने वाली राशि के रूप में है।

    Virgo is described as a sign that moves in the south.

  7. [7]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    शीर्षोदयी नृमिथुनं सगदं च सवीणकम् । प्रत्यग्।ह्वायुर्द्विपाद्रात्रिबली ग्रामव्रजोऽनिली
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 9

    मिथुन राशि का वर्णन पश्चिम और वायु तत्व से जुड़ी राशि के रूप में है।

    Gemini is described as western and airy.

  8. [8]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    शीर्षोदयी द्युवीर्याढ्यस्तुलः कृष्णो रजोगुणी । पश्चिमो भूचरो घाती शूद्रो मध्यतनुर्द्विपात्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 15

    तुला राशि का वर्णन पश्चिम की राशि के रूप में है।

    Libra is described as the western sign.

  9. [9]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    शूद्रः पश्चिमदेशस्य स्वामी दैवाकरिः स्मृतः । मीनौ पुच्छास्यसंलग्नौ मीनराशिर्दिवाबली
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 22

    कुंभ राशि का वर्णन पश्चिम देश के स्वामी के रूप में है।

    Aquarius is described as lord of the western region.

  10. [10]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    शुक्राऽधिपोऽथ स्वल्पाङ्गो बहुपाद्।ह्ब्राह्मणो बिली । सौम्यस्थो दिनवीर्याढ्यः पिशङ्गो जलभूवहः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 16

    वृश्चिक के वर्णन में सौम्य दिशा में स्थित होने का शब्द है, और सौम्य का अर्थ उत्तर है।

    The description of Scorpio places it in the saumya direction, which is the north.

  11. [11]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    जली सत्त्वगुणाढ्यश्च स्वस्थो जलचरो द्विजः । अपदो मध्यदेही च सौम्यस्थो ह्युभयोदयी
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 4 — राशिस्वरूपाध्याय · श्लोक 23

    मीन के वर्णन में सौम्य दिशा में स्थित होने का शब्द है, और सौम्य का अर्थ उत्तर है।

    The description of Pisces places it in the saumya direction, which is the north.

  12. [12]↑फलदीपिकाफलदीपिका · Mantreshwara
    कलत्रसंस्थस्य कलत्रदृष्टेर्दशागमे वाथ कलत्रपस्य । यदा विलग्नाधिपतिः प्रयाति कलत्रभं तत्र कलत्रलाभः ॥१३॥
    — फलदीपिका, अध्याय 10 — कलत्रभावो नाम दशमोऽध्यायः · श्लोक 13

    सप्तम में स्थित या उसे देखने वाले ग्रह अथवा सप्तमेश की दशा में जब लग्नेश गोचर में सप्तम भाव में जाता है, तब जीवनसाथी का लाभ होता है।

    In the dasha of the planet in or aspecting the 7th house or of the 7th lord, marriage is gained when the lagna lord transits the 7th house.

  13. [13]↑फलदीपिकाफलदीपिका · Mantreshwara
    कलत्रनाथस्थितभांशकेशयोः सितक्षपानायकयोर्बलीयसः । दशागमे द्यूनपयुक्तभांशकत्रिकोणगे देवगुरौ करग्रहः ॥१४॥
    — फलदीपिका, अध्याय 10 — कलत्रभावो नाम दशमोऽध्यायः · श्लोक 14

    संबंधित नवांश स्वामियों में बलवान की दशा में जब गुरु सप्तमेश से युक्त नवांश राशि के त्रिकोण में गोचर करता है, तब विवाह होता है।

    In the dasha of the stronger of the relevant navamsha lords, marriage happens when Jupiter transits a trine of the navamsha sign joined by the 7th lord.

  14. [14]↑फलदीपिकाफलदीपिका · Mantreshwara
    सर्वेषु लग्नेष्वपि सत्सु चन्द्रलग्नं प्रधानं खलु गोचरेषु । तस्मात्तदृक्षादपि वर्तमानग्रहेन्द्रचारैः कथयेत्फलानि ॥१॥
    — फलदीपिका, अध्याय 26 — गोचारफलनिर्णयाध्याय · श्लोक 1

    गोचर के फल में चंद्र राशि प्रधान है, और उसी राशि से चल रहे ग्रहों के आधार पर फल कहे जाते हैं।

    For transit results the Moon sign is primary, and results are told from the Moon sign by the planets currently moving.

  15. [15]↑फलदीपिकाफलदीपिका · Mantreshwara
    सूर्यः षट्त्रिदशस्थितस्त्रिदशषट्सप्ताद्यगश्चन्द्रमाः जीवस्त्वस्ततपोद्विपञ्चमगतो वक्रार्कजौ षट्त्रिगौ । सौम्यः षट्स्वचतुर्दशाष्टमगतः सर्वेऽप्युपान्त्यस्थिताः शुक्रः खास्तरिपून्विहाय शुभदस्तिग्मांशुवद्भोगिनौ ॥२॥
    — फलदीपिका, अध्याय 26 — गोचारफलनिर्णयाध्याय · श्लोक 2

    चंद्र राशि से गुरु दूसरे, पाँचवें, सातवें और नौवें भाव में अनुकूल है और ग्यारहवाँ भाव सभी ग्रहों के लिए अनुकूल है।

    Jupiter is favourable in the 2nd, 5th, 7th and 9th houses from the Moon, and all planets are favourable in the 11th.

  16. [16]↑फलदीपिकाफलदीपिका · Mantreshwara
    रोगाशौचक्रियाप्तिं धनसुतविहतिं स्थानभृत्यार्थलाभं स्त्रीबन्ध्वर्थप्रणाशं द्रविणसुतमतिप्रच्युतिं सर्वसौख्यम् । स्त्रीरोगाध्वावभीतिं स्वसुतपशुसुहृद्वित्तनाशामयार्तिं जन्मादेरष्टमान्तं दिशति पदवशेनार्कसूनुः क्रमेण ॥२२॥
    — फलदीपिका, अध्याय 26 — गोचारफलनिर्णयाध्याय · श्लोक 22

    चंद्र राशि से शनि के फल भाव के अनुसार हैं: सातवें में स्त्री के रोग, यात्रा और भय, और आठवें में हानि और रोग का उल्लेख है।

    Saturn results from the Moon by house: the 7th brings concern for the wife health, travel and fear, and the 8th brings loss and illness.

हर सन्दर्भ त्रिकाल वाणी ग्रंथ-पुस्तकालय या प्रतिष्ठित मुक्त स्रोत से मिलाया गया · व्याख्या: Rohiit Gupta, Chief Vedic Architect

Frequently Asked Questions

कन्या राशि का विवाह किस दिशा में होगा?

कन्या राशि का विवाह किस दिशा में होगा, यह राशि से नहीं बल्कि जन्म कुंडली के सप्तम भाव से तय होता है। फलदीपिका के अनुसार सप्तम में बैठे ग्रह, सप्तमेश और शुक्र की राशि की दिशा देखी जाती है। चंद्र राशि कन्या से सप्तम मीन बनता है, जो उत्तर का पहला संकेत देता है।

कुंडली में जीवनसाथी की दिशा कैसे देखते हैं?

सबसे पहले जन्म कुंडली में सप्तम भाव का ग्रह, सप्तमेश और शुक्र की राशि देखें। फिर हर राशि को उसकी दिशा में बदलें, यानी मेष, सिंह, धनु पूर्व, वृषभ, कन्या, मकर दक्षिण, मिथुन, तुला, कुंभ पश्चिम और कर्क, वृश्चिक, मीन उत्तर। जहाँ दो या तीन संकेत मिलें वही मुख्य दिशा मानी जाती है।

क्या कन्या राशि वालों का जीवनसाथी दक्षिण दिशा का होता है?

नहीं, यह आम गलतफहमी है। कन्या राशि स्वयं दक्षिण की राशि है, पर जीवनसाथी की दिशा सप्तम भाव से गिनी जाती है। चंद्र राशि के हिसाब से कन्या का सप्तम मीन है, जो उत्तर की राशि है। अंतिम उत्तर लग्न कुंडली के सप्तम भाव से आता है।

कन्या राशि का सप्तमेश कौन है और वह कौन सी दिशा देता है?

चंद्र राशि कन्या के लिए सप्तम भाव मीन है और उसका स्वामी गुरु है। गुरु की दिशा उस राशि से बनती है जिसमें वह जन्म कुंडली में बैठा हो। धनु में हो तो पूर्व, मीन में हो तो उत्तर और कर्क में हो तो परंपरा से उत्तर का संकेत मिलता है।

अगर तीनों संकेत अलग दिशाएँ दिखाएँ तो क्या करें?

फलदीपिका का श्लोक कोई क्रम नहीं बताता, इसलिए व्यवहार में बल देखा जाता है। जो संकेतक अपने घर या उच्च राशि में है वह भारी माना जाता है और जो अस्त, नीच या पीड़ित है वह हल्का। बराबरी में दोनों दिशाएँ खुली रखें और कुंडली देखकर तौल करें।

क्या उत्तर या पश्चिम दिशा का मतलब विदेश में विवाह है?

नहीं, राशि की दिशा केवल जन्मस्थान के सापेक्ष इलाका बताती है, देश नहीं। विदेश या दूसरे प्रदेश का रिश्ता अलग योगों से देखा जाता है। दिशा को केवल इलाके का संकेत मानें और बाकी बातों के लिए कुंडली का पूरा विश्लेषण कराएँ।

दिशा किस स्थान से नापें, जन्मस्थान से या वर्तमान शहर से?

श्लोक यह स्पष्ट नहीं करता, पर कुंडली जन्मस्थान की बनती है, इसलिए व्यवहार में जन्मस्थान को आधार माना जाता है। नक्शे पर जन्मस्थान से चार हिस्से बनाएँ और संकेत वाले हिस्से के इलाके अलग लिख लें। दूरी मायने नहीं रखती।

स्त्री की कुंडली में जीवनसाथी की दिशा कैसे पढ़ें?

श्लोक पुरुष जातक की पत्नी की दिशा की बात करता है। स्त्री की कुंडली में परंपरा यही तर्क पति पर लागू करती है, यानी सप्तम भाव का ग्रह, सप्तमेश और राशि की दिशा। कारक के रूप में गुरु को भी देखने की रीति चलती है, जो परंपरा की है।

क्या उपाय से जीवनसाथी की दिशा बदली जा सकती है?

नहीं, दिशा जन्म कुंडली की राशियों से बनती है और उपाय से नहीं बदलती। उपाय का काम समय और मन की स्थिरता में सहायता करना है, जैसे गुरुवार के पीले फूल या शनिवार का दीपक। ये सहायक कदम हैं, गारंटी नहीं।

2027 में कन्या राशि की शादी का समय कब बनता है?

गुरु 25 जनवरी से 26 जून 2027 तक कर्क में है, जो कन्या से ग्यारहवाँ भाव है, और शनि 3 जून 2027 तक सातवें भाव मीन में है। यह खिड़की तभी काम करती है जब चल रही दशा विवाह से जुड़ी हो। अपनी दशा के साथ मिलाकर ही समय चुनें।

यह भी देखें · See also

इस हब का मुख्य पेजShadi Kab Hogi? कुंडली से विवाह का समय

समूह: राशि अनुसार शादी कब होगी

श्रेणी: marriage-love · marriage