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महादशा कैसे निकालें: जन्म तारीख से तरीका

Rohiit Gupta· Chief Vedic Architect15 min read

Trikaal Sandesh — Direct Answer

महादशा निकालने के लिए पहले चंद्रमा का जन्म नक्षत्र जानें। उस नक्षत्र का स्वामी ही पहली महादशा देता है। नक्षत्र में चंद्रमा जितना आगे बढ़ चुका हो, उतना हिस्सा घटाकर शेष वर्ष निकलते हैं। फिर विंशोत्तरी के 120 वर्ष के क्रम में आगे की महादशाएँ जुड़ती जाती हैं। मुफ्त कैलकुलेटर यही गणना एक मिनट में कर देता है।

Deep Dive Analysis

महादशा कैसे निकालें: संक्षिप्त उत्तर

महादशा निकालने का तरीका तीन चरणों में समझ आता है। पहला चरण है जन्म के समय चंद्रमा किस नक्षत्र में था, यह जानना। दूसरा चरण है उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह को पहली महादशा मानना और चंद्रमा के नक्षत्र में तय किए हुए हिस्से के अनुसार उसके शेष वर्ष निकालना। तीसरा चरण है विंशोत्तरी क्रम में अगली महादशाओं के वर्ष जोड़कर हर तारीख़ बनाना। बृहत् पराशर होरा शास्त्र में यही क्रम कृत्तिका से गिनकर बताया गया है।[1] इस पेज पर तीनों चरण हल किए उदाहरण के साथ हैं। अगर आप अंतर्दशा या प्रत्यंतर भी निकालना चाहते हैं तो प्रत्यंतर दशा कैसे निकालें पढ़ें, और जल्दी नतीजा चाहिए तो मुफ्त दशा कैलकुलेटर खोलें।

महादशा क्या है और अंतर्दशा से कैसे अलग

महादशा किसी एक ग्रह के नाम पर चलने वाला जीवन का लंबा चरण है, जो छह से बीस वर्ष तक का हो सकता है। इस दौरान वह ग्रह कुंडली में अपने भाव, राशि और बल के अनुसार जीवन के विषयों को रंग देता है। अंतर्दशा इसी महादशा के भीतर का छोटा उप-चरण है, जिसमें नौ ग्रह फिर से बारी-बारी आते हैं। इसलिए महादशा को बड़ी ऋतु और अंतर्दशा को उसके भीतर का महीना समझिए। पूरा चित्र समझने के लिए विंशोत्तरी दशा की पूरी विधि और प्रत्यंतर दशा का गणित साथ में पढ़ना काम आएगा।

विंशोत्तरी का 120 वर्ष का चक्र

विंशोत्तरी का अर्थ है एक सौ बीस वर्ष का चक्र। बृहत् पराशर में कहा गया है कि पूर्ण आयु एक सौ बीस वर्ष मानी गई है और इसी कारण विंशोत्तरी दशा को मुख्य दशा कहा गया है।[3] नौ ग्रहों के वर्ष जोड़ने पर ठीक एक सौ बीस आते हैं, इसलिए कोई ग्रह छूटता नहीं और चक्र एक बार पूरा होने पर फिर वहीं से शुरू होता है। व्यवहार में अधिकांश लोग एक ही चक्र में जीवन बिताते हैं, इसलिए आपको अपनी पहली दशा से शुरू होकर आगे की चार-पाँच महादशाएँ ही देखनी होती हैं। नक्षत्र की बुनियाद के लिए 27 नक्षत्रों के नाम और स्वामी भी देखें।

नौ ग्रहों की महादशा के वर्ष

विंशोत्तरी में हर ग्रह की महादशा का तय समय है। सूर्य के छह वर्ष, चंद्रमा के दस, मंगल के सात, राहु के अठारह, गुरु के सोलह, शनि के उन्नीस, बुध के सत्रह, केतु के सात और शुक्र के बीस वर्ष होते हैं। इन सबका योग एक सौ बीस है। बृहत् पराशर का श्लोक इन वर्षों को क्रम से गिनाता है।[4] इसलिए जब कैलकुलेटर किसी को शनि की महादशा उन्नीस वर्ष की दिखाए तो वह मनमानी संख्या नहीं, शास्त्र में तय की हुई अवधि है। राहु की अठारह वर्ष की अवधि को सरल भाषा में राहु महादशा कितने साल की होती है में भी समझाया गया है।

पहली महादशा जन्म नक्षत्र से तय होती है

किसी की कुंडली में सबसे पहले चलने वाली महादशा चंद्रमा के जन्म नक्षत्र के स्वामी की होती है। अगर चंद्रमा रोहिणी में था तो पहली दशा चंद्रमा की होगी, और अगर वह पुष्य में था तो शनि की। बृहत् पराशर में दशा-स्वामियों का क्रम कृत्तिका से शुरू करके तीन बार दोहराया गया है, ताकि सत्ताईस नक्षत्रों में नौ ग्रह बराबर बँट जाएँ।[1] यानी हर ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है। इसलिए पहला काम अपने जन्म नक्षत्र को सही पकड़ना है, और उसके लिए जन्म नक्षत्र कैसे पता करें एक आसान शुरुआत है।

अपना जन्म नक्षत्र कैसे पता करें

जन्म नक्षत्र जानने के दो रास्ते हैं। पहला रास्ता है बनी हुई कुंडली में चंद्रमा की निरयन डिग्री देखना। हर नक्षत्र तेरह अंश बीस कला, यानी लगभग 13.33 अंश का होता है, इसलिए चंद्रमा की डिग्री को 13.33 से भाग देकर जो पूर्णांक आए, उसमें एक जोड़ने पर नक्षत्र की संख्या मिल जाती है। दूसरा रास्ता है मुफ्त नक्षत्र कैलकुलेटर, जो जन्म तारीख, समय और स्थान से स्विस एफेमेरिस पर चंद्रमा की सही स्थिति निकालकर नक्षत्र और चरण बता देता है। अगर कुंडली अभी बनी नहीं है तो कुंडली कैसे बनाएँ देखें और नक्षत्र कैलकुलेटर गाइड भी पढ़ें।

नक्षत्र और उनके दशा-स्वामी की सूची

क्रम इस प्रकार है। अश्विनी, मघा और मूल का स्वामी केतु है। भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा का स्वामी शुक्र है। कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी और उत्तराषाढ़ा का स्वामी सूर्य है। रोहिणी, हस्त और श्रवण का स्वामी चंद्रमा है। मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा का स्वामी मंगल है। आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा का स्वामी राहु है। पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद का स्वामी गुरु है। पुष्य, अनुराधा और उत्तरा भाद्रपद का स्वामी शनि है। आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी बुध है। इस सूची को एक बार लिखकर रख लीजिए, क्योंकि आगे हर उदाहरण में इसी की ज़रूरत पड़ेगी। इसका विस्तार 27 नक्षत्रों के स्वामी में है।

जन्म के समय की शेष दशा

जन्म के क्षण पर चंद्रमा अपने नक्षत्र के बीच में कहीं होता है, इसलिए पहली महादशा पूरी नहीं, आंशिक मिलती है। जो हिस्सा चंद्रमा पार कर चुका है उससे भुक्त और जो बचा है उससे भोग्य दशा बनती है। बृहत् पराशर में भी भोग्य को दशा के पूरे मान से भुक्त वर्ष घटाकर निकालने की बात आती है।[5] व्यवहार का नियम सीधा है: पहली दशा के पूरे वर्ष लें, उनमें से नक्षत्र का पार किया हुआ अनुपात घटा दें और जो बचे वही शेष दशा है। इसकी सटीकता सीधे जन्म समय पर टिकी है, जिसे कुंडली में जन्म समय की शुद्धता में विस्तार से देखा जा सकता है।

बृहत् पराशर का 9 से भाग देने वाला नियम

कैलकुलेटर के बिना भी पहली दशा का स्वामी निकालने का एक पुराना और सरल नियम है। बृहत् पराशर कहता है कि कृत्तिका से अपने जन्म नक्षत्र तक की गिनती को नौ से भाग दें, और जो शेष बचे उससे दशा-स्वामी जानकर वहीं से दशा शुरू करें।[2] गिनती में कृत्तिका एक, रोहिणी दो और आगे इसी तरह बढ़ती है। शेष एक आए तो सूर्य, दो पर चंद्रमा, तीन पर मंगल, चार पर राहु, पाँच पर गुरु, छह पर शनि, सात पर बुध, आठ पर केतु और शून्य आए तो नौवाँ स्वामी शुक्र। यह क्रम वही है जो ऊपर दिया गया। इस नियम से नक्षत्र की सूची याद किए बिना भी जाँच की जा सकती है, जैसा कुंडली कैसे देखें की प्रक्रिया में किया जाता है।

हल किया उदाहरण: चंद्रमा हस्त नक्षत्र में

एक काल्पनिक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए जन्म 15 मार्च 1990 को हुआ और चंद्रमा निरयन 165 अंश पर था, यानी कन्या राशि के पंद्रह अंश पर। 165 को 13.33 से भाग देने पर लगभग 12.375 आता है, इसलिए चंद्रमा तेरहवें नक्षत्र हस्त में है और उसमें पाँच अंश आगे बढ़ चुका है। कृत्तिका से गिनें तो हस्त ग्यारहवाँ है। ग्यारह को नौ से भाग देने पर शेष दो बचता है, जो चंद्रमा का क्रमांक है। यानी पहली महादशा चंद्रमा की है, जो हस्त के स्वामी से भी मेल खाती है। यह दोहरी जाँच हमेशा कर लेनी चाहिए, और विंशोत्तरी की पूरी विधि में ऐसे और उदाहरण हैं।

उदाहरण में शेष दशा और आगे की तारीखें

उसी उदाहरण में चंद्रमा हस्त के तेरह अंश बीस कला में से पाँच अंश पार कर चुका है, यानी 0.375 हिस्सा। चंद्र महादशा दस वर्ष की है, इसलिए शेष बचता है दस गुणा 0.625, यानी 6.25 वर्ष या छह वर्ष तीन महीने। जन्म 15 मार्च 1990 से इसे जोड़ने पर चंद्र महादशा 15 जून 1996 को समाप्त होती है। उसके बाद मंगल की महादशा सात वर्ष चलकर 15 जून 2003 तक रहती है, फिर राहु अठारह वर्ष चलकर 15 जून 2021 तक, फिर गुरु सोलह वर्ष चलकर 15 जून 2037 तक और उसके बाद शनि उन्नीस वर्ष चलकर 15 जून 2056 तक। अक्टूबर 2026 में इस काल्पनिक जातक की गुरु महादशा चल रही होती। अपनी असली तारीखें पाने के लिए मुफ्त दशा कैलकुलेटर चलाएँ।

अंतर्दशा की लंबाई का सूत्र

महादशा के भीतर हर ग्रह की अंतर्दशा की लंबाई एक सीधे सूत्र से आती है: महादशा के वर्ष गुणा अंतर्दशा-ग्रह के वर्ष, भाग एक सौ बीस। उदाहरण के लिए गुरु महादशा में शनि की अंतर्दशा सोलह गुणा उन्नीस भाग एक सौ बीस, यानी लगभग 2.53 वर्ष होगी, जो करीब दो वर्ष छह महीने बारह दिन है। यही सूत्र आगे प्रत्यंतर में भी चलता है, जिसका पूरा हल प्रत्यंतर दशा कैलकुलेटर गाइड में दिया है। हर महादशा में पहली अंतर्दशा उसी ग्रह की होती है जिसकी महादशा चल रही है, और उसके बाद बाकी ग्रह विंशोत्तरी क्रम में आते हैं। राहु महादशा में हर अंतर्दशा का फल अलग पेज पर है, जैसे राहु महादशा में शनि की अंतर्दशा।

सही जन्म समय क्यों ज़रूरी है

चंद्रमा एक दिन में लगभग एक नक्षत्र जितना चलता है, यानी एक घंटे में लगभग आधा अंश। यह आधा अंश नक्षत्र का करीब चार प्रतिशत है, इसलिए दस वर्ष की चंद्र दशा में एक घंटे की चूक लगभग पाँच महीने का फ़र्क़ ला सकती है, और बीस वर्ष की शुक्र दशा में लगभग दस महीने का। यही कारण है कि दो कैलकुलेटर की तारीखें थोड़ी अलग निकल सकती हैं, जब जन्म समय पर मतभेद हो। अगर आपके पास अस्पताल या जन्म प्रमाणपत्र का समय है तो वही भरें। समय पक्का न हो तो जन्म समय सुधार के तरीके पढ़ें और स्विस एफेमेरिस आधारित गणना पर भरोसा करें।

मुफ्त कैलकुलेटर से एक मिनट में महादशा कैसे निकालें

हाथ से गणना सीखना अच्छा है, पर रोज़ के काम में कैलकुलेटर तेज़ और भूल-रहित है। त्रिकाल वाणी का मुफ्त दशा कैलकुलेटर खोलें, जन्म तारीख, सही समय और जन्म का शहर भरें, और परिणाम में पहली दशा, शेष वर्ष और पूरी महादशाओं की तारीखें देखें। कुंडली अभी नहीं बनी है तो पहले मुफ्त जन्म कुंडली बना लें, क्योंकि उसी में चंद्रमा का नक्षत्र दिखता है। कुंडली बनाने के चरण अंग्रेज़ी में Kundli Maker पेज पर भी हैं। परिणाम को सहेजकर रखें, ताकि अगली बार केवल चल रही दशा देखनी पड़े।

अपनी चल रही महादशा को कैसे पढ़ें

तारीखें मिल जाने के बाद असली सवाल है कि चल रही महादशा आपके लिए क्या कहती है। इसका जवाब तीन बातों में है: वह ग्रह आपकी कुंडली के किस भाव में बैठा है, किन भावों का स्वामी है, और कितना बलवान है। अच्छी तरह बैठा ग्रह अपनी दशा में अपने भाव के विषयों को आगे बढ़ाता है, जबकि पीड़ित ग्रह उन्हीं विषयों में धैर्य की परीक्षा लेता है। ग्रह का बल देखने के लिए कुंडली में षड्बल और ग्रह बल पढ़ें, और कमज़ोर ग्रह पहचानने के लिए कमज़ोर ग्रह कैसे पता करें देखें। भावों की भाषा के लिए कुंडली के 12 भाव सबसे सरल आधार है।

सूर्य की महादशा: 6 वर्ष

सूर्य की महादशा छह वर्ष चलती है और परंपरा में इसे पहचान, अधिकार, पिता और सरकारी कामकाज से जोड़ा जाता है। अगर सूर्य कुंडली में दशम, नवम या लग्न जैसे मज़बूत भाव में हो तो इस काल में पद, सम्मान और नेतृत्व के अवसर उभरते हैं। कमज़ोर या पीड़ित सूर्य में आत्मविश्वास और अधिकारियों से तालमेल पर ध्यान देना पड़ता है। सरकारी नौकरी के संकेतों को इसी दृष्टि से सूर्य महादशा और सरकारी नौकरी में विस्तार से समझाया गया है। कोई भी निष्कर्ष तभी निकालें जब सूर्य का भाव, राशि और दृष्टियाँ देख ली हों।

चंद्र की महादशा: 10 वर्ष

चंद्र की महादशा दस वर्ष की होती है और इसका संबंध मन, माता, घर की शांति और भावनात्मक स्थिरता से माना जाता है। मज़बूत चंद्रमा में मन शांत रहता है, लोगों से जुड़ाव बढ़ता है और घर-परिवार में सहारा मिलता है। पीड़ित चंद्रमा में नींद, चिंता और मन के उतार-चढ़ाव पर ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है। इस दशा के मानसिक पहलू को चंद्र महादशा और मन की सेहत में विस्तार से देखा जा सकता है, और मानसिक स्वास्थ्य कुंडली से भी इसका संबंध समझाता है। यहाँ भी चंद्रमा का भाव और उस पर पड़ने वाली दृष्टियाँ ही असली फल तय करती हैं।

मंगल की महादशा: 7 वर्ष

मंगल की महादशा सात वर्ष चलती है और ऊर्जा, साहस, भूमि-संपत्ति तथा भाई-बहनों से जुड़ी मानी जाती है। अच्छी स्थिति में यह काल मेहनत को परिणाम देता है, जैसे नया उपक्रम, ज़मीन की खरीद या खेल-कौशल में आगे बढ़ना। कमज़ोर स्थिति में जल्दबाज़ी, क्रोध और टकराव पर नियंत्रण रखना पड़ता है। इसका सरल विश्लेषण मंगल महादशा: ऊर्जा और क्रोध में है। अगर आपकी कुंडली में मंगल दोष की चर्चा है तो उसे मंगल दोष के उपाय के साथ अलग से देखें, क्योंकि दशा और दोष एक ही बात नहीं हैं।

राहु की महादशा: 18 वर्ष

राहु की महादशा अठारह वर्ष की सबसे लंबी दशाओं में से एक है और परंपरा में इसे अचानक बदलाव, विदेश, तकनीक और बड़ी महत्वाकांक्षा से जोड़ा जाता है। राहु छाया ग्रह है, इसलिए इसका फल पूरी तरह उस राशि और भाव पर टिका रहता है जिसमें वह बैठा है और जिस ग्रह के साथ है। यह दशा कई लोगों को अनिश्चित लगती है, पर सही समझ और अनुशासन के साथ बड़े अवसर भी देती है। इसकी पूरी रूपरेखा राहु महादशा कितने साल की होती है में है, और सरल व डर-मुक्त उपाय राहु की महादशा के उपाय में दिए गए हैं। भ्रम की स्थिति पर राहु अंतर्दशा के भ्रम के लक्षण भी पढ़ें।

गुरु की महादशा: 16 वर्ष

गुरु की महादशा सोलह वर्ष चलती है और ज्ञान, शिक्षा, संतान, धन और मार्गदर्शन से जुड़ी मानी जाती है। जब गुरु शुभ भावों में हो तो यह काल सीखने, परिवार के विस्तार और जीवन में स्थिरता की ओर ले जाता है। पीड़ित गुरु में अति-आशावाद, गलत सलाह या अनुशासन की कमी जैसे पहलू उभर सकते हैं। इस दशा के विषय गुरु महादशा: ज्ञान और विकास में विस्तार से हैं, और राहु के साथ गुरु का जटिल मेल गुरु चांडाल योग क्या है में समझाया गया है। परीक्षा के लिहाज़ से परीक्षा में सफलता का सबसे अच्छा वर्ष भी काम का है।

शनि की महादशा: 19 वर्ष

शनि की महादशा उन्नीस वर्ष की है और अनुशासन, मेहनत, देरी, ज़िम्मेदारी तथा कर्मफल से जुड़ी मानी जाती है। लोग इसे सबसे कठिन दशा समझ लेते हैं, पर यह वही दशा है जो टिकाऊ ढाँचा बनाती है। मज़बूत शनि में देर से सही, पर पक्की सफलता मिलती है, जबकि कमज़ोर शनि में काम की गति धीमी और अपेक्षाओं पर दबाव महसूस होता है। इस दशा का पूरा चरण-दर-चरण चित्र शनि महादशा गाइड में है, और नौकरी के सवाल पर शनि महादशा में नौकरी क्यों नहीं मिलती देखें। साढ़ेसाती से इसे न मिलाएँ, क्योंकि साढ़ेसाती गोचर है और यह दशा जन्म-कुंडली से चलती है, जैसा क्या साढ़ेसाती हमेशा बुरी होती है में बताया गया है।

बुध की महादशा: 17 वर्ष

बुध की महादशा सत्रह वर्ष चलती है और बुद्धि, वाणी, व्यापार, लेखन और संवाद का समय मानी जाती है। शुभ बुध में सीखने की गति, व्यावसायिक समझ और नेटवर्क बढ़ता है, जबकि पीड़ित बुध में अधिक सोचना, असमंजस और शब्दों की गलतफहमी पर ध्यान रखना पड़ता है। करियर के पहलू पर बुध महादशा और करियर में विस्तार से पढ़ा जा सकता है। चूँकि बुध अपने साथी ग्रह का स्वभाव ले लेता है, इसलिए उसके साथ बैठे ग्रहों को जाँचना ज़रूरी है, जिसका तरीका कुंडली के 9 ग्रह में दिया गया है।

केतु की महादशा: 7 वर्ष

केतु की महादशा सात वर्ष की है और इसे वैराग्य, आत्म-चिंतन, अध्यात्म और पुराने बंधनों से मुक्ति से जोड़ा जाता है। इस काल में कई लोगों को बाहरी चीज़ों से दूरी और भीतर की तलाश महसूस होती है। यह हानि की दशा नहीं, दिशा बदलने की दशा है, जिसमें सही भाव में बैठा केतु गहरी अंतर्दृष्टि और विशेषज्ञता देता है। लक्षणों को केतु महादशा के वैराग्य लक्षण में सूचीबद्ध किया गया है और शांत रहने के सरल तरीके केतु दशा के उपाय में हैं। पहली दशा केतु की हो तो शेष वर्ष और भी ध्यान से निकालना चाहिए।

शुक्र की महादशा: 20 वर्ष

शुक्र की महादशा बीस वर्ष की सबसे लंबी दशा है और इसका संबंध संबंध, विवाह, सौंदर्य, कला, सुख-सुविधा और धन से जोड़ा जाता है। मज़बूत शुक्र में जीवन में सामंजस्य, रचनात्मकता और भौतिक सुख बढ़ते हैं। पीड़ित शुक्र में रिश्तों की अपेक्षाओं और खर्च पर संतुलन रखने की ज़रूरत पड़ती है। विवाह के समय के संकेत को शुक्र अंतर्दशा और विवाह योग में और कुंडली के विवाह योग को कुंडली में विवाह योग में समझाया गया है। इतनी लंबी अवधि में अंतर्दशाएँ ही असली समय-सूचक बनती हैं, इसलिए केवल महादशा देखकर निष्कर्ष न निकालें।

महादशा, अंतर्दशा और गोचर का मेल

केवल महादशा देखकर फल बताना अधूरा है। असली तस्वीर तब बनती है जब महादशा, उसके भीतर चल रही अंतर्दशा और ग्रहों का गोचर साथ में पढ़ा जाए। महादशा विषय तय करती है, अंतर्दशा उस विषय का चरण बताती है और गोचर यह दिखाता है कि कौन सा महीना या वर्ष घटना के लिए अनुकूल बन रहा है। ग्रहों की यह तिहरी पढ़ाई दशा और गोचर से विदेश बसने के संकेत जैसे पेजों में उदाहरण के साथ दिखाई गई है। प्रत्यंतर तक जाना हो तो दशा-प्रत्यंतर से समय का चुनाव देखें।

महादशा से जीवन के विषयों की टाइमिंग

महादशा निकालने का सबसे उपयोगी फल यह है कि आप अपने अहम फैसलों को सही खिड़की से जोड़ सकते हैं। करियर में कौशल और बदलाव की खिड़की को दशा से करियर विंडो में, संपत्ति खरीद के समय को दशा से संपत्ति खरीद की खिड़की में और कर्ज़ से राहत के समय को दशा से कर्ज़-मुक्ति की खिड़की में समझाया गया है। संतान के विकास पर दशा से संतान विकास का समय और रिश्तों में दोबारा जुड़ाव पर दशा से पुनर्मिलन का समय उपयोगी हैं। हर बार दशा के साथ भाव और बल भी देखें।

कठिन महादशा के सरल, डर-मुक्त उपाय

किसी भी महादशा के कठिन लगने पर घबराने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि उपाय का उद्देश्य डर कम करना और अनुशासन देना है। सरल रूप में चार बातें काम आती हैं। पहली बात: दशा-स्वामी ग्रह के वार पर पाँच मिनट शांत बैठकर उस ग्रह के गुण का स्मरण करें। दूसरी बात: उस ग्रह से जुड़ा एक छोटा सेवा-कार्य चुनें, जैसे शनि के लिए किसी श्रमिक की मदद। तीसरी बात: किसी रत्न को पहला उपाय न बनाएँ और बिना कुंडली देखे कोई रत्न न पहनें। चौथी बात: खर्चीली पूजा के दबाव में न आएँ। अपने लिए सही क्रम जानने को मुफ्त उपाय कैलकुलेटर आज़माएँ और राहु की दशा हो तो राहु महादशा के उपाय भी देखें।

महादशा के बारे में आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति है कि कुछ महादशाएँ पूरी तरह बुरी होती हैं और कुछ पूरी तरह अच्छी। असल में हर ग्रह का फल उसके भाव, राशि और बल से बदलता है। दूसरी भ्रांति है कि महादशा बदलते ही सब कुछ बदल जाता है, जबकि बदलाव धीरे-धीरे अंतर्दशाओं के साथ आता है। तीसरी भ्रांति है कि हर कैलकुलेटर की तारीख़ एक जैसी निकलेगी, पर जन्म समय और अयनांश के चुनाव से कुछ दिन का फ़र्क़ संभव है। चौथी भ्रांति है कि दशा देखने से भविष्य तय हो जाता है, जबकि यह केवल प्रवृत्ति और समय का संकेत है। कुंडली की ताकत समझने के लिए कुंडली मज़बूत है या कमज़ोर पढ़ें, और मुफ्त रिपोर्टों की सीमा पर मुफ्त कुंडली कितनी सही होती है देखें।

आम गलतियाँ जो महादशा निकालते समय होती हैं

सबसे आम गलती है सूर्य राशि को ही चंद्र राशि या नक्षत्र मान लेना, जिससे पहली दशा ही गलत निकलती है। दूसरी गलती है निरयन की जगह सायन डिग्री ले लेना। तीसरी गलती है जन्म समय में सुबह और शाम का भेद भूल जाना। चौथी गलती है शेष दशा निकालते समय पूरा वर्ष गिन लेना, जबकि पार किया हुआ हिस्सा घटाना होता है। पाँचवीं गलती है केवल महादशा देखकर अंतर्दशा की उपेक्षा करना। छठी गलती है अलग-अलग दशा पद्धतियों को मिला देना, जैसे विंशोत्तरी और योगिनी, जिनके चक्र अलग हैं। योगिनी की अलग विधि के लिए योगिनी दशा कैसे निकालें पढ़ें और अपना लग्न जानने के लिए मेरा लग्न क्या है देखें।

मुफ्त कैलकुलेटर या मानवीय रीडिंग

मुफ्त कैलकुलेटर महादशा, अंतर्दशा और तारीखें एक मिनट में देता है, और अपनी दशा जानने का पहला कदम वही है। पर दशा-स्वामी का भाव, बल, दृष्टि और कुंडली के बाकी योगों के साथ उसका मेल तौलना और फिर जीवन की योजना बनाना मानवीय रीडिंग का काम है। त्रिकाल वाणी में रीडिंग रोहित गुप्ता (Rohiit Gupta), चीफ़ वैदिक आर्किटेक्ट, तैयार करते हैं, जिनके पास पराशरी पद्धति का 16 वर्ष से अधिक का अभ्यास है और जो स्विस एफेमेरिस से गणना करते हैं। पहले मुफ्त दशा कैलकुलेटर चलाएँ। अगर चल रही महादशा के कारण उलझन हो तो ₹101 की कर्म-पृष्ठभूमि रीडिंग में इसे क्रम से समझाया जाता है, और बुकिंग के स्लॉट सीमित रहते हैं।

संबंधित पाठ

आगे पढ़ने के लिए: विंशोत्तरी दशा की पूरी विधि, प्रत्यंतर दशा कैसे निकालें, कुंडली कैसे देखें, जन्म कुंडली कैसे बनाएँ, लग्न कुंडली क्या होती है और जन्म तारीख से राजयोग कैसे निकालें। नौकरी के समय के लिए जन्म तारीख से नौकरी कब लगेगी और अंग्रेज़ी में आधार के लिए वैदिक ज्योतिष क्या है देखें।

Apna Personalized Analysis Lein

Yeh article general framework hai. Aapke specific chart ke according detailed analysis ke liye:

शब्दावली · Glossary

महादशा
किसी एक ग्रह के नाम पर चलने वाला जीवन का लंबा चरण, जो विंशोत्तरी में छह से बीस वर्ष का होता है।
अंतर्दशा
महादशा के भीतर का छोटा उप-चरण, जिसमें नौ ग्रह फिर से बारी-बारी अपना समय पाते हैं।
विंशोत्तरी दशा
एक सौ बीस वर्ष के चक्र वाली मुख्य दशा-पद्धति, जिसमें नौ ग्रहों को अलग-अलग वर्ष मिलते हैं।
जन्म नक्षत्र
जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वही जन्म नक्षत्र है और उसी से पहली दशा तय होती है।
भुक्त और भोग्य
नक्षत्र में चंद्रमा का पार किया हुआ हिस्सा भुक्त है और बचा हुआ हिस्सा भोग्य, जिससे शेष दशा बनती है।
अयनांश
सायन और निरयन राशिचक्र के बीच का अंतर, जिसका चुनाव दशा की तारीख़ों को थोड़ा प्रभावित कर सकता है।

ग्रंथ सन्दर्भ · Classical Sources

इस लेख के हर नियम का मूल स्रोत — ग्रंथ, अध्याय और श्लोक संख्या के साथ।

  1. [1]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    कृत्तिकातः समारभ्य त्रिरावृत्य दशाधिपाः । आचंकुरागुशबुकेशुपूर्वा विहगाः क्रमात्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 12

    कृत्तिका से शुरू करके दशा-स्वामी तीन बार दोहराए जाते हैं, क्रम सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र।

    Starting from Krittika, the dasha lords repeat three times in the order Sun, Moon, Mars, Rahu, Jupiter, Saturn, Mercury, Ketu and Venus.

  2. [2]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    वह्निभाज्जन्मभं यावद् या संख्या नवतष्टिता । शेषाद्दशाधिपो ज्ञेयस्तमारभ्य दशां नयेत्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 13

    कृत्तिका से जन्म नक्षत्र तक की गिनती को नौ से भाग दें, शेष से दशा-स्वामी जानें और वहीं से दशा शुरू करें।

    Count from Krittika to the birth nakshatra, divide by nine, and from the remainder know the dasha lord and begin the dasha from him.

  3. [3]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    विंशोत्तरशतं पूर्णमायुः पूर्वमुदाहृतम् । कलै विंशोत्तरी तस्माद् दशा मुख्या द्विजोत्तम
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 14

    पूर्ण आयु एक सौ बीस वर्ष कही गई है, इसलिए विंशोत्तरी दशा मुख्य दशा है।

    The full life span was declared as one hundred and twenty years, and so the Vimshottari dasha is the principal dasha.

  4. [4]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    दशासमाः क्रमादेषां षड् दशाऽश्वा गजेन्दवः । नृपाला नवचन्द्राश्च नवचन्द्रा नगा नखाः
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 15

    इस श्लोक में दशा-स्वामियों के वर्ष क्रम से गिनाए गए हैं।

    The dasha years of the lords are enumerated here in sequence.

  5. [5]↑बृहत् पराशर होरा शास्त्रबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् · Maharishi Parashara
    दशामनां भयातघ्नं भभोगेन हृतं फलम् । दशाया भुक्तवर्षाद्य भोग्यं मानाद् विशोधितम्
    — बृहत् पराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46 · श्लोक 16

    भोग्य अवधि दशा के पूरे मान में से भुक्त वर्ष घटाने पर मिलती है।

    The remaining (bhogya) period is obtained by subtracting the elapsed (bhukta) years from the full measure of the dasha.

हर सन्दर्भ त्रिकाल वाणी ग्रंथ-पुस्तकालय या प्रतिष्ठित मुक्त स्रोत से मिलाया गया · व्याख्या: Rohiit Gupta, Chief Vedic Architect

Frequently Asked Questions

महादशा कैसे निकालें?

पहले चंद्रमा का जन्म नक्षत्र जानें, उसका स्वामी ग्रह पहली महादशा होगा। नक्षत्र में चंद्रमा का पार किया हुआ हिस्सा घटाकर शेष वर्ष निकालें, फिर विंशोत्तरी क्रम में अगली महादशाओं के वर्ष जोड़ते जाएँ। मुफ्त कैलकुलेटर यह एक मिनट में कर देता है।

मेरी चल रही महादशा कैसे पता करें?

जन्म तारीख, सही समय और शहर से बनी दशा तालिका में वर्तमान तारीख जिस महादशा के बीच आए, वही चल रही महादशा है। यह तालिका त्रिकाल वाणी के मुफ्त दशा कैलकुलेटर से तुरंत मिल जाती है। अंतर्दशा भी उसी तालिका में दिखती है।

विंशोत्तरी दशा में कुल कितने वर्ष होते हैं?

कुल एक सौ बीस वर्ष। सूर्य 6, चंद्रमा 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17, केतु 7 और शुक्र 20 वर्ष मिलाकर यह योग बनता है। बृहत् पराशर में पूर्ण आयु इसी मान से कही गई है।

पहली महादशा किस ग्रह की होगी, यह कैसे तय होता है?

यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र के स्वामी से तय होता है। उदाहरण के लिए रोहिणी, हस्त और श्रवण में चंद्रमा होने पर पहली दशा चंद्रमा की होगी, और पुष्य, अनुराधा या उत्तरा भाद्रपद में होने पर शनि की।

शेष दशा क्या होती है और कैसे निकलती है?

जन्म के समय पहली महादशा आंशिक बची होती है, उसे शेष दशा कहते हैं। इसे निकालने के लिए दशा के पूरे वर्षों को नक्षत्र के बचे हुए हिस्से से गुणा किया जाता है। उदाहरण में चंद्र दशा के दस वर्षों में से 6.25 वर्ष शेष मिले।

क्या हर महादशा बुरे फल देती है?

नहीं। किसी भी महादशा का फल उस ग्रह के भाव, राशि, बल और दृष्टि पर निर्भर करता है। एक ही ग्रह की दशा किसी के लिए अवसर और किसी के लिए धैर्य की परीक्षा हो सकती है। इसलिए दशा के साथ पूरी कुंडली देखना ज़रूरी है।

अलग-अलग वेबसाइट पर महादशा की तारीखें अलग क्यों दिखती हैं?

आम कारण जन्म समय का फ़र्क़, अयनांश का चुनाव और वर्ष को 365 या 365.25 दिन गिनने का तरीका हैं। चंद्रमा एक घंटे में लगभग आधा अंश चलता है, इसलिए समय की छोटी चूक भी दशा की तारीख़ को महीनों खिसका सकती है।

क्या महादशा और अंतर्दशा एक साथ पढ़ना ज़रूरी है?

हाँ। महादशा जीवन का बड़ा विषय तय करती है और अंतर्दशा उसमें समय का चरण बताती है। अंतर्दशा की लंबाई महादशा के वर्ष गुणा अंतर्दशा-ग्रह के वर्ष, भाग एक सौ बीस, के सूत्र से निकलती है।

कठिन महादशा में कौन सा उपाय सबसे सुरक्षित है?

सबसे सुरक्षित उपाय हैं दशा-स्वामी के वार पर पाँच मिनट का शांत स्मरण, उस ग्रह से जुड़ी छोटी सेवा और जीवन में अनुशासन। रत्न को पहला उपाय न बनाएँ और बिना कुंडली देखे न पहनें। कोई भी उपाय डर पर नहीं, समझ पर आधारित होना चाहिए।

अपनी महादशा की सही व्याख्या कहाँ से मिलेगी?

पहले मुफ्त दशा कैलकुलेटर से तारीखें निकालें। दशा-स्वामी का बल और भाव परखकर व्याख्या के लिए ₹101 की कर्म-पृष्ठभूमि रीडिंग में चीफ़ वैदिक आर्किटेक्ट रोहित गुप्ता की मानवीय रीडिंग मिलती है।

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