पापांकुशा एकादशी 2026: 22 अक्टूबर पारण
Trikaal Sandesh — Direct Answer
पापांकुशा एकादशी 2026 गुरुवार, 22 अक्टूबर को है। दिल्ली के पंचांग में उस दिन सूर्योदय पर आश्विन शुक्ल एकादशी रहती है और दोपहर 14:48 तक चलती है। व्रत का पारण अगले दिन, शुक्रवार 23 अक्टूबर को सूर्योदय 06:30 के बाद द्वादशी तिथि में किया जाता है। अपने शहर का समय पंचांग से मिलाएं।
Deep Dive Analysis
पापांकुशा एकादशी 2026 की तारीख और तिथि का समय
पापांकुशा एकादशी 2026 में गुरुवार, 22 अक्टूबर को पड़ रही है। त्रिकाल वाणी के पंचांग इंजन के अनुसार दिल्ली NCR में उस दिन सूर्योदय 06:30 पर है और उसी समय आश्विन शुक्ल एकादशी तिथि चल रही है, जो दोपहर 14:48 पर समाप्त होती है। एकादशी का निर्णय सूर्योदय की तिथि से होता है, इसलिए व्रत 22 अक्टूबर को ही रखा जाएगा। पूरे महीने की एकादशियों की सूची के लिए एकादशी व्रत कब है 2026 देखें और रोज़ का समय आज का पंचांग में मिलेगा।
पापांकुशा एकादशी का अर्थ और नाम की व्याख्या
पापांकुशा शब्द दो भागों से बना है। पाप का अर्थ है ग़लत कर्मों का बोझ और अंकुश वह नुकीला दंड है जिससे महावत हाथी को काबू में रखता है। यानी यह एकादशी मन के उस हाथी पर अंकुश लगाने का दिन मानी गई है, जो बार-बार ग़लत रास्ते की ओर भागता है। इसे भय का दिन न समझें। यह आत्म-नियंत्रण का अभ्यास है, जिसमें भोजन, वाणी और विचार तीनों को एक दिन के लिए संभाला जाता है। इसी कारण आश्विन की इस तिथि को वैष्णव परंपरा में विशेष स्थान मिला है। एकादशी का सामान्य अर्थ अलग पृष्ठ पर समझाया गया है।
आश्विन शुक्ल एकादशी: दशहरे के बाद की तिथि
पापांकुशा एकादशी आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है। यह शारदीय नवरात्रि और दशहरा 2026 के बाद आती है, जब देवी उपासना का उत्सव पूरा हो चुका होता है और घर में विष्णु उपासना की शांत लय लौटती है। इसके बाद क्रम से शरद पूर्णिमा, करवा चौथ, धनतेरस और दिवाली 2026 आते हैं। इस तरह यह एकादशी त्योहारों की भीड़ से पहले का एक ठहराव भी है, जहां परिवार संयम से शुरुआत कर सकता है।
22 अक्टूबर 2026 का पंचांग: दिल्ली NCR के पांचों अंग
दिल्ली NCR के लिए 22 अक्टूबर 2026 का पंचांग इस प्रकार है। तिथि शुक्ल एकादशी (14:48 तक), नक्षत्र शतभिषा (20:49 तक), योग वृद्धि (23:39 तक), करण विष्टि (14:48 तक) और वार गुरुवार। सूर्योदय 06:30 और सूर्यास्त 17:40 है। ये पांचों अंग सूर्योदय के क्षण से पढ़े गए हैं, जैसा निर्णय सिंधु की परंपरा कहती है। अपने शहर में सूर्योदय कुछ मिनट आगे-पीछे होगा, इसलिए शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर या पंचांग पृष्ठ से अपने स्थान का समय ज़रूर मिलाएं।
दशमी की तैयारी: व्रत से एक दिन पहले क्या करें
एकादशी के व्रत की असली शुरुआत दशमी की शाम से होती है। 21 अक्टूबर की शाम हल्का और सात्विक भोजन करें, चावल, मांस, लहसुन और प्याज़ से दूर रहें और सूर्यास्त के बाद ज़्यादा न खाएं। रात को जल्दी सोएं ताकि ब्रह्म मुहूर्त में उठना आसान हो। घर में पूजा का स्थान साफ़ करें और तुलसी का पौधा देख लें। यह तैयारी इसलिए है कि व्रत के दिन शरीर हल्का रहे और मन पूजा में टिके। 21 अक्टूबर का पंचांग देखकर अपने शहर का सूर्योदय भी नोट कर लें।
एकादशी के दिन सुबह की विधि: स्नान से संकल्प तक
22 अक्टूबर को सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। पीला या सफ़ेद रंग शुभ माना जाता है। पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र रखें और हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि आज एकादशी का व्रत श्रद्धा से रखेंगे। संकल्प छोटा और सरल रखें, जैसे आज मैं फलाहार करूंगा और दिन भर शांत रहूंगा। इसके बाद दीपक जलाकर विष्णु जी को प्रणाम करें। सुबह का यह छोटा क्रम पूरे दिन का स्वर तय कर देता है। मुहूर्त का सबसे अच्छा समय जानने के लिए पंचांग देखें।
पूजा की सामग्री: घर पर क्या-क्या चाहिए
पूजा के लिए ज़्यादा सामान की ज़रूरत नहीं है। एक चौकी, पीला कपड़ा, भगवान विष्णु या पद्मनाभ का चित्र, घी का दीपक, धूप, चंदन, पीले फूल, तुलसी दल, फल, मिश्री और जल का कलश पर्याप्त हैं। जो परिवार शालिग्राम की पूजा करता है, वह उन्हें पंचामृत से स्नान करा सकता है। सामग्री का खर्च कम रखें, क्योंकि फल भक्ति से मिलता है, दिखावे से नहीं। यदि घर में शालिग्राम नहीं है तो केवल चित्र की पूजा भी पूर्ण मानी जाती है। इसी तरह की सरल विधियां मुहूर्त हब पर भी संकलित हैं।
पद्मनाभ रूप की पूजा और विष्णु मंत्र
पापांकुशा एकादशी पर भगवान विष्णु के पद्मनाभ रूप की पूजा परंपरा में कही जाती है, जिसमें नाभि से कमल निकलता दिखाया जाता है। पूजा में सबसे सरल मंत्र है ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। इसे 108 बार जपने में लगभग पंद्रह मिनट लगते हैं। चाहें तो विष्णु सहस्रनाम के बजाय केवल एक माला का जप करें। मंत्र की संख्या से ज़्यादा ज़रूरी है ध्यान की स्थिरता। जप के समय मोबाइल दूर रखें और आसन पर एक ही दिशा में बैठें। जप के बाद दीपक की आरती करें और परिवार में प्रसाद बांटें।
एकादशी में क्या खाएं: फलाहार की सरल सूची
फलाहार का मतलब है ऐसा हल्का भोजन जो अन्न से नहीं बना। फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक आम तौर पर चलते हैं। चावल और सभी अनाज इस दिन छोड़े जाते हैं। चाय-कॉफ़ी कम रखें और पानी भरपूर पिएं। जिन्हें मधुमेह या एसिडिटी है, वे लंबा खाली पेट न रहें और बीच-बीच में थोड़ा फल ले लें। व्रत शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं है, उसे संयम सिखाने के लिए है। रोज़ की सेहत के सुझाव स्वास्थ्य और ज्योतिष पृष्ठ पर देखें।
एकादशी पर क्या नहीं करें: सात छोटे नियम
परंपरा में एकादशी पर अन्न और चावल, मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज़ और तामसिक भोजन से दूर रहने को कहा गया है। साथ ही दिन में सोना, किसी की निंदा करना, क्रोध करना और झूठ बोलना भी वर्जित माना गया है। बाल कटवाना और झगड़ा करना भी टाला जाता है। इन्हें डर से नहीं, अनुशासन की तरह देखें। जो नियम पूरे न निभ सकें, उनमें से दो-तीन चुनकर श्रद्धा से निभाना एक भारी सूची को आधा-अधूरा निभाने से बेहतर है। गुस्से पर काबू पाने के लिए चंद्र ग्रह और मन का लेख पढ़ना उपयोगी रहेगा।
तुलसी और एकादशी: पत्ते कब तोड़ें और कब नहीं
विष्णु पूजा में तुलसी दल सबसे प्रिय माना जाता है, पर परंपरा कहती है कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले, यानी 21 अक्टूबर को तोड़कर साफ़ जल में रख लें। एकादशी के दिन केवल तुलसी को जल चढ़ाएं और शाम को घी का दीपक लगाएं। तुलसी की पूजा का विस्तार देवउठनी एकादशी 2026 के लेख में मिलता है, जहां तुलसी और शालिग्राम का संबंध समझाया गया है।
पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा
प्रचलित कथा के अनुसार विंध्य पर्वत के पास क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था, जिसने सारी उम्र शिकार और लूट में बिताई। मृत्यु के समीप यमदूतों के भय से घबराकर वह अंगिरा ऋषि की शरण में पहुंचा। ऋषि ने उसे आश्विन शुक्ल एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। उसने श्रद्धा से व्रत रखा, विष्णु का स्मरण किया और अपने पुराने कर्मों पर पश्चाताप किया। कथा कहती है कि इसके बाद उसके मन का बोझ हल्का हुआ और वह सद्गति की ओर बढ़ा। कथाएं क्षेत्र के अनुसार थोड़ी बदलती हैं, इसलिए सार को पकड़ें।
कथा का संदेश: पश्चाताप और नई शुरुआत
बहेलिए की कथा किसी एक व्यक्ति की सज़ा से ज़्यादा बदलाव की संभावना दिखाती है। इसमें व्रत का केंद्र है पश्चाताप और आगे सुधार का संकल्प। आज के जीवन में इसका अर्थ यह है कि जो ग़लती हो चुकी, उसे मानकर आगे के व्यवहार को बदला जा सकता है। इस पृष्ठ का सिद्धांत भी यही है कि कोई भी कठिन बात उपाय और सुधार के साथ ही कही जाए। अपनी कुंडली में चल रही दशा समझने के लिए दशा कैलकुलेटर से शुरुआत करें।
पारण का समय: 23 अक्टूबर की सुबह
पारण यानी व्रत खोलना एकादशी के अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है। 23 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को दिल्ली NCR में सूर्योदय 06:30 पर है और द्वादशी तिथि 14:36 तक रहती है। इसलिए पारण सूर्योदय के बाद सुबह के समय करना सबसे सरल रहता है। एकादशी 22 अक्टूबर को 14:48 पर समाप्त हो चुकी होगी, इसलिए अगली सुबह पारण में कोई उलझन नहीं है। अपने शहर का सूर्योदय अलग हो तो 23 अक्टूबर का पंचांग में लोकेशन के अनुसार समय देखें।
पारण की विधि: व्रत कैसे खोलें
पारण के दिन सुबह स्नान के बाद पहले भगवान विष्णु को प्रणाम करें और तुलसी को जल दें। फिर पूजा में चढ़ाया हुआ प्रसाद सबसे पहले लें। पहला भोजन हल्का रखें, जैसे खिचड़ी, दाल-चावल या मूंग की सब्ज़ी, ताकि पेट को धीरे-धीरे अन्न की आदत लौटे। एकादशी के अगले दिन ज़रूरतमंद को अन्न या वस्त्र का दान करना परंपरा में शुभ बताया गया है। पारण करते समय मन में कृतज्ञता रखें कि एक दिन का संयम पूरा हुआ। दान के सरल तरीक़े उपाय कैलकुलेटर में भी देखे जा सकते हैं।
द्वादशी तिथि और हरि वासर का ध्यान
हरि वासर एकादशी के अंतिम चौथाई और द्वादशी के पहले चौथाई को कहा जाता है, और परंपरा में इस अवधि में पारण नहीं किया जाता। इस वर्ष एकादशी 22 अक्टूबर को 14:48 पर पूरी होती है, इसलिए द्वादशी का शुरुआती चौथाई उसी दिन शाम में निकल जाता है और 23 अक्टूबर की सुबह इससे मुक्त रहती है। यह गणना दिल्ली के समय पर है। जो लोग अन्य शहर या विदेश में हैं, वे स्थानीय सूर्योदय के आधार पर समय जांचें। आज की तिथि का ब्योरा पंचांग पर लगातार अपडेट होता रहता है।
शतभिषा नक्षत्र और राहु का संबंध
22 अक्टूबर को दिन भर चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र में रहता है, जो रात 20:49 तक चलता है। इस नक्षत्र के स्वामी राहु हैं और यह कुंभ राशि में आता है। शतभिषा का अर्थ है सौ चिकित्सक, इसलिए इसे उपचार, गोपनीयता और गहरे चिंतन से जोड़ा जाता है। एकादशी जैसे संयम के दिन पर राहु के नक्षत्र में चंद्रमा होने का सरल अर्थ है कि मन में अचानक विचार ज़्यादा उठ सकते हैं। इसलिए जप और मौन से मन को टिकाना अच्छा रहता है। अपना जन्म नक्षत्र जानने के लिए नक्षत्र कैलकुलेटर का उपयोग करें।
चंद्रमा कुंभ राशि में: एकादशी का भावनात्मक रंग
पंचांग के अनुसार 22 अक्टूबर को चंद्रमा कुंभ राशि में लगभग 15 अंश पर है, और कुंभ के स्वामी शनि हैं। कुंभ का चंद्रमा मन को थोड़ा अलग-थलग, तार्किक और समूह-केंद्रित बनाता है। ऐसे दिन अकेले बैठकर चिंतन करना और समाज के लिए कुछ सेवा करना दोनों अच्छे बैठते हैं। जिनकी कुंडली में चंद्रमा कुंभ में है, वे इस दिन ख़ुद को शांत महसूस कर सकते हैं। आपकी राशि और चंद्र चिह्न जानने के लिए राशि कैलकुलेटर और चंद्र राशि का परिचय देखें।
गुरु का कर्क में होना: विष्णु उपासना को बल
विष्णु का ग्रह-प्रतिनिधि गुरु माना जाता है, और 22 अक्टूबर को गुरु कर्क राशि में लगभग 28.8 अंश पर हैं, जो उनकी उच्च राशि है। साथ ही गुरुवार का दिन भी गुरु का है। यानी इस बार एकादशी, गुरुवार और उच्च गुरु तीनों एक साथ मिलते हैं। इसका सरल अर्थ यह है कि विष्णु उपासना, दान और ज्ञान से जुड़े संकल्प लेने के लिए माहौल अनुकूल है। गुरु अक्टूबर के अंत से नवंबर की शुरुआत के बीच सिंह में जाने वाले हैं, इसकी जानकारी गुरु का सिंह गोचर में दी गई है।
22 अक्टूबर के अशुभ काल: राहु काल, यमगंड और गुलिक
दिल्ली NCR के लिए 22 अक्टूबर को राहु काल 13:28 से 14:52, यमगंड 06:30 से 07:53 और गुलिक काल 09:17 से 10:41 है। परंपरा में नई शुरुआत, लेन-देन या यात्रा इन खंडों में टाली जाती है, पर पूजा-पाठ और जप के लिए इन्हें रोकने की ज़रूरत नहीं मानी जाती। फिर भी मुख्य पूजा इन तीनों खंडों के बाहर रखें तो मन में कोई खटका नहीं रहेगा। राहु काल कैसे निकलता है, यह राहु काल कैसे निकालें में चरण-दर-चरण समझाया गया है।
पूजा का सबसे अच्छा समय: अभिजित और प्रातःकाल
22 अक्टूबर को दिल्ली में अभिजित मुहूर्त 11:42 से 12:27 तक है, जो दोपहर की मुख्य पूजा और मंत्र-जप के लिए अच्छा खंड है। प्रातःकाल 06:30 से 08:44 तक का समय सुबह की पहली पूजा के लिए उपयुक्त है। शाम को प्रदोष काल 17:40 से 20:14 तक है, जिसमें दीपक और आरती की जा सकती है। एक ही दिन में तीन छोटे समय खंड चुन लेने से पूरे दिन का क्रम आसान रहता है। अपनी जगह का सही समय शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर से निकाल लें।
कौन व्रत सावधानी से रखें: स्वास्थ्य का ध्यान
व्रत उन्हीं के लिए श्रेष्ठ है जिनका शरीर उसे सह सके। गर्भवती महिलाएं, छोटे बच्चे, वृद्धजन और मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग के रोगी अपने चिकित्सक की सलाह के बिना लंबा उपवास न रखें। ऐसे लोग फलाहार, दूध और जल के साथ आंशिक व्रत रख सकते हैं, और पूजा, जप तथा दान से व्रत का पूरा भाव निभा सकते हैं। परंपरा भी यही कहती है कि रोगी के लिए नियम शिथिल होते हैं। मन से निभाया गया छोटा संकल्प कठोर उपवास से कम नहीं माना जाता। सेहत की ज्योतिषीय समझ के लिए स्वास्थ्य कैलकुलेटर देख सकते हैं।
निर्जल या फलाहार: अपने लिए सही व्रत कैसे चुनें
एकादशी के तीन प्रचलित रूप हैं: निर्जल, केवल जल और फल, और अन्न-रहित फलाहार। निर्जल व्रत कठिन है और सिर्फ़ उन्हीं के लिए है जो इसके आदी हों और स्वस्थ हों। अधिकतर परिवारों के लिए अन्न-रहित फलाहार सबसे संतुलित है, क्योंकि उसमें ऊर्जा बनी रहती है और नियम भी निभता है। पहली बार व्रत रखने वाले एक-दो आसान नियम चुनें, जैसे चावल का त्याग और शाम की आरती, और अगली एकादशी पर थोड़ा बढ़ाएं। हर महीने की एकादशी की तारीख़ इस महीने की एकादशी पृष्ठ पर मिल जाती है।
चंद्रमा कमज़ोर हो तो एकादशी का महत्व और सहारा
एकादशी चंद्र की तिथि है, इसलिए जिनकी कुंडली में चंद्रमा नीच, पाप-ग्रस्त या छठे-आठवें-बारहवें भाव में हो, उन्हें मन की अस्थिरता, नींद की गड़बड़ी या भावनात्मक उतार-चढ़ाव ज़्यादा महसूस हो सकते हैं। यह स्थायी निर्णय नहीं है, क्योंकि चंद्र का बल नियमित दिनचर्या, मंत्र और सेवा से बढ़ाया जा सकता है। एकादशी का संयम इसी दिशा में एक सरल अभ्यास है। यदि संदेह हो तो पहले जन्म कुंडली कैलकुलेटर से चंद्र की स्थिति देखें और फिर कमज़ोर ग्रह खोजक चलाएं।
उपाय 1: विष्णु नाम जप, पांच पंक्तियों में
क्या करना है: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का एक माला जप, यानी 108 बार। कब: 22 अक्टूबर, गुरुवार, सुबह 06:30 के बाद या अभिजित मुहूर्त 11:42 से 12:27 में। कितने का: बिल्कुल मुफ़्त, केवल एक तुलसी की माला या उंगलियों पर गिनती। कितने दिन: लगातार 11 दिन, यानी 1 नवंबर तक। आपके लिए क्यों: यह मन की भागदौड़ को एक ही शब्द पर टिकाता है, जो चंद्र या बुध के कमज़ोर होने पर सबसे उपयोगी है। सावधानी: जप शांत जगह पर बैठकर करें, चलते-चलते नहीं, और थकान हो तो संख्या घटा दें।
उपाय 2: अन्न और वस्त्र का दान, पांच पंक्तियों में
क्या करना है: किसी ज़रूरतमंद को एक समय का भोजन, चावल को छोड़कर पका हुआ भोजन या एक पीला वस्त्र दें। कब: पारण वाले दिन, यानी 23 अक्टूबर, शुक्रवार, सुबह सूर्योदय 06:30 के बाद। कितने का: दस से पचास रुपये के फल या भोजन भी पर्याप्त हैं। कितने दिन: एक बार इस एकादशी पर और फिर हर एकादशी पर चाहें तो दोहराएं। आपके लिए क्यों: गुरु और चंद्र दोनों दान से प्रसन्न माने गए हैं, जो ज्ञान और मन का संतुलन देते हैं। सावधानी: दान अपनी सामर्थ्य से करें, कर्ज़ लेकर नहीं, और किसी को दिखाने के लिए न करें।
उपाय 3: मन पर अंकुश, एक दिन का डिजिटल संयम
क्या करना है: एकादशी के दिन सोशल मीडिया और बेवजह की ख़बरों से दूरी रखें। कब: 22 अक्टूबर, गुरुवार, सूर्योदय 06:30 से सूर्यास्त 17:40 तक। कितने का: बिल्कुल मुफ़्त। कितने दिन: इस एक एकादशी से शुरू करें और चाहें तो अगली एकादशी तक दोहराएं। आपके लिए क्यों: पापांकुशा का भाव मन पर अंकुश है, और आज के समय में मन को सबसे ज़्यादा भटकाने वाली चीज़ें स्क्रीन ही हैं। सावधानी: ज़रूरी कॉल और काम के संदेश बंद न करें, केवल फ़ालतू स्क्रॉलिंग रोकें। मन को शांत रखने के और तरीक़े मन और ग्रहों का लेख में दिए गए हैं।
परिवार और नौकरीपेशा लोग व्रत कैसे निभाएं
संयुक्त परिवार में अक्सर एक ही व्यक्ति पूरा व्रत संभालता है, जबकि बाक़ी सदस्य अपने नियमित भोजन में रहते हैं। व्यावहारिक तरीक़ा यह है कि पूरे घर में उस दिन चावल न पके और शाम की आरती सब मिलकर करें। नौकरीपेशा लोग दफ़्तर में फल, मखाना और दही के साथ आसानी से फलाहार निभा सकते हैं। यात्रा या मीटिंग भरे दिन हों तो व्रत का भाव रखते हुए केवल सात्विक भोजन करें और शाम को मंत्र जप करें। सही दिन के चुनाव के लिए लकी डे कैलकुलेटर भी देखा जा सकता है।
पापांकुशा के बाद के त्योहार: शरद पूर्णिमा से दिवाली तक
पापांकुशा एकादशी के बाद चंद्र और लक्ष्मी की उपासना का सिलसिला शुरू होता है। इसके तीन दिन बाद शरद पूर्णिमा आती है, जो पूर्णिमा की तारीख़ों में दर्ज है। फिर करवा चौथ 2026, धनतेरस 2026 और दिवाली 2026 आते हैं। इस क्रम को पहले से समझ लेने पर घर की सफ़ाई, ख़रीदारी और पूजा की योजना आसान हो जाती है। दिवाली का ज्योतिषीय विश्लेषण दिवाली ज्योतिष 2026 में मिलेगा।
आम ग़लतफ़हमियां: एकादशी और पाप का डर
कई घरों में एकादशी को इस भय से जोड़ दिया जाता है कि व्रत छूटा तो अनर्थ होगा। यह धारणा ग्रंथ-सम्मत सोच से मेल नहीं खाती, क्योंकि शास्त्र हर कठोर बात के साथ उसकी छूट और उपाय भी बताते हैं। इसलिए व्रत छूट जाए तो घबराएं नहीं, अगली एकादशी पर सरल संकल्प से फिर शुरुआत करें। दूसरी ग़लतफ़हमी यह है कि केवल कठोर उपवास ही फल देता है, जबकि संयम और भाव का महत्व कहीं अधिक है। इस विषय पर एकादशी व्रत कब है 2026 में पूरे वर्ष की सूची के साथ सरल सलाह दी गई है।
हमारी गणना की पद्धति और इस पृष्ठ की विश्वसनीयता
इस पृष्ठ की तिथि और समय त्रिकाल वाणी के पंचांग इंजन से लिए गए हैं, जो Swiss Ephemeris, लाहिड़ी अयनांश और सूर्योदय-आधारित तिथि निर्णय पर चलता है। यह पद्धति 16 वर्ष से अधिक की पाराशरी साधना वाले मुख्य वैदिक आर्किटेक्ट रोहित गुप्ता की देखरेख में तय हुई है। समय दिल्ली NCR के लिए हैं और अन्य शहरों में कुछ मिनटों का अंतर संभव है। पंचांग की ताज़ा गणना पंचांग पृष्ठ पर और अपने जन्म के अनुसार विश्लेषण जन्म कुंडली पर देखें।
अपनी कुंडली के अनुसार मुहूर्त और उपाय जांचें
पंचांग सबके लिए एक जैसा दिन बताता है, पर आपकी कुंडली में चल रही दशा और गोचर का असर अलग होता है। इसलिए पापांकुशा एकादशी के संकल्प लेने से पहले अपना जन्म विवरण डालकर मुफ्त शुभ मुहूर्त कैलकुलेटर चलाएं। इससे आपको बताया जाएगा कि पूजा, दान या नई शुरुआत के लिए कौन-सा समय आपके लिए ठीक है। व्यक्तिगत सलाह के लिए कुंडली मिलान और जन्म कुंडली की जांच भी उपलब्ध है, और सारी जांच मुफ़्त शुरू होती है।
Apna Personalized Analysis Lein
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शब्दावली · Glossary
- एकादशी
- चंद्र मास के हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि, जो विष्णु उपासना और संयम के लिए मानी जाती है।
- पारण
- एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि में विधि से खोलने की क्रिया।
- हरि वासर
- एकादशी के अंतिम चौथाई और द्वादशी के पहले चौथाई का समय, जिसमें पारण नहीं किया जाता।
- फलाहार
- अन्न के बिना केवल फल, दूध और व्रत में चलने वाली चीज़ों से बना हल्का भोजन।
- शतभिषा नक्षत्र
- कुंभ राशि का नक्षत्र जिसके स्वामी राहु हैं और जिसे सौ चिकित्सकों का नक्षत्र कहा जाता है।
Frequently Asked Questions
पापांकुशा एकादशी 2026 कब है?
पापांकुशा एकादशी 2026 गुरुवार, 22 अक्टूबर को है। दिल्ली NCR में उस दिन सूर्योदय पर एकादशी तिथि रहती है और दोपहर 14:48 तक चलती है।
पापांकुशा एकादशी का पारण कब करें?
पारण शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय 06:30 के बाद सुबह द्वादशी तिथि में करें। द्वादशी उस दिन 14:36 तक रहती है, इसलिए सुबह का समय सबसे आसान है।
पापांकुशा एकादशी में किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है, विशेषकर पद्मनाभ रूप की। पूजा में पीले फूल, तुलसी दल, फल और घी का दीपक रखा जाता है।
पापांकुशा एकादशी पर क्या खाना चाहिए?
फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा और आलू सेंधा नमक के साथ चलते हैं। चावल और सभी अनाज इस दिन छोड़े जाते हैं।
क्या एकादशी पर तुलसी के पत्ते तोड़ सकते हैं?
परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले, 21 अक्टूबर को, तोड़कर रख लें।
क्या मधुमेह वाले लोग पापांकुशा एकादशी का व्रत रख सकते हैं?
मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग वाले लोग अपने चिकित्सक से पूछे बिना लंबा उपवास न रखें। वे फलाहार और दूध के साथ आंशिक व्रत रखकर जप और दान से व्रत का भाव निभा सकते हैं।
पापांकुशा एकादशी का क्या अर्थ है?
पाप का अर्थ ग़लत कर्मों का बोझ है और अंकुश वह दंड है जिससे हाथी को काबू में रखा जाता है। यह एकादशी मन पर नियंत्रण और पश्चाताप के भाव का अभ्यास मानी जाती है।
22 अक्टूबर 2026 को राहु काल कब है?
दिल्ली NCR में 22 अक्टूबर को राहु काल 13:28 से 14:52 तक है। यमगंड 06:30 से 07:53 और गुलिक काल 09:17 से 10:41 तक है।
अगर व्रत छूट जाए तो क्या करें?
घबराने की ज़रूरत नहीं है। अगली एकादशी पर सरल संकल्प के साथ फिर शुरुआत करें और इस बीच विष्णु नाम जप या छोटे दान से भाव बनाए रखें।
पापांकुशा एकादशी के बाद कौन-सा बड़ा त्योहार आता है?
इसके बाद शरद पूर्णिमा आती है, फिर करवा चौथ, धनतेरस और दिवाली का क्रम चलता है। हर त्योहार की तारीख़ पंचांग पृष्ठ पर देखी जा सकती है।
यह भी देखें · See also
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देवउठनी एकादशी 2026: 20 नवंबर, पारण समय
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श्रेणी: muhurat