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देवउठनी एकादशी 2026: 20 नवंबर, पारण समय

Rohiit Gupta· Chief Vedic Architect15 min read

Trikaal Sandesh — Direct Answer

देवउठनी एकादशी 2026 में शुक्रवार, 20 नवंबर को है। एकादशी तिथि उस दिन सुबह 07:16 बजे (दिल्ली) शुरू होती है और 21 नवंबर के सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है। इसलिए व्रत 20 नवंबर को रखा जाता है, पारण 21 नवंबर को हरि वासर के बाद होता है और तुलसी विवाह भी 21 नवंबर को पड़ता है।

Deep Dive Analysis

देवउठनी एकादशी 2026 कब है: तारीख और समय एक नज़र में

देवउठनी एकादशी 2026 में शुक्रवार, 20 नवंबर को है। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी है और चातुर्मास के समापन का दिन मानी जाती है। दिल्ली के पंचांग में 20 नवंबर को सुबह 07:16 बजे तक दशमी रहती है, उसके बाद एकादशी लगती है। 21 नवंबर के सूर्योदय पर द्वादशी चल रही होती है, इसलिए पूरे दिन का व्रत 20 नवंबर को ही बनता है। इस पेज में वही गणना आसान भाषा में है, ताकि आप पूजा, पारण और आगे के शुभ कार्यों की तारीख एक जगह देख सकें। पूरे मुहूर्त-परिवार की जानकारी के लिए हमारी शुभ मुहूर्त गाइड भी खोलें।

20 नवंबर को व्रत और 21 नवंबर को पारण: दोनों तारीखें क्यों दिखती हैं

कई कैलेंडर में 20 और 21 नवंबर दोनों के आगे देवउठनी लिखा दिखता है, इसलिए लोग उलझ जाते हैं। सीधा हिसाब यह है कि एकादशी तिथि 20 नवंबर को दिन में शुरू होकर 21 नवंबर के सूर्योदय से पहले ही खत्म हो जाती है। व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन एकादशी की तिथि दिन में मौजूद हो, यानी 20 नवंबर। अगला दिन पारण और तुलसी विवाह का है। हमारे पूरे साल की एकादशी पेज पर भी यही तर्क हर एकादशी पर लगाया गया है।

एकादशी तिथि सूर्योदय को क्यों नहीं छूती: उदया तिथि का नियम

सामान्य नियम उदया तिथि का है, यानी सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो वही उस दिन की मानी जाती है। 20 नवंबर के सूर्योदय (दिल्ली में लगभग 06:51) पर दशमी है और 21 नवंबर के सूर्योदय पर द्वादशी। यानी एकादशी किसी भी सूर्योदय को नहीं छूती। ऐसे मामले में व्रत उसी दिन होता है जिस दिन तिथि का अधिकांश भाग आता है, जो यहाँ 20 नवंबर है। यही स्थिति हम एकादशी मार्गदर्शिका में विस्तार से समझा चुके हैं। रोज़ की तिथि और सूर्योदय के लिए आज का पंचांग देखें।

देवउठनी एकादशी क्या है: कार्तिक शुक्ल एकादशी का अर्थ

देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है। देव का अर्थ है देवता और उठनी का अर्थ है जागना, यानी वह दिन जब भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। परंपरा में यह तिथि हरि के जागरण के साथ शुभ कार्यों के फिर से शुरू होने का संकेत देती है। ज्योतिष में एकादशी तब बनती है जब सूर्य और चंद्रमा के बीच 120 अंश का अंतर पूरा होता है, इसलिए हर पक्ष की एकादशी चंद्रमा की विशेष स्थिति से जुड़ी है। पंचांग की इस बुनियाद को समझने के लिए नक्षत्र कैलकुलेटर भी काम आता है।

भगवान विष्णु का योगनिद्रा से जागना: चातुर्मास का अंत

परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और देवउठनी पर जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जिसमें विवाह, गृह प्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्य सामान्यतः टाले जाते हैं। देवउठनी के साथ यह अवरोध हटता है, इसलिए शादी की तैयारी कर रहे परिवार इस तारीख का इंतज़ार करते हैं। फिर भी हर विवाह का दिन तिथि, नक्षत्र और लग्न से तय होता है, केवल एकादशी से नहीं। इसी कारण नवंबर 2026 के विवाह मुहूर्त अलग से जाँचना ज़रूरी है।

देवउठनी, प्रबोधिनी और हरि प्रबोधिनी: नामों का फर्क

इस एकादशी को अलग-अलग क्षेत्रों में देवउठनी, देव उत्थान, प्रबोधिनी और हरि प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। सभी नाम एक ही कार्तिक शुक्ल एकादशी के हैं, इसलिए कोई अलग तारीख नहीं बनती। खोज में लोग देव उठनी, देवुत्थान या devutthana लिखते हैं, पर पंचांग में तिथि एक ही रहती है। उत्तर भारत में यह तुलसी विवाह की शुरुआत के रूप में भी मनाई जाती है। अन्य एकादशियों के नाम और उनकी तिथियाँ हमारी एकादशी सूची में एक साथ मिलती हैं।

व्रत से एक दिन पहले की तैयारी: दशमी के नियम

एकादशी व्रत की तैयारी दशमी से शुरू होती है। 19 नवंबर को सात्विक और हल्का भोजन लेना, रात में अधिक भारी या तला खाना टालना और संयम रखना परंपरा में बताया गया है। 20 नवंबर को दशमी सुबह 07:16 तक है, इसलिए पारंपरिक रूप से जो लोग पूर्ण नियम निभाते हैं वे सूर्योदय से पहले स्नान करके संकल्प की तैयारी रखते हैं और एकादशी लगने के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं। यदि स्वास्थ्य कमज़ोर है तो फलाहार वाला सरल व्रत भी स्वीकार्य माना जाता है। तिथि अनुसार दिन की जाँच से आप समय की पुष्टि कर सकते हैं।

पूजा विधि: सुबह से शाम तक क्रम

सुबह स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु या शालिग्राम के सामने दीपक जलाएँ और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें। विष्णु जी को पीले फूल, तुलसी दल, पीला चंदन और फल अर्पित करें। दिन भर नाम जप या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना शुभ माना गया है। शाम को घर के आँगन या पूजा स्थान पर गन्ने का मंडप सजाकर देव जागरण की पूजा होती है। नीचे का हर चरण सरल है, और आप अपने परिवार की परंपरा के अनुसार उसमें बदलाव कर सकते हैं। पूजा से जुड़े अन्य कार्यों का समय गृह प्रवेश मुहूर्त जैसे पेजों पर भी दिया गया है।

पूजन सामग्री की सूची

पूजा के लिए सामान्यतः चौकी या पाटा, भगवान विष्णु की मूर्ति या शालिग्राम, पीला वस्त्र, तुलसी दल, पीले फूल, चंदन, रोली, अक्षत, फल, मिठाई, घी का दीपक, धूप और शंख चाहिए। शाम की पूजा में गन्ने, सिंघाड़ा, शकरकंद, मौसमी फल और आँवला रखने की परंपरा है। यह सूची घर-घर और राज्य-राज्य में थोड़ी बदलती है, इसलिए जो आपके परिवार में चला आ रहा है उसे प्राथमिकता दें। पूजा के दिन अशुभ समय से बचने के लिए शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर का उपयोग किया जा सकता है।

शाम की देव जागरण पूजा: दीपक, शंख और मंत्र

शाम को आँगन में गेरू और आटे से भगवान के चरण बनाए जाते हैं, गन्ने का मंडप सजता है और घी के दीपक जलाए जाते हैं। फिर शंख, घंटी या थाली बजाकर देवताओं को जगाने की परंपरा निभाई जाती है। इस समय उठो देव, बैठो देव जैसे लोकगीत या विष्णु नाम का जप किया जाता है। यह पूजा एकादशी तिथि के भीतर करना अच्छा माना जाता है, इसलिए 20 नवंबर की शाम ही उपयुक्त है। अगले दिन तुलसी विवाह की तैयारी भी इसी शाम से शुरू हो जाती है।

व्रत के प्रकार: निर्जला, फलाहारी और एक समय भोजन

देवउठनी का व्रत तीन तरह से रखा जाता है। निर्जला व्रत में दिन भर अन्न और जल दोनों छोड़े जाते हैं, जो केवल स्वस्थ और अभ्यस्त लोगों के लिए बताया जाता है। फलाहारी व्रत में फल, दूध, मेवा और कुट्टू या सिंघाड़े का आटा लिया जाता है। तीसरे प्रकार में एक समय सात्विक भोजन किया जाता है, बिना अनाज के। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ, बच्चे और रोगी कठोर व्रत न करें और डॉक्टर की सलाह मानें। जन्म कुंडली के अनुसार किस दिन व्रत आपके लिए सुगम है, यह निःशुल्क जन्म कुंडली से देखा जा सकता है।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

परंपरा में एकादशी के दिन चावल और अन्य अनाज, दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से परहेज़ बताया गया है। फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक का उपयोग सामान्यतः स्वीकार्य है। अधिक तला हुआ या बहुत मीठा खाने से भी बचना ठीक रहता है, ताकि दिन भर ऊर्जा बनी रहे। यदि आप मधुमेह, उच्च रक्तचाप या किसी दवा पर हैं तो लंबा उपवास डॉक्टर से पूछकर ही रखें। व्रत का उद्देश्य संयम है, शरीर को कष्ट देना नहीं, और यही बात एकादशी मार्गदर्शिका में भी दोहराई गई है।

पारण का समय: हरि वासर क्या है

पारण यानी व्रत खोलना। नियम यह है कि पारण द्वादशी तिथि के भीतर और हरि वासर समाप्त होने के बाद किया जाता है। हरि वासर द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग है। इस वर्ष एकादशी 21 नवंबर के सूर्योदय से पहले खत्म होती है, इसलिए द्वादशी उस दिन सूर्योदय पर चल रही होती है और द्वादशी 22 नवंबर को सुबह 04:57 तक रहती है। पारण 21 नवंबर को हरि वासर के बाद करें। सटीक समय आपके शहर के सूर्योदय पर निर्भर है, इसलिए 21 नवंबर का समय पंचांग पेज पर जाँच लें।

पारण कैसे करें: क्रम और भोजन

पारण से पहले स्नान करें, भगवान विष्णु को जल और तुलसी अर्पित करें और ज़रूरतमंद को अन्न या वस्त्र का दान दें। फिर सबसे पहले तुलसी दल के साथ प्रसाद ग्रहण करें और उसके बाद हल्का सात्विक भोजन लें। लंबे उपवास के बाद एकदम भारी भोजन पाचन पर बोझ डालता है, इसलिए धीरे-धीरे खाएँ। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न हो पाए तो यह दोष माना जाता है, इसलिए समय का ध्यान रखें। अन्य व्रतों के पारण के नियम भी इसी तरह चलते हैं और पुत्रदा एकादशी का पेज उसका एक उदाहरण है।

तुलसी विवाह: 21 नवंबर और देवउठनी का रिश्ता

देवउठनी एकादशी के बाद तुलसी जी का शालिग्राम या विष्णु स्वरूप के साथ प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है। 2026 में यह आयोजन 21 नवंबर को है, यानी व्रत के अगले दिन। कई परिवार एकादशी की शाम को भी तुलसी चौरा सजाते हैं और द्वादशी के दिन विवाह की रस्म निभाते हैं। यह रस्म घर में शादी के मंगल वातावरण की शुरुआत मानी जाती है। इसकी पूरी विधि, मुहूर्त और कथा हमारे तुलसी विवाह 2026 पेज में विस्तार से है।

देवउठनी के बाद शादी के मुहूर्त: नवंबर 2026

देवउठनी के बाद विवाह का मौसम शुरू होता है, पर हर तारीख हर किसी के लिए एक-सी नहीं होती। विवाह मुहूर्त तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न के मेल से बनता है और वर-वधू की कुंडली से भी मिलाया जाता है। इसलिए पंचांग में दिखी हर शुभ तारीख आपके लिए उपयुक्त हो, यह ज़रूरी नहीं। नवंबर की पूरी सूची और उनकी शर्तें नवंबर 2026 विवाह मुहूर्त में हैं। पूरे साल का नक्शा विवाह मुहूर्त 2026 पेज पर देखें, और अपनी कुंडली के हिसाब से जानने के लिए कुंडली मिलान करें।

दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 के विवाह मुहूर्त

नवंबर के बाद दिसंबर में भी कई विवाह तिथियाँ बनती हैं, और जनवरी 2027 में भी सूची आगे बढ़ती है। हर महीने में गुरु, शुक्र की स्थिति और खरमास जैसे कारक तारीखों की संख्या बदल देते हैं। इसलिए एक ही बार में पूरी साल की तारीख तय करने की जगह महीने-दर-महीने सूची देखना बेहतर है। दिसंबर 2026, जनवरी 2027 और फरवरी 2027 के पेज अलग-अलग तारीखें और कारण बताते हैं। आगे के सालों के लिए विवाह मुहूर्त 2027 भी उपलब्ध है।

क्या देवउठनी स्वयं अबूझ मुहूर्त है

कई जगह देवउठनी एकादशी को अबूझ मुहूर्त कहा जाता है, यानी बिना अलग से मुहूर्त निकाले शुभ कार्य। पर यह मान्यता क्षेत्र और पंडित परंपरा के अनुसार बदलती है, और बड़े निर्णय जैसे विवाह के लिए अधिकतर विद्वान कुंडली और पंचांग दोनों देखने की सलाह देते हैं। छोटे मांगलिक कार्य, जैसे नई वस्तु खरीदना या तुलसी पूजन, इस दिन सहज रूप से किए जाते हैं। विवाह जैसे बड़े कार्य के लिए मांगलिक विवाह मुहूर्त और मांगलिक दोष कैलकुलेटर जैसी जाँच भी उपयोगी हैं।

गृह प्रवेश, भूमि पूजन और दुकान के मुहूर्त

देवउठनी के बाद लोग नया घर, दुकान या दफ्तर शुरू करने की योजना भी बनाते हैं। गृह प्रवेश के लिए तिथि, नक्षत्र और वास्तु का मेल देखा जाता है, इसलिए केवल एकादशी के नाम पर तारीख तय न करें। विस्तृत जानकारी गृह प्रवेश शुभ मुहूर्त, भूमि पूजन और शिलान्यास और दुकान या ऑफिस खोलने का मुहूर्त पेजों में है। नौकरी या लोन जैसे आर्थिक कार्यों के लिए भी जॉब जॉइनिंग मुहूर्त और लोन लेने का मुहूर्त देखें।

मुंडन, नामकरण, जनेऊ और संस्कार

चातुर्मास में कई परिवार संस्कार टाल देते हैं और देवउठनी के बाद उन्हें करवाते हैं। मुंडन, नामकरण, अन्नप्राशन, कर्णवेध और जनेऊ के लिए बच्चे की कुंडली, चंद्र नक्षत्र और तिथि का मेल देखा जाता है। हर संस्कार के लिए अलग नियम हैं, इसलिए हम इन्हें अलग पेजों में समझाते हैं: मुंडन मुहूर्त, नामकरण मुहूर्त, अन्नप्राशन मुहूर्त, कर्णवेध मुहूर्त, जनेऊ मुहूर्त और गोदभराई मुहूर्त। बच्चे का नाम चुनना हो तो नक्षत्र से नाम कैलकुलेटर उपयोगी है।

जन्म कुंडली के अनुसार इस एकादशी का असर: चंद्र और विष्णु

एकादशी का संबंध चंद्रमा की गति से है, और चंद्रमा मन, भावना और माता का कारक ग्रह माना जाता है। इसलिए कई ज्योतिषी एकादशी के व्रत को मन की शांति और संयम की साधना से जोड़ते हैं। विष्णु जी की उपासना को गुरु और शुक्र के शुभ फल से भी जोड़ा जाता है, पर यह परंपरागत मान्यता है, कोई गारंटी नहीं। आपकी कुंडली में चंद्रमा किस भाव और राशि में है, यह आपके लिए व्रत का स्वरूप तय करने में मदद करता है। राशि कैलकुलेटर से चंद्र राशि जान सकते हैं।

एकादशी और चंद्रमा: मन के ग्रह का नियम

चंद्रमा हर तिथि में लगभग 12 अंश आगे बढ़ता है, और शुक्ल एकादशी तक वह सूर्य से लगभग 120 अंश आगे पहुँच चुका होता है। इसी गणित से एकादशी का समय हर वर्ष और हर शहर में थोड़ा अलग निकलता है। अगर आपकी कुंडली में चंद्रमा कमज़ोर है तो मन की अस्थिरता, चिंता और नींद की समस्या दिख सकती है, और ऐसे में नियमित संयम का अभ्यास सहायक माना जाता है। यह चिकित्सा सलाह नहीं है, इसलिए गंभीर समस्या में डॉक्टर से मिलें। ग्रहों की ताकत जाँचने के लिए कमज़ोर ग्रह खोजक देखें।

संतान, वैवाहिक सुख और एकादशी: क्या देखें

कुछ एकादशियाँ विशेष रूप से संतान सुख से जोड़ी गई हैं, जैसे पुत्रदा एकादशी, पर देवउठनी का संबंध मुख्यतः विवाह और मांगलिक कार्यों की शुरुआत से है। ज्योतिष में विवाह सातवें भाव, उसके स्वामी और शुक्र या गुरु की स्थिति से देखा जाता है, और संतान पाँचवें भाव से। यदि आप शादी की देरी या संतान योग को लेकर चिंतित हैं तो केवल व्रत पर निर्भर न रहें, कुंडली का विश्लेषण कराएँ। इसके लिए शादी कब होगी कैलकुलेटर और संतान योग कैलकुलेटर निःशुल्क उपलब्ध हैं।

क्या करें और क्या न करें

इस दिन सुबह जल्दी उठें, भगवान विष्णु का स्मरण करें, तुलसी में जल दें और ज़रूरतमंद को दान दें। क्रोध, निंदा, झूठ और अनावश्यक विवाद से बचें, क्योंकि एकादशी संयम का दिन माना गया है। तुलसी के पत्ते एकादशी को तोड़ने की परंपरा कुछ जगहों पर वर्जित मानी जाती है, इसलिए एक दिन पहले तोड़कर रख लें। बाल कटवाना, नाखून काटना जैसे कार्य भी परंपरा के अनुसार कुछ घरों में टाले जाते हैं। जो नियम आपके परिवार में चलता है उसे मानें और विवाद न करें। अन्य तिथियों का हाल अमावस्या और पूर्णिमा के पेजों में देखें।

अलग शहरों में समय का फर्क कैसे पढ़ें

तिथि के शुरू और खत्म होने का क्षण पूरे भारत में एक ही होता है, पर सूर्योदय हर शहर में अलग होता है। इसलिए 07:16 बजे एकादशी का आरंभ दिल्ली के पंचांग का समय है, और लगभग पूरे भारत में इसी क्षण होता है, लेकिन पूजा का मुहूर्त अपने शहर के सूर्योदय और सूर्यास्त से देखना चाहिए। नोएडा, गुरुग्राम और गाज़ियाबाद में फर्क बहुत छोटा रहता है, पर मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में सूर्योदय काफी अलग होता है। आज की तिथि और सूर्योदय के लिए पंचांग का उपयोग करें।

साल की बाकी एकादशियाँ और अगली तारीख

देवउठनी के बाद अगली बड़ी एकादशियों में मोक्षदा, सफला और पुत्रदा आती हैं, और हर एकादशी का अपना महात्म्य बताया गया है। पुत्रदा एकादशी जनवरी 2027 में आती है, जिसकी तारीख और पारण हमने पुत्रदा एकादशी पेज में दी है। पूरे साल की एकादशी तारीखें एकादशी व्रत 2026 और इस महीने की एकादशी में हैं। अमावस्या के उपाय के लिए अमावस्या तर्पण पेज भी काम आता है।

अपनी कुंडली से शुभ दिन कैसे जाँचें

पंचांग सबके लिए एक-सा होता है, पर आपके लिए शुभ दिन आपकी कुंडली, दशा और गोचर से तय होता है। Trikaal Vaani में स्विस एफेमेरिस पर आधारित गणना होती है और परंपरागत बृहत पराशर होरा शास्त्र के नियम इस्तेमाल होते हैं। अपना जन्म विवरण भरकर निःशुल्क शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर चलाएँ, दशा के लिए दशा कैलकुलेटर देखें और उपाय के लिए उपाय कैलकुलेटर आज़माएँ। विवाह की बात हो तो कुंडली मिलान सबसे पहले करें, और प्रेम या अरेंज विवाह जानने के लिए लव या अरेंज मैरिज कैलकुलेटर देखें।

देवउठनी एकादशी की कथा संक्षेप में

लोक में प्रचलित कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से चार महीने के लिए योगनिद्रा में जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इसी कारण इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। कुछ कथाओं में तुलसी जी को विष्णु जी की प्रिय बताया गया है, इसलिए जागरण के बाद उनका विवाह कराया जाता है। कथाओं के रूप क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं, और हम यहाँ किसी एक रूप को अंतिम नहीं बताते। जिस कथा को आपका परिवार सुनता आया है, उसी का पाठ करें। अन्य व्रतों की कथा-परंपरा समझने के लिए एकादशी मार्गदर्शिका और तुलसी विवाह पेज पढ़ें, और दिन के शुभ समय के लिए पंचांग खोलें।

Apna Personalized Analysis Lein

Yeh article general framework hai. Aapke specific chart ke according detailed analysis ke liye:

शब्दावली · Glossary

एकादशी
चंद्र पक्ष की ग्यारहवीं तिथि, जो भगवान विष्णु की उपासना और व्रत के लिए जानी जाती है।
पारण
एकादशी का व्रत खोलने की विधि, जो द्वादशी तिथि के भीतर की जाती है।
हरि वासर
द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग, जिसमें पारण वर्जित माना जाता है।
उदया तिथि
सूर्योदय के समय चल रही तिथि, जिसे उस दिन की तिथि माना जाता है।
चातुर्मास
देवशयनी से देवउठनी एकादशी तक के चार महीने, जिनमें बड़े मांगलिक कार्य टाले जाते हैं।
तुलसी विवाह
तुलसी और शालिग्राम या विष्णु स्वरूप का प्रतीकात्मक विवाह, जो देवउठनी के बाद होता है।

Frequently Asked Questions

देवउठनी एकादशी 2026 कब है?

देवउठनी एकादशी 2026 में शुक्रवार, 20 नवंबर को है। एकादशी तिथि 20 नवंबर को सुबह 07:16 बजे (दिल्ली) शुरू होती है और 21 नवंबर के सूर्योदय से पहले खत्म हो जाती है।

देवउठनी एकादशी का व्रत 20 या 21 नवंबर को रखें?

व्रत 20 नवंबर को रखें, क्योंकि उसी दिन एकादशी तिथि दिन में मौजूद है। 21 नवंबर के सूर्योदय पर द्वादशी है, इसलिए वह दिन पारण का है।

देवउठनी एकादशी का पारण कब करें?

पारण 21 नवंबर 2026 को द्वादशी तिथि में हरि वासर समाप्त होने के बाद करें। द्वादशी 22 नवंबर को सुबह 04:57 तक है, इसलिए 21 नवंबर को पारण का समय उपलब्ध रहता है। अपने शहर का सटीक समय पंचांग से जाँचें।

हरि वासर क्या होता है?

हरि वासर द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग है। परंपरा के अनुसार इस अवधि में पारण नहीं किया जाता और इसके समाप्त होने के बाद ही व्रत खोला जाता है।

तुलसी विवाह कब है?

तुलसी विवाह 2026 में 21 नवंबर को है, यानी देवउठनी एकादशी के व्रत के अगले दिन। इसकी पूरी विधि हमारे तुलसी विवाह पेज में दी गई है।

देवउठनी एकादशी के बाद शादी कब से शुरू होती है?

परंपरा में देवउठनी के बाद विवाह मुहूर्त शुरू माने जाते हैं, पर हर तारीख तिथि, नक्षत्र और लग्न पर निर्भर है। नवंबर 2026 की सूची अलग पेज में दी गई है और कुंडली के हिसाब से अंतिम निर्णय लें।

क्या देवउठनी एकादशी पर बिना मुहूर्त शादी हो सकती है?

कई जगह इसे अबूझ मुहूर्त माना जाता है, पर यह मान्यता क्षेत्र के अनुसार बदलती है। विवाह जैसे बड़े कार्य के लिए पंचांग और कुंडली दोनों देखना अधिक सुरक्षित माना जाता है।

देवउठनी एकादशी में क्या खाना चाहिए?

फल, दूध, मखाना, साबूदाना, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक सामान्यतः लिए जाते हैं। चावल, अनाज, दाल, प्याज और लहसुन से परहेज़ बताया जाता है।

क्या निर्जला व्रत सभी के लिए ठीक है?

नहीं। निर्जला व्रत केवल स्वस्थ और अभ्यस्त लोगों के लिए बताया जाता है। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और रोगी फलाहारी व्रत चुनें और डॉक्टर की सलाह लें।

देवउठनी और प्रबोधिनी एकादशी में क्या फर्क है?

कोई फर्क नहीं है। देवउठनी, देव उत्थान, प्रबोधिनी और हरि प्रबोधिनी सब कार्तिक शुक्ल एकादशी के ही नाम हैं।

क्या एकादशी की तिथि हर शहर में अलग होती है?

तिथि बदलने का क्षण पूरे भारत में एक होता है, पर सूर्योदय शहर के अनुसार बदलता है। इसलिए पूजा और पारण का सही समय अपने शहर के सूर्योदय से देखें।

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